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चीन को बांस से मिला था पटाखे का आइडिया, भारत ने खत्म कर दी उसकी बादशाहत

पटाखों का अविष्कार चीन ने किया लेकिन विश्वस्तर पर भारत ने चीन की मोनोपोली को खत्म किया।

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नई दिल्ली. पटाखे बनाने का कारोबार सदियों से चला आ रहा है। लेकिन भारत में दिवाली पर पटाखों का इस्तेमाल ज्यादा पुराना नहीं है। दिवाली पर पटाखे चलाने की शुरुआत लगभग 90 साल पहले हुई थी। हालांकि, पटाखों का अविष्कार चीन ने किया लेकिन विश्व स्तर पर भारत ने चीन की मोनोपोली को खत्म किया। अब पटाखों के सबसे बड़े मैन्युफैक्चरर्स की लिस्ट में भारत का नाम शामिल हो चुका है। यहां हम आपको पटाखों के चीन से भारत आने तक का सफर के बारे में बता रहे हैं...

 

 

चीन में बांस से हुआ पटाखों का अविष्कार

करीब 200 BC साल पहले चीन के लोग नैचुरल पटाखा देखकर हैरान रह गए, जब अचानक खोखले हरे बांस के जलने पर तेज आवाज निकली। तब हवा के दबाव के कारण इतनी तेज आवाज निकली जो उन्होंने पहले नहीं सुनी थी। इसने लोगों और जानवरों को बुरी तरह डरा दिया। उन्हें लगा कि इससे बुरी स्पिरिट ‘निआन’ को डराया जा सकता है क्योंकि चीन का मानना था कि वह उनकी फसल और इंसानों को खा जाता है। इसके बाद वह शादी, जन्म, नए साल और राजतिलक के समय हरे बांस जलाते थे, ताकि बुरी बलाओं को दूर रखा जा सके।

 

 

चीन ने विश्व को दिया पटाखों का कारोबार

चीन में पटाखों की शुरुआत सातवीं शताब्दी में हैन राजवंश के समय हुआ। तब गन पॉउडर का अविष्कार नहीं हुआ था। चीन ने पोटेशिया नाइट्रेट, शहद, आरसेनिक सल्फाइड को आग पर जलाया, तो ब्राइट और गर्म फ्लेम निकली। इसे ‘हुओ याओ’ यानी ‘फायर डंग’ नाम दिया गया। जल्द ही चाइनीज ने बांस को फायर डंग से भरकर आग लगाई तो तेज आवाज के साथ बांस दो हिस्सों में फट गया। इसने सही मायने में पटाखों के कॉन्सेप्ट को जन्म दिया। चाइनीज ने पटाखों को एक आर्ट की तरह दूसरे देशों में एक्सपोर्ट करना शुरू कर दिया। साल1240 में अरब देशों ने गनपॉवर और इसका इस्तेमाल चीन से सीखा।

 

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कैसे शुरू हुआ भारत में पटाखों का कारोबार

भारत में 20 वीं शताब्दी तक पटाखों का इस्तेमाल गन पाउडर और आयरन बोरिंग तक सीमित था। 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में दास गुप्ता ने कोलकाता में माचिस की फैक्ट्री लगाई। उस दौरान दो कारोबारी शानमुगा नाडर और इया नाडर कारोबार के सिलसिले में कोलकाता गए। वह जिस लॉज में ठहरे थे, उसके पास दास गुप्ता की माचिस फैक्ट्री थी। वह उनकी फैक्ट्री देखकर हैरान रह गए। उनकी फैक्ट्री से प्रेरणा लेकर उन्होंने तमिलनाडु के शिवकाशी में पहली माचिस की फैक्ट्री लगाई। माचिस बनाने के कारोबार में सफलता मिलने का बाद वह पटाखे बनाने लगे। तब भारत में पटाखे जर्मनी और इंग्लैंड से इंपोर्ट होते थे।

 

 

सेकंड वर्ल्ड वार के समय भारत में बढ़ने लगा पटाखों का कारोबार

सेकंड वर्ल्ड वार अंत के समय स्टैंडर्ड फायरवर्क, कालिसवारी फायरवर्क और नैशनल फायरवर्क देश में बड़े पटाखा कारोबारी बन गए थे। शिवकाशी बड़ी पटाखा इंडस्ट्री के तौर पर डेवलप होने लगा। देश में दिवाली के समय अधिकतम पटाखे बिकने लगे। पटाखे बनाने के लिए लगने वाला रॉ मैटेरियल भी बनने लगा। शिवकाशी में सबसे कम बारिश होने और ड्राई क्लाइमेट होने के कारण शिवकाशी पटाखा बनाने के लिए बेस्ट डेस्टिनेशन बन गया। पटाखे बनाने के लिए मदद करने वाले मौसम के कारण शिवकशी और इसके आसपास का एरिया में पटाखों का प्रोडक्शन बढने लगा। जहां साल 1923 में जहां एक या दो फैक्ट्री हुआ करती थी, वहां 1986 में सिर्फ तमिलनाडू में 260 पटाखा फैक्ट्री बन चुकी थी।

 

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पटाखा कारोबार का असंगठित क्षेत्र से संगठित होने तक का सफर

बीते 15 सालों में पटाखा इंडस्ट्री में काफी परिवर्तन आए हैं। पटाखा कारोबार अनऑर्गनाइज्ड से ऑर्गनाइज्ड होने लगा। तमिलनाडु के अलावा महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, यूपी और केरल में पटाखा फैक्ट्री खुल चुकी है। साल 1977-1978 के बीच पटाखों को लेकर भारत ने विश्व स्तर पर चीन की मोनोपोली खत्म कर दिया। उस समय भारत ने 40 लाख रुपए के पटाखे एक्सपोर्ट किए और क्वालिटी में चीन के पटाखों के मुकाबले भारतीय पटाखों को बेहतर प्रोडक्ट माना गया। आज शिवकाशी पटाखा कारोबार में देश का बड़ा केंद्र बन गया।

 

 

देश में करोड़ों रुपए का है पटाखों का कारोबार

देश में 90 फीसदी पटाखा मैन्युफैक्चर शिवकाशी में होता है। आज यहा 800 से अधिक फैक्ट्री है। पटाखों का कारोबार भारत में पूरे साल चलता है। लेकिन दिवाली के समय में पटाखों के कारोबार का वॉल्युम मैक्सिमम होता है। दिवाली के 15-20 दिनों में 90 फीसदी पटाखों की बिक्री हो जाती है। भारत में पटाखों का कारोबार करीब 6,000  करोड़ रुपए का है। इस कारोबार से पांच लाख लोग जुड़े हुए हैं। शानमुगा नाडर की पटाखा फैक्ट्री स्टैण्डर्ड फायरवर्क के नाम से मशहुर है।

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