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मेक इन इंडिया / स्विस और जापानी कंपनियों को मात देने के लिए टाइटन खुद बनाएगी ऑटोमैटिक घडियां

ऑटोमैटिक घड़ियों के छह मॉडल आएंगे बाजार में, कीमत 25 हजार रुपए तक होगी

Titan to self-create automatic clocks to beat Swiss and Japanese companies

नई दिल्ली. देश की सबसे बड़ी घड़ी निर्माता कंपनी टाइटन महंगी घड़ियों का कारोबार बढ़ाकर स्विस और जापानी कंपनियों मात देना चाहती है। कारोबार शुरू करने के करीब 30 साल बाद अब पहली बार वह अपने कारखानों में बनी ऑटोमैटिक घड़ियां पेश करने जा रही है। अधिकतर नई घड़ियों की कीमत 20,000 से 25,000 रुपये के बीच हो सकती है। 

 

दो साल से कर रही है तैयारी 


टाइटन इस योजना पर करीब दो साल से काम कर रही है।  यह कवायद इसी रणनीति का हिस्सा है। कंपनी की वॉच ऐंड एक्सेसरीज डिवीजन के मुख्य कार्याधिकारी एस रवि कांत ने इस बात की पुष्टि की कि अगली तिमाही से टाइटन ब्रांड के तहत कम से कम आधा दर्जन नई ऑटोमेटिक घड़ियांबाजार में उतारी जाएंगी। फिलहाल वह ठेके पर ऑटोमैटिक घड़ियां बनवाती और बेचती है। टाइटन  हर साल करीब 1.7 करोड़ घड़ियां बेचती है।

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अभी स्विस और जापानी कंपनियों का दबदबा


 महंगी घडिय़ों के बाजार में स्विट्जरलैंड और जापान की कंपनियों का दबदबा है, जिसमें टाइटन अपने नए उत्पादों के जरिये भागीदारी बढ़ाना चाहती है। अभी टाइटन की ज्यादातर घड़ियां की कीमत 10,000 रुपये या उससे कम है, लेकिन महंगी घड़ियां का बाजार आने वाले सालों में बहुत तेजी से बढऩे की उम्मीद है। कांत ने कहा कि आने वाले दिनों में लोगों की खर्च योग्य आय बढ़ेगी, जिससे महंगी घडिय़ों का बाजार भी बढ़ेगा। 
 

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अभी विदेशी ब्रांड के भरोसे है टाइटन 

 

फिलहाल टाइटन अपने स्टोर पर स्विस ब्रांड फेवर-लूबा की ऑटोमैटिक घड़ियां बेचती है, जिसका अधिग्रहण उसने 2011 में किया था। फेवर-लूबा की घड़ियां दुनिया भर में मशहूर हैं, लेकिन भारत में इनकी बहुत कम बिक्री होती है। इसकी दो वजह हैं - सबसे पहले ब्रांड को लोकप्रिय बनाने के लिए मशक्कत करनी होगी और दूसरी वजह कीमत है। फेवर-लूबा की घड़ियां महंगी होती हैं और उसकी रेडर सीरीज की घड़ियों की कीमत 1.6 लाख रुपये से शुरू होकर 6 लाख रुपये तक जाती है। पिछले तीन साल में टाइटन ने मंद होती बिक्री और बाजार के तमाम दबावों का जमकर सामना किया और उबरने में कामयाब रही। कंपनी के युवा केंद्रित ब्रांड फास्ट्रैक पर खासा दबाव था क्योंकि युवा खरीदार फिटबिट्स या सस्ते वियरेबल बैंड खरीदने लगे थे और नई घड़ी खरीदने के बजाय उसी पैसे से नया महंगा मोबाइल फोन लेने लगे थे। 

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