रिपोर्ट /देश की 9 हाउसिंग मार्केटों में मौजूद कुल विलंबित परियोजनाओं में से आधे से अधिक एमएमआर में

  • यूनिट्स की संख्या के मामले में हैदराबाद 15,138 घरों के साथ 10 शहरों की सूची में सबसे कम शहरों में से एक है

Moneybhaskar.com

Nov 22,2019 12:13:00 PM IST

नई दिल्ली : रियल एस्टेट सर्वे कंपनी प्रॉपटाइगरडॉटकॉम के मुताबिक मुंबई महानगर क्षेत्र (एमएमआर) में आधे से अधिक आवास परियोजनाएं जो पांच साल से अधिक की देरी से चल रही हैं, ऐसी प्रोजेक्ट के 2020 के बाद तक पूरा होने की संभावना है। एक विश्लेषण के अनुसार जिसमें देश के 10 प्रमुख आवासीय मार्केट शामिल हैं, पूरे भारत में रेरा के अंतर्गत पंजीकृत कुल 1,665 प्रोजेक्ट ऐसे है जो लगभग 5 साल की देरी से चल रहे हैं और इनके 2020 के बाद ही पूरा होने की संभावना है। इन प्रोजेक्ट में 880 प्रोजेक्ट में लगभग दो लाख से अधिक यूनिट शामिल हैं और यह एमएमआर मार्केट में मौजूद है, जिन्हें भारत के सबसे महंगे प्रॉपर्टी मार्केटों में गिना जाता है। दूसरी ओर, नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गुरुग्राम के मार्केटों में कुल 125 परियोजनाएँ देरी से चल रही हैं, जिनमें एक लाख से अधिक आवास यूनिट्स शामिल हैं।

यूनिट्स की संख्या के मामले में हैदराबाद 15,138 घरों के साथ 10 शहरों की सूची में सबसे कम शहरों में से एक है

एलारा टेक्नोलॉजीज के ग्रुप सीओओ मणि रंगराजन, जो देश का रियल एस्टेट टेक्नोलॉजी प्लेटफार्म है और हाउसिंगडॉटकॉम, मकानडॉटकॉम व प्रॉपटाइगरडॉटकॉम की मालिकाना कंपनी है, ने बताया कि “लिक्विडिटी की समस्या सबसे जटिल है, जो भारत में प्रोजेक्टों में देरी का सबसे बड़ा कारण है। प्रोजेक्ट की देरी की वजह से खरीददारों के मन में नकारात्मक छवि बन जाती है। इस छवि को सुधारने के लिए एआईएफ के रूप में सरकार द्वारा विस्तारित 25,000 करोड़ रुपये मिलने से बहुत बदलाव देखने को मिलेगा।'' उन्होंने आगे कहा कि एमएमआर में आवास परियोजनाएं के एआईएफ के शर्तों को पूरा करने की अधिक संभावना हैं। इसका मतलब होगा कि फंड का एक बड़ा हिस्सा मुंबई के बाजार में परियोजनाओं को पूरा करने पर खर्च किया जा सकता है। क्योंकि मुंबई एक महंगा प्रॉपर्टी बाजार है, इसलिए यहां पूरी होने वाली परियोजना की लागत अंतिम कीमत वसूली की तुलना में कम होगी। यह केवल मुंबई के मामले को आगे बढ़ाने में मदद करेगा। इसके अलावा परियोजना में देरी के लिहाज से हैदराबाद और पुणे के आंकड़े एमएमआर जैसे हैं, जहां क्रमशः 276 और 241 आवास परियोजनाओं पांच वर्षों से अधिक की देरी से चल रहे हैं। हालांकि यूनिट्स की संख्या के मामले में हैदराबाद 15,138 घरों के साथ 10 शहरों की सूची में सबसे कम शहरों में से एक है।

एमएमआर में आवास परियोजनाओं के लिए बजट सीमा 2 करोड़ रुपए रखी गई है

पुणे में 47,000 से अधिक आवास यूनिट्स आधे दशक से अधिक की देरी से चल रहे हैं और डाटा के मुताबिक 2020 के बाद पूरा होने की सम्भावना है । साथ ही, चेन्नई में सबसे कम 24 विलंबित परियोजनाएं हैं जिसमें 11,679 यूनिट शामिल हैं, क्योंकि इस प्रॉपर्टी के मार्केट में आवास परियोजनाओं का आकार तुलनात्मक रूप से छोटा है। आमतौर पर, बिल्डर्स चेन्नई में 50 यूनिट्स या उससे कम के साथ आवास परियोजनाओं को लॉन्च करते हैं, जो कि थोड़े समय में पूरा हो सकता है। ऐसी परियोजनाओं में लागत अधिक होने की संभावना भी कम होती है ।

एमएमआर में आवास परियोजनाओं के लिए बजट सीमा 2 करोड़ रुपए रखी गई है, जबकि यह अन्य बाजारों के लिए 1.50 करोड़ रुपये से कम है। इस विश्लेषण में केवल 200 स्क्वायर मीटर एरिया तक की यूनिट्स को कवर किया गया है।

नोएडा में रियल एस्टेट डेवलपर्स का साल 2017 में शहर के प्राधिकरण पर 10,200 करोड़ रुपए बकाया है

इसके अलावा विश्लेषण इन परियोजनाओं में देरी के पीछे के विशिष्ट कारण को नहीं दर्शाता है, लेकिन अधिकांश परियोजनाएं लिक्विडिटी की कमी, अप्रूवल में देरी, निर्माण गतिविधियों में समय-समय पर प्रतिबंध के कारण अटक गई हैं। हाल ही में घोषित वैकल्पिक निवेश कोष (एआईएफ) से लाभ पाने वाले बाजार सरकार की हाल ही में घोषित 25,000 करोड़ रुपये की एआईएफ की सबसे बड़ी लाभार्थी मार्केट एमएमआर की हाउसिंग मार्केट हो सकती है। हालांकि, उनकी भारी-भरकम संख्या की बजाय में यहां विलंबित परियोजनाओं की मौजूदा स्थिति पर निर्भर करता है । साथ ही एनसीआर में बड़ी संख्या में देरी वाली आवासीय परियोजनाएं एआईएफ के तहत धन प्राप्त करने के लिए मानकों पर खरा नहीं उतरेंगी।

एक प्रोजेक्ट को एआईएफ से धन प्राप्त करने के लिए कुछ मानक आवश्यक हैं , जिसमें नेट वर्थ पॉजिटिव जिसका मतलब है कि इन परियोजनाओं की पूरा करने में आने वाली कुल लागत और बकाया देनदारियों का मिलने वाले राशियों और इन परियोजनाओं में बिना बिकी इन्वेंट्री के मूल्य से अधिक होना चाहिए। वहीं नोएडा में रियल एस्टेट डेवलपर्स का साल 2017 में शहर के प्राधिकरण पर 10,200 करोड़ रुपये बकाया है | यह कारण है कि पिछले दो वर्षों में बकाया राशि दोगुनी हो सकती है और उनकी नेट वर्थ पाजिटिविटी पर सवाल खड़े क्र सकती है | इसके अतिरिक्त यहाँ के कई डेवलपर्स जैसे आम्रपाली, जेपी, यूनिटेक और 3 सी कंपनी को देरी और धन के दुरुपयोग के आरोप में मुकदमेबाजी में घसीटा गया है। केंद्र ने स्पष्ट किया है कि अदालतों में मुकदमेबाजी देख रही परियोजनाओं को स्ट्रेस फण्ड के तहत नहीं माना जाएगा।

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