मनी भास्कर खास /आर्थिक सुस्ती में कपड़ा व्यापार, कारोबारी थोक की जगह रिटेल में बेच रहे हैं माल

कारोबारियों की मांग- सरकार खत्म करें कपड़ा उद्योग में जीएसटी, नहीं तो हमलोग बर्बाद हो जाएंगे

Moneybhaskar.com

Sep 09,2019 04:47:01 PM IST

नई दिल्ली. ऑटो इंडस्ट्री और इंफ्रास्ट्रक्चर के बाद कपड़ा उद्योग (टेक्सटाइल सेक्टर) की भी हालत खराब है। भारत का टेक्सटाइल उद्योग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर करीब 10 करोड़ लोगों को रोज़गार देता है, जो कृषि क्षेत्र के बाद रोजगार देने वाला सबसे बड़ा क्षेत्र है। पिछले चार पांच महीने के भीतर कारोबार में 30 से 40 फीसद कमी आयी है।

रिटेल में माल बेचने को मजबूर हुए कारोबारी

चांदनी चौक के मशहूर थोक कपड़ा मार्केट कटरा नील जहां सलाना 1,000 करोड़ रुपए का कारोबार होता है, वही अब यहां के कारोबारी रिटेल में कारोबार करने को मजबूर है। कटरा नील मार्केट के प्रधान व सिमरन टेक्सटाइल के कारोबारी विनेश कुमार ने मनी भास्कर से बातचीत में कहा, 'भारत में लोगों की परचेजिंग पॉवर घट रही है। लोग जो कपड़ा पसंद करते हैं उसे खरीदने के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं। अब वे जरूरत के मुताबिक ही खरीदारी कर रहे हैं। फेस्टिवल पास होने के बावजूद बाजार में रौनक नहीं आयी है। ऐसे में कारोबार में घाटा सह रहे व्यापारी थोक की जगह रिटेल में माल बेचने को मजबूर है।' उन्होंने कहा, 'कटरा नील में अधिकतर कारोबारी रिटेल में ही व्यापार कर रहे हैं।'

दुकान का किराया भी नहीं निकल रहा है

विनेश कुमार ने मनी भास्कर से बातचीत में कहा, 'पिछले आठ महीनों से कारोबार लगभग ठप ही है। पुराने बंधे हुए ग्राहक भी अब नहीं आ रहे हैं। यहां कई ऐसे कारोबारी भी है जो किराए के दुकान में कारोबार करते हैं। वे दुकान का किराया व स्टॉफ का खर्च भी नहीं निकाल पा रहे हैं।' उन्होंने कपड़ा उद्योग में मंदी का सबसे बड़ा कारण जीएसटी को बताया। उन्होंने कहा 'सरकार अगर कपड़ा उद्योग में जीएसटी खत्म नहीं की तो हमलोग बर्बाद हो जाएंगे, कारोबार बिल्कुल ही ठप हो जाएगा।' वे कहते हैं, 'यह फैशन से जुड़ी हुई इंडस्ट्री है, जहां हर समय परिवर्तन होता रहता है। यहां एक कपड़ा अगर एक हफ्ते या महीने के भीतर नहीं बिका तो अगली बार हमें उसे आधे से भी कम दाम में बेचना पड़ता है। ऐसे में इसपर जीएसटी चार्ज लगाना काफी महंगा पड़ता है।' बता दें कि यहां एक दुकान का किराया प्रति महीना कम से कम 80 हजार रुपए से एक लाख है।

सूरत और अहमदाबाद से कम आ रहे हैं माल

कटरा नील के एक अन्य व्यापारी गुलशन ने बताया, 'यहां अधिकतर कपड़े सूरत और अहमदाबाद से आते हैं, लेकिन सूरत जैसे कपड़ा उद्योग को भी मंदी की मार झेलना पड़ रही है। वहां टेक्सटाइल बाजारों के कपड़े का थोक कारोबार आधा रह गया है। गुलशन के कहा, 'जीएसटी लागू होने के बाद ही कपड़ा उद्योग की हालत बिगड़नी शुरू हुई है। हम जीएसटी सरलीकरण को लेकर बार-बार अनुरोध कर चुके हैं किंतु कोई समाधान नहीं निकला है।' बता दें कि सूरत की साड़ी और ड्रेस मटेरियल का कपड़ा देशभर में लोकप्रिय है। उत्तर से दक्षिण तक सूरत का कपड़ा जाता है।

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