Home » Industry » ManufacturingThis village in Assam has been making green crackers for over 130 years

असम के इस गांव में 130 सालों से बन रहे हैं ग्रीन पटाखे, बाकी देश अब तक अनजान

यहां कम आवाज, कम धुआं और कम प्रकाश करने वाले पटाखे बनाए जाते हैं

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नई दिल्ली।

दिवाली करीब है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हर कोई ग्रीन पटाखे खोज रहा है। लेकिन विडंबना यह है कि कहीं भी ग्रीन पटाखे नहीं मिल रहे हैं। बाजार में कई पटाखा दुकानें ग्रीन पटाखे न बेचने के चलते बंद हो गई हैं। ऐसे में आपको असम के इस गांव के बारे में जानना चाहिए जो पिछले 130 से भी ज्यादा सालों से ग्रीन पटाखे बना रहा है। ये है असम के बरपेटा जिले का गनक्कुची गांव जहां के लोग 1885 से ही ईको-फ्रेंडली पटाखे बना रहे हैं। उनके पास एक खास फॉर्मूला है जिसकी मदद से वे ग्रीन पटाखे बनाते चले आ रहे हैं। 

 

हर मानक पर खरे उतरते हैं ये पटाखे

 

द बेटर इंडिया वेबसाइट पर प्रकाशित एक खबर के मुताबिक यहां पर एेसे पटाखे बनाए जाते हैं, जो कम आवाज, कम धुआं और कम प्रकाश करते हैं। यानी ये पटाखे हर तरीके से ग्रीन पटाखों के मानकों पर खरे उतरते हैं। यहां काम करने वाले कई पीढ़यों से ये पटाखे बना रहे हैं। इन पटाखों में बेरियम नाइट्रेट का इस्तेमाल नहीं किया जाता है, जिसे सरकार ने प्रतिबंधित किया है।

 

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कोर्ट के आदेश के बाद कमाई बढ़ने की जागी उम्मीद

 

यहां के लोगों के पास पटाखे बनाने की मशीनें नहीं हैं। सारा काम हाथों से होता है लिहाजा पटाखों की कई वैरायटी नहीं बन पाती हैं और उत्पादन का वॉल्यूम भी कम रहता है। हालांकि असम सरकार ने इन स्वदेशी पटाखा कारीगरों को कुछ इंफ्रास्ट्रक्चर मुहैया कराया हैफिर भी यहां का सालाना टर्नओवर करोड़ रुपए ही है। अब कोर्ट द्वारा ग्रीन पटाखे चलाने का आदेश देने के बाद लोगों को उम्मीद है कि उनकी कमाई में इजाफा होगा।

 

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जांच को भेजे जाएंगे ये पटाखे

 

काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (CSIR) की संस्था नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (NEERI) के वैज्ञानिकाें के बनाए ग्रीन पटाखों के नमूने और असम के इस गांव में बने पटाखों को पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव्स सेफ्टी ऑर्गेनाइजेशन (PESO) के पास जांच के लिए भेजा जा सकता है। PESO एक वैधानिक संस्था है जो एक्सप्लोसिव्स एक्ट, 1984 के तहत आने वाले उत्पादों की सुरक्षा और स्टेबलिटी के लिए मानकों का निधार्रण करती है। जैसे ही PESO इन पटाखों को मान्यता दे देगीवैसे ही बड़े स्तर पर इनका उत्पादन शुरू हो जाएगा।

 

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