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मोदी सरकार की योजना से बदली इन कारोबारियों की किस्मत, अमेरिका में बढ़ी डिमांड

वैश्विक संस्था ernst and young ने रिपोर्ट जारी कर किया खुलासा

Generic drugs holds 70 percnt market share in Pharmaceutical sector in India

नई दिल्ली। भारत के फार्मा सेक्टर में 2017 में राजस्व के लिहाज से जेनेरिक दवाओं की हिस्सेदारी 70 फीसदी से ज्यादा है। पिछले साल अगस्त में भारत सरकार की ओर से आयुष्मान भारत योजना के लॉन्च होने के बाद यह कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। प्रमुख वैश्विक पेशेवर सेवा संस्था अर्नेस्ट एंड यंग (EY) ने हैदराबाद में सोमवार से शुरू हुए 16वें बायोएशिया 2019 के पहले दिन एक रिपोर्ट पेश कर यह बात कही है।

 

दुनिया का सबसे बड़ा जेनेरिक दवा प्रदाता बना भारत
अर्नेस्ट एंड यंग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि बीते साल राजस्व के लिहाज से भारत दुनिया का सबसे बड़ा जेनेरिक दवा प्रदाता देश बन गया है। दुनियाभर की जेनेरिक दवाओं में भारत की हिस्सेदारी 20 फीसदी हो गई है। अर्नेस्ट एंड यंग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जेनेरिक दवाओं का आयात करने के लिए भारत पसंदीदा देश है और वह अपनी जरूरत की करीब 40 फीसदी जेनेरिक दवाएं भारत से आयात करता है। रिपोर्ट के अनुसार, जेनेरिक दवा निर्माता कंपनियां स्वास्थ्य देखभाल लागत कम करने के लिए भारत समेत कई देशों से पेटेंट की अनिवार्यता को समाप्त करने की अपील कर रही हैं, ताकि वे सस्ती दर पर दवाएं उपलब्ध करा सकें। 

 

आयुष्मान भारत से जेनेरिक दवा इंडस्ट्री को बड़ी आस
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत सरकार की ओर से लॉन्च की गई आयुष्मान भारत योजना से जेनेरिक दवा कंपनियों को विस्तार की उम्मीद है। आयुष्मान भारत योजना पिछले साल अगस्त में लॉन्च की गई थी। इस योजना के तहत देश के आर्थिक रूप से गरीब लोगों को पांच लाख रुपए तक के मुफ्त इलाज की सुविधा मिलती है। देश के करीब 10 करोड़ लोगों को इस योजना का लाभ देने पर कार्य किया जा रहा है। 

 

कई चुनौतियां का सामना कर रहीं कंपनियां
रिपोर्ट में कहा गया है कि जेनेरिक ड्रग सेगमेंट में बढ़ोतरी के बावजूद कंपनियां कई प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रही हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि एक तरफ खुले बाजार में मूल्य निर्धारण का दबाव बना हुआ है। दूसरी तरफ अमेरिकी जेनेरिक मूल्य निर्धारण सिस्टम से दवाओं की कीमतें कम करने का दबाव बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहले से ही कीमतों को लेकर भारी दबाव है। दूसरी तरफ अमेरिका लगातार कीमतें घटाने के लिए नए-नए रास्ते तलाश रहा है।

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