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बड़ी खबर / जल्द ही सस्ता हो सकता है आपके टीवी का बिल, TRAI जारी करेगा नया नियम

ट्राई ने माना, नए नियमों से ग्राहकों को नहीं पहुंचा कोई फायदा

TRAI looks to lower TV bills
  • नए टैरिफ नियमों ने बढ़ा दिया है ग्राहकों का टीवी बिल।
  • ट्राई के पास लगातार ग्राहकों की शिकायतें आ रही हैं।
  • टीवी बिल कम करने के लिए नई योजना पर काम कर रहा है ट्राई।

नई दिल्ली। केबल और DTH ऑपरेटर्स के लिए TRAI का नया फ्रेमवर्क 1 फरवरी से लागू हो गया था। ऐसे में अब ट्राई उपभोक्ताओं के मासिक केबल और डीटीएच बिलों को कम करने के उद्देश्य से एक परामर्श पत्र जारी करने पर विचार कर रहा है। एक अधिकारी ने बताया कि ट्राई की नई मूल्य निर्धारण प्रणाली, जिसने टीवी देखने को और अधिक किफायती बनाने का लक्ष्य रखा था लेकिन योजना के अनुसार यह  काम नहीं कर पाया है। नाम ना बताने की शर्त पर ट्राई के एक अधिकारी ने बताया कि ब्रॉडकास्टिंग टैरिफ कम करने के लिए काम जारी है। उन्होंने कहा, "हमें यह देखना होगा कि ऐसा करने के लिए किस तरह का तंत्र अपनाया जा सकता है," उन्होंने कहा कि टैरिफ में कटौती की जा सकती है। अधिकारी ने बताया कि ग्राहकों की ओर से लगातार मिल रही शिकायतों को देखते हुए ट्राई बड़ा कदम उठा सकता है। 

 टीवी चैनलों को सस्ता करने के लिए ट्राई ने लागू किया था नया टैरिफ प्लान

वहीं ट्राई हॉटस्टार, एयरटेल टीवी और सोनी लिव जैसी ओवर दी टॉप (ओटीटी) ऐप्स को टीवी चैनलों की तरह एक लाइसेंस फ्रेमवर्क के तहत लाने पर विचार कर रहा है। ट्राई ने हाल ही में टीवी चैनलों को सस्ता करने के लिए नया टैरिफ प्लान लागू किया था। ओटीटी पर टीवी चैनल्स को ऐप पर बिना किसी रेग्युलेशन के दिखाया जाता है। एक सीनियर अधिकारी ने बताया, 'टीवी प्रोग्राम का लाइसेंस रजिस्टर्ड ब्रॉडकास्टर्स को दिया जाता है। फिर ये ब्रॉडकास्टर्स लाइसेंसिंग फ्रेमवर्क के तहत कॉन्टेंट को केबल ऑपरेटर्स को देते हैं। अगर कोई थर्ड पार्टी ऐप इसी चैनल को बिना कैरिज चार्ज और लाइसेंस फीस के दिखा रहा है तो उससे असमानता आती है।' उन्होंने कहा, 'या तो दोनों को लाइसेंस व्यवस्था के अंदर लाया जाना चाहिए या किसी को भी नहीं।' इस मामले में ट्राई जुलाई-अगस्त तक एक कंसल्टेशन पेपर ला सकता है।

10 साल के लिए दिया जाता है ब्रॉडकास्टिंग लाइसेंस 


भारत में ब्रॉडकास्टिंग लाइसेंस 10 साल के लिए दिया जाता है। लाइसेंस लेने वाले को केबल टीवी (रेग्युलेशन) ऐक्ट के तहत प्रोग्रामिंग और ऐडवर्टाइजिंग कोड का पालन करना होता है। चैनलों को सूचना और प्रसारण मंत्रालय की गाइडलाइंस के मुताबिक काम करना पड़ता है। इसके उलट ऐप्स को आईटी एक्ट के तहत गवर्न किया जाता है, लेकिन इनका कोई लाइसेंस नहीं होता।

 

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