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फेक न्यूज से कम नहीं हैं ये बातें, ज्यादातर लोग मानते हैं सच

राजनीति हो या टेक्नॉलजी की दुनिया हर जगह गलतफहमियों का बोलबाला है।

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नई दिल्ली. आज कल सभी जगह फेक न्यूज का दौर चल रहा है। राजनीति हो या टेक्नॉलजी की दुनिया हर जगह गलतफहमियों का बोलबाला है। ऐसी बातें अक्सर इतने कॉन्फिडेंस से कही जाती हैं कि सब लोग उन्हें सच मान लेते हैं। टेक्नॉलजी भी इससे अछूती नहीं है। हमारे दोस्त और आसपास के लोग कई बार हमें ऐसा कुछ बता देते हैं, जिसकी पड़ताल किए बिना ही हम उसे सच मानने लगते हैं। ऐसे में कई बार हमें नुकसान तो उठाना पड़ता ही है। इसके साथ ही एक गलत जानकारी को सच मानकर अन्य लोगों को भी बताते हैं। 

 
उदाहरण के लिए कैमरे का चुनाव करना हो तो हम मेगापिक्सल गिनने लग जाते हैं। वहीं, प्राइवेट ब्राउज़िंग की बात हो तो इनकॉग्निटो पर 'आंख मूंद कर' भरोसा करने लगते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है कि हमारे पास इतना वक्त ही नहीं है कि हर बात की पड़ताल करें। लेकिन इसका एक नुकसान यह है कि हम गलत जानकारी को सही मानते हैं। आज हम ऐसी ही 4 गलतफहमियों की बात करेंगे जिन्हें लोग सच मानते हैं। 
आगे पढ़ें : सबसे सेफ है इनकॉग्निटो
चुपके से करना है ब्राउज़ तो खोलो इनकॉग्निटो 
 
यह अफवाह भी टेक्नॉलजी का इस्तेमाल करने वालों के बीच है कि इनकॉग्निटो विंडो सबसे सुरक्षित विकल्प है। हर ब्राउज़र में एक प्राइवेट विंडो का विकल्प रहता है। दरअसल, सच यह है कि आप इस विंडो में जितनी भी साइट को विजिट कर रहे हैं, आपका ब्यौरा आपके इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर और साइट से छिपा नहीं सकते। इस बात को बिल्कुल अपने दिमाग से निकाल दें कि आप इनकॉग्निटो पर कुछ भी विजिट करेंगे तो वह सिर्फ आपके और आपके कम्प्यूटर के बीच रहेगा। गूगल क्रोम पर आप इनकॉग्निटो को सीधे CTRL + SHIFT + N से खोल सकते हैं।  
आगे पढ़ें : ज्यादा मेगापिक्सर मतलब अच्छा कैमरा 
मेगापिक्सल ज्यादा तो कैमरा होगा मस्त 
 
आज कल हर स्मार्टफोन का कैमरा बहुत अच्छा है। इसका पैमाना लोगों ने मान लिया है कि अगर ज्यादा मेगापिक्सल का कैमरा है तो अच्छा होगा। लेकिन पहले समझ लीजिए कि पिक्सल आखिर होता क्या है। कोई भी तस्वीर छोटे-छोटे डॉट से मिलकर बनती है, जिन्हें पिक्सल कहा जाता है। इनसे मिलकर ही तस्वीर तैयार होती है। यह आम तौर पर आपको फोटो में नज़र नहीं आते। जबकि कैमरे की गुणवत्ता तय होती है कैमरा लेंस, लाइट सेंसर, इमेज प्रोसेसिंग हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर की जुगलबंदी से। उदाहरण के लिए आईफोन एक्स में 12 मेगापिक्सल का रियर और 7मेगापिक्सल फ्रंट कैमरा है। इसके बावजूद वह आजकल मार्केट में आ रहे 25 मेगापिक्सल वाले फोन से ज्यादा अच्छे फोटो लेता है। ऐसे में आपकी जानकारी के लिए बता दें कि, अतिरिक्त मेगापिक्सल सिर्फ आपकी प्रिंट की गई तस्वीर में सहायक हो सकते हैं। 
आगे पढ़ें : ज्यादा कोर मतलब अच्छा प्रोसेसर 
प्रोसेसर हो ज्यादा कोर वाला 
 
मल्टी कोर प्रोसेसर आपके फोन के कामों को एक-दूसरे में बांट देते हैं, जिससे टास्क जल्दी संभव हो। डुअल कोर, ऑक्टा कोर, क्वाड कोर किसी भी सीपीयू के प्रोसेसर में काेर की संख्या बताते हैं। डुअल मतलब 2, ऑक्टा का मतलब 8 और क्वाड का मतलब 4 होता है। क्वाड कोर प्रोसेसर सिंगल और डुअल कोर प्रोसेसर से उसी दशा में तेज़ हो सकता है, जब उसे दिए गए काम उसकी क्षमताओं से मेल खाते हों। कुछ ऐप खास तौर से सिंगल या डुअल कोर प्रोसेसर पर चलने के लिए बने होते हैं। ये ज्यादा पावर वहन नहीं कर पाते। इसके साथ ही अतिरिक्त कोर से यूज़र अनुभव में कोई सुधार नहीं आता। उदाहरण के लिए ऑक्टा कोर प्रोसेसर पर चल रहे एचडी वीडियो की गुणवत्ता फोन के इंटीग्रेटेड ग्राफिक्स की वजह से भी बिगड़ सकती है।  
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ऐप्पल के सिस्टम में वायरस नहीं आता 
 
एप्पल प्रीमियम स्मार्टफोन बातनी है। ऐसे में जो लोग आईफोन यूज करते हैं। वो उसे हमेशा अच्छा बताते हैं। आपके भी किसी न किसी दोस्त ने यह जरूर कहा होगा कि एप्पल के फोन या सिस्टम में कभी वायरस नहीं आता। दरअसल, दुनिया में ऐसा शायद ही कोई सिस्टम बना है, जिसमें वायरस का प्रवेश ना हो सकता हो। हां यह जरूर है कि एप्पल के सिस्टम का बाकी विंडोज पीसी के मुकाबले ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा है। इसका एक कारण यह भी है कि मैक से ज्यादा संख्या विंडोज़ पीसी की रही है। 
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