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'फेसबुकबाजी' ऐसे पड़ती है महंगी, आपके डाटा से खेलती हैं टेक कंपनियां

आप मुफ्त में फेसबुक यूज करने की सुविधा पा रहे हैं तो यह जान लेना जरूरी है कि कहीं न कहीं आप इसकी कीमत चुका रहे होंगे....

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नई दिल्‍ली. डाटा लीक मामले ने साबित कर दिया है कि भले ही आपको 'फेसबुकबाजी' के लिए किसी तरह के पैसे नहीं देने पड़ते हों, लेकिन इसकी कीमत कहीं न कहीं आप चुकाते हैं। साइबर एक्‍सपर्ट पहले से ही आगाह करते रहे हैं, लेकिन अब यह बात साबित हो गई है। इसकी पड़ताल के लिए मनी भास्‍कर ने मशहूर टेक एक्‍सपर्ट पवन दुग्‍गज से बातचीत की। दुग्‍गल के मुताबिक, अगर आप मुफ्त में फेसबुक यूज करने की सुविधा हासिल कर रहे हैं तो यह जान लेना जरूरी है कि कहीं न कहीं आप इसकी कीमत चुका रहे होंगे। अब डाटा ब्रोकिंग दुनिया में बड़ी इंडस्‍ट्री है। इंटरनेट पर हमारी एक्टिविटी से कंपनियां करोड़ों कमाती हैं। 

 

कहां यूज हो रहा है आपका डाटा?
दुग्‍गल के मुताबिक, डाटा मार्केट का डाटा ज्‍यादातर कंपनियां और रिसर्च फर्म या बड़ी पीआर एजेंसियां यूज करती हैं। हालांकि डाटा का सोर्स ज्‍यादातर टेक कंपनियां होती हैं। फेसबुक को पता है कि आप क्‍या शेयर कर रहे हैं, गूगल को पता है कि आप क्‍या सर्च कर रहे हैं, अमेजन को पता है कि आप क्‍या खरीदते हैं। यहां से डाटा खरीदने वाले को पता होता है कि आप क्‍या सोचते हैं, आप क्‍या खरीदना चाहते हैं, किस राजनीतिक विचारधारा को फॉलो करते हैं। इसी के आधार पर आपसे ट्रीट किया जाता है। 

 

इधर आप ने सर्च किया उधर फोन आने शुरू 
दरअसल डाटा के मार्केट में सबसे बड़ा हाथ आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस का होता है। इंटरनेट में आप जिस कंपनी की कारें सर्च कर रहे हैं, आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस उस कंपनी तक यह खबर पहुंचा देता है। अब कार कंपनी का खेल शुरू होता है। सिस्‍टम ऑन करते ही आपके सामने उसी कंपनी की कारों के विज्ञापन आते हैं। कंपनी आप पर फोन, मेल और मैसेज की बौछार कर देगी। इसी तरह से आपकी एक सर्च किसी कंपनी को पोटेंशियल बायर मुहैया करा देगी।

 

 

डाटा ऐसे बनाता-बिगाड़ता है सरकारें 
दुग्‍गल के मुताबिक, अगर फेसबुक पर किसी दल या राजनेता के खिलाफ कुछ भी विचार शेयर कर रहे हैं, तो वह आपके किसी के लिए भले ही विचार हो, लेकिन कंपनी के लिए यह एक डाटा है। फेसबुक के पास आपका ज्‍योग्राफिकल स्‍टेटस है। आपका यह डाटा, डाटा एनॉलिस्टि के पास जाएगा। जहां आपकी पंसद के हिसाब से ही आपके पास पोस्‍ट थ्रो की जाएंगी। उसी तरह की खबरों का फ्लो बढ़ जाएगा। आपको लगेगा कि आपके पसंदीदा नेता या पार्टी के साथ ही पूरा देश है। आप माउथ पब्लिसिटी शुरू कर देते हैं। नेता या पार्टी की पॉपुलैरिटी सातवें आसमान पर और इधर सरकार बन या बिगड़ गई। 

 

 

 

ये 4 कहानियां बताती हैं डाटा की असली ताकत 

  1. इसकी शुरुआत 2012 में अमेरिकी राष्‍ट्रपति चुनाव से हुई। ओबामा के लिए करीब 100 डाटा एनॉलिटिक्‍स की टीम ने काम किया। अमेरिका में महंगा इलाक बड़ी चुनौती था। यह बात उन्‍हें फेसबुक के जरिए पता चली। उसी के आधार पर कैम्‍पेन तैयार किया गया। विपक्षी रिपब्लिकन अमेरिका की सुरक्षा का मुद्दा उठा रहे थे। ओबामा लोगों को मुफ्त इलाज का वादा कर रहे थे। वह 2008 से भी बड़े अंतर से जीतने में सफल रहे।   
  2. कई मीडिया रिपोर्ट्स का दावा है कि सऊदी अरब के मौजूदा क्राउन प्रिंस मोहम्‍मद बिन सलमान ने फेसबुक को 1 अरब डॉलर की रकम सिर्फ इस बात के लिए अदा की थी कि फेसबुक सऊदी राजपरिवार के खिलाफ की जाने वाली पोस्‍ट को प्रमोट नहीं करे, ताकि अरब क्रांति के बाद उनके देश में सत्‍ता के खिलाफ लोग सड़कों पर नहीं उतरें। 
  3. ऑस्‍ट्रेलिया की सरकार ने फेसबुक पर आरोप लगाया कि 2011 के आम चुनाव के दौरान लोगों के पर्सनल डाटा का यूज किया गया। इस डाटा का यूज वोटरों को प्रभावित करने के लिए किया गया। 
  4. भारत में कैम्ब्रिज एनालिटिका की भारतीय पार्टनर Ovleno Business Intelligence (OBI) इकाई पर कई राज्‍यों के चुनावों को प्रभावित करने का आरोप लगा। आरोप है कि OBI के डाटा के जरिए 2010 के बाद से कई विधानसभा चुनावों को प्रभावित किया गया। भाजपा-कांग्रेस की ओर से एक-दूसरे पर आरोप लगाने के बाद OBI की वेबसाइट खुलनी बंद हो गई। 
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