संकट /टेलीकॉम की तरह छोटी ई-कॉमर्स कंपनियों पर लग सकता है ताला, स्टार्टअप्स को लगेगा झटका

money bhaskar

May 30,2019 12:34:59 PM IST

नई दिल्ली. अमेजन, फ्लिपकार्ट के बाद भारत के ई-कॉमर्स सेक्टर में रिलायंस की एंट्री से छोटी कंपनियों पर संकट आ गया है। टेलीकॉम सेक्टर की तरह ई-काॅमर्स में भी छोटी कंपनियों पर ताले लगने की नौबत आ गई है। छोटी ई-कॉमर्स कंपनियों को वित्तीय मदद देने वाले निवेशकों ने या तो अपने निवेश निकाल लिए हैं या वे इनमें और पैसे लगाने में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। इसकी वजह यह है कि भारत में ई-कॉमर्स उद्योग में एकीकरण होना।

छोटी ऑनलाइन कंपनियां बंद कर रही हैं कारोबार

वॉलमार्ट के निवेश वाली फ्लिपकार्ट और अमेजॉन ई-कॉमर्स उद्योग पर दबदबा बनाने में जुटी हैं। इस वजह से दूसरी कतार वाली ई-कॉमर्स कंपनियों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक करीब 40 करोड़ डॉलर का निवेश जुटाने के बाद भी पिछले कुछ महीने में शॉप क्लूज, क्राफ्ट्स विला, वूनिक, वूप्लर और एलनिक जैसी कई छोटी ऑनलाइन कंपनियां या तो अपना कारोबार बंद कर रही हैं या अपने बिजनस मॉडल में बदलाव कर रही हैं। कुछ छोटी ई-कॉमर्स कंपनियां तो अपना पूरा कारोबार ही बेचने की तैयारी में जुट गई हैं। इनमें से अधिकतर ई-कॉमर्स कंपनियां छोटे शहरों के खरीदारों को ध्यान में रखकर कारोबार कर रही थीं। इनके प्लेटफॉर्म पर छोटे कारोबारियों के प्रोडक्ट उपलब्ध थे।

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यह होगा असर


छोटी कंपनियों के मैदान में हटने से छोटे-छोटे या क्षेत्र विशेष के प्रोडक्ट को तवज्जो नहीं मिलेगी। प्रतिस्पर्धा कम होने से ग्राहक को उचित दाम नहीं मिलेंगे। सबसे ज्यादा असर रोजगार और नए उद्यमियों पर पड़ेगा। ई-कॉमर्स में कई संभावनाएं थी, इसलिए इसमें बड़े पैमाने पर स्टार्टअप्स आए। अब यह बंद होते हैं तो युवा उद्यमियों की कमर टूट जाएगी। जबकि इन कंपनियों में काम कर रहे कर्मचारियों की नौकरियां भी जाएंगी। बड़ी कंपनियां ऑटोमेशन पर काम करती हैं इसलिए यहां रोजगार के अवसर कम होंगे।

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यह भी वजह


निवेशकों की मानें तो छोटी ई-कॉमर्स कंपनियां बेहतर माल नहीं बेच रही थीं। इसके साथ ही इनकी सप्लाई चेन और इनवेंटरी का मामला कमजोर था। इन वजहों से इनके प्रोडक्ट की वापसी की दर बढ़ गयी थी। इससे ग्राहकों के इनकी वेबसाइट पर बार-बार जाने की संभावना में भी कमी आई थी। मुश्किल में घिरी ऐसी ही एक ई-कॉमर्स कंपनी के एक निवेशक ने बताया कि दो करोड़ ग्राहकों का कस्टमर बेस हासिल करने के बाद माल बेचने में तेजी और वापसी की दर में कमी लाना जरूरी होता है। लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है। हालांकि इन सभी कंपनियों के मामले में ब्रांड पर ग्राहक और विक्रेता, दोनों में भरोसा नहीं था।

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उत्पाद वापस होने से बढ़ जाता है खर्च

लॉजिस्टिक्स कंपनियों और इंडस्ट्री के सूत्रों के आंकलन के अनुसार इनमें से अधिकतर ई-कॉमर्स कंपनियों में अपैरल कैटेगरी में रिटर्न रेट 35-40% था। फ्लिपकार्ट की मिंत्रा या अमेजन फैशन के मामले में यह दर 20% के आसपास है। लॉजिस्टिक्स कंपनियों ने कहा कि रिटर्न टु ओरिजिन (जब ग्राहक किसी पैकेट को न ले) दर इन कंपनियों के लिए 10-15% तक थी। ऑल इंडिया ऑनलाइन वेंडर्स एसोसिएशन ने कहा कि औसतन किसी पैकेट के लिए शिपिंग का खर्च 65 रुपये और रिवर्स शिपिंग खर्च 75 रुपये है। एसोसिएशन के एक प्रवक्ता ने कहा कि अक्सर रिटर्न शिपमेंट में जो उत्पाद आते हैं वे डैमेज्ड होते हैं। इसके लिए विक्रेता ग्राहक पर कोई जुर्माना नहीं लगा सकते क्योंकि मार्केटप्लेस की नीतियां ऐसी हैं।

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निवेश हासिल करने के बाद भी स्थिति बिगड़ी

अंग्रेजी अखबार ईटी के मुताबिक सबसे बढ़िया फंड हासिल करने वाली शॉपक्लूज स्नैपडील के हाथ बिकने वाली है। एन ट्रैकर की एक रिपोर्ट के अनुसार क्राफ्ट्स विला भी बिकने वाली है। कंपनी ने सिकोइया कैपिटल और अन्य निवेशकों से हाल में ही पांच करोड़ डॉलर जुटाए हैं। क्राफ्ट्स विला के सह संस्थापक मनोज गुप्ता ने ईटी को बताया कि वे विलय एवं अधिग्रहण की संभावना तलाश रहे हैं। मुनाफा कमाने और तेजी से तरक्की करने के लिए यह जरूरी है। वूनिक के फाउंडर सुजायत अली ने कहा कि अपैरल के ऑनलाइन बाजार वाले मॉडल में गुणवत्ता बनाए रखना काफी मुश्किल होता है।

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सस्ते प्रोडक्ट के फेर में गुणवत्ता पर संकट

वूनिक और क्राफ्ट्सविला को इस समय रोजाना 13-16,000 ऑर्डर रोज मिलते हैं, इनकी वैल्यू करीब 700 करोड़ रुपये होती है। वूप्लर की शुरुआत इंस्टाग्राम से हुई थी। पिछले साल ही उसमें टाइगर ग्लोबल की रोपोसो ने निवेश किया था। रोपोसो के सीईओ मयंक भंगादिया ने कहा कि एप पर ग्राहकों का इंगेजमेंट काफी होता है, लेकिन हमें लगने लगा कि लोग फैशन से संबंधित कंटेंट से जल्द उबने लगते हैं। वूनिक और क्राफ्ट्स विला के लिए कपड़े बेचने वाले सूरत के एक विक्रेता ने बताया कि उनके पास हमेशा 200-600 रुपये की साड़ी लिस्ट कराने के आवेदन आते हैं। कमीशन, साड़ी बनाने का खर्च, लॉजिस्टिक आदि के बाद इस रकम में बढ़िया प्रोडक्ट उपलब्ध कराने की गुंजाइश नहीं है।

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