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    अमेरि‍का और चीन जैसा बन रहा है भारत का ई-कॉमर्स मार्केट, रह जाएंगी सि‍र्फ 2-3 बड़ी कंपनि‍यां

     
    नई दि‍ल्‍ली। भारत की ई-कॉमर्स इंडस्‍ट्री अब अमेरि‍का और चीन के मार्केट जैसी बनने की रा पर है। जैसे संकेत मिल रहे है उसे देखते हुए आने वाले कुछ साल में भारत के ई-कॉमर्स मार्केट पर केवल दो से तीन बड़ी कंपनि‍यों का ही कब्‍जा रह जाएगा। इनमें एक से दो भारतीय कंपनियां जबिक एक मल्टी नेशनल कंपनी ही रहेगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत में एक समय छोटी से छोटी कंपनी में इन्वेस्ट कर रहे इन्वेस्टर अब कंपनियों से कमाई की उम्मीद कर रहे हैं। जो कि हैवी डिस्काउंट के होड़ में मुनाफा कमाने में काफी पीछे रह गई हैं। जिसका सीधा असर आने वाले दिनों में ई-कॉमर्स मार्केट पर पड़ना तय है।
     
    मार्केट में कंसोलि‍डेशन का माहौल
     
    करीब 1 लाख करोड़ रुपए के भारतीय ऑनलाइन रि‍टेल इंडस्‍ट्री में कंसोलि‍डेशन (वि‍लय और अधि‍ग्रहण) का माहौल गर्मा गया है। सॉफ्टबैंक ने फ्लि‍पकार्ट के सामने स्‍नैपडील को खरीदने का प्रस्‍ताव रखा है। वहीं, पेटीएम और फ्लि‍पकार्ट डि‍जि‍टल पेमेंट कंपनी फ्रीचार्ज को खरीद सकती हैं। ट्रैक्‍न की रि‍पोर्ट के मुताबि‍क, साल 2017 के पहले तीन महीने में ही 2 वि‍लय और 21 अधि‍ग्रहण हो चुके हैं।
     
    भारतीय ई-कॉमर्स में बड़े वि‍लय और अधि‍ग्रहण
    अप्रैल 2017 : फ्लि‍पकार्ट में ईबे इंडि‍या के बि‍जनेस का वि‍लय।
    जुलाई 2016 : मिंत्रा ने जबॉन्‍ग को खरीदा।
    अप्रैल 2016 : फ्लि‍पकार्ट ने फोन पे को खरीदा।
    फरवरी 2016 : ओयो रूम्‍स ने जू रूम्‍स को खरीदा।
    अक्‍टूबर 2016 : फस्‍टक्राय ने बेबी ओये को खरीदा।
    मेकमाईट्रि‍प ने आईबि‍बो को खरीदा।
     
    सेलर्स के पास ऑप्‍शन होंगे कम
     
    एक्‍सपर्ट्स का कहना है कि‍ फि‍लहाल सेलर्स और वेंडर्स के पास फ्लि‍पकार्ट, स्‍नैपडील, अमेजन, पेटीएम, शॉपक्‍लूज आदि‍ कंपनि‍यां हैं। वहीं, मार्केट में कंपनि‍यां कम होने से सेलर्स के पास ऑप्‍शन कम हो जाएंगे। इसके अलावा, यदि‍ कि‍सी सेलर को एक कंपनी की पॉलि‍सी पसंद नहीं आती थी तो वह दूसरी जगह चला जाता था। कंसोलि‍डेशन के बाद ऐसा नहीं हो सकेगा।
     
    कस्‍टमर्स को नहीं मि‍लेगा हैवी डि‍स्‍काउंट
     
    टेक्‍नोपैक एडवाइजर्स के सीनि‍यर वाइस प्रेसि‍डेंट अंकुर बेसि‍न ने moneybhaskar.com को बताया कि कंसोलि‍डेशन के बाद कस्‍टमर्स को मि‍लने वाले हैवी डि‍स्‍काउंट कम हो जाएंगे क्‍योंकि‍ कंपनि‍यों का फोकस ग्रोथ पर हो जाएगा। इसके अलावा, कस्‍टमर्स को पहले से बेहतर शॉपिंग एक्‍सपीरि‍यंस मि‍लेगा। साथ ही, एक ही जगह पर कस्टमर्स को एक ही जगह पर कई प्रोडक्‍ट्स और ब्रांड्स के ऑप्‍शन मि‍ल जाएंगे।  
     
    दुनि‍या भर में केवल 2 बड़ी कंपनि‍यों ही कर रहीं हैं बि‍जनेस
     
    अंकुर बेसि‍न ने बताया कि‍ इन मार्केट को आप दो भाग में बांट सकते हैं। एक 80 फीसदी मार्केट और दूसरा 20 फीसदी मार्केट। 80 फीसदी मार्केट के तहत दुनि‍या भर में केवल दो कंपनि‍यों का ही कब्‍जा रहा है। उदाहरण के तौर पर कई जगह पर अमेजन नंबर वन है, चीन में अलीबाबा नंबर 1 है, जापान में राकूटेन है। बाकी 20 फीसदी मार्केट दूसरी कंपनि‍यों का रहता है।
     
    बेन एंड कंपनी इंडि‍या के प्रिंसि‍पल श्रीवतसन कृष्‍णनन ने बताया कि‍ मौजूदा कंसोलि‍डेशन मजबूत बि‍जनेस मॉडल के साथ बेहतर पूंजी वाली कंपनि‍यों द्वारा अनक्‍लि‍यर बि‍जनेस और नकदी संकट वाली कंपनि‍यों को खरीदने के तौर पर हो रहा है। अगले कुछ साल में हम देखेंगे कि‍ टॉप 3 कंपनि‍यों के पास 70 फीसदी तक मार्केट होगा। वैसे ही जैसा ज्‍यादातर इंटरनेशनल मार्केट्स में है।
     
    इन्‍वेस्‍टर्स ने इन स्‍ट्रैटजी के तहत लगाया पैसा
     
    अंकुर बेसि‍न ने बताया कि‍ इन्‍वेंस्‍टर्स पैसा लगाने से पहले दो-तीन बाते सोचता है। एक तो यह की वह जि‍स कंपनी में पैसा लगा रही है क्‍या वह 2 से 3 साल में उसे बेच सकते है। क्‍या वह उसका वि‍लस कर सकते हैं। या क्‍या वह कंपनी पैसा कमा सकती है या नहीं। यह कुछ हालात इन्‍वेस्‍टर्स लेकर चलते हैं। भारत में इन्‍वेस्‍टर्स को लगा था कि‍ यह भारत में कुछ ही कंपनि‍यां मार्केट लीडर्स हैं तो उन्‍होंने यह उसमें पैसा लगाया ताकि‍ वह आगे चल कर उसे दूसरी बड़ी कंपनी में वि‍लय करा सके या अपना शेयर दूसरे इन्‍वेस्‍टर्स को बेच सकें।
     
    भारत में कंपनि‍यों को यह समझ नहीं आया कि‍ पैसा कैसे बनाएं
     
    भारत में मार्केट बड़ा बनने से पहले ही कई सारी कंपनि‍यां उतर आईं। मार्केट में 6 से 7 कंपनि‍यां हो जाने से फाउंडर्स बि‍जनेस नहीं चला पाए। फाउंडर्स कॉम्‍पि‍टीशन के हि‍साब से कंपनी को चलाते गए। ऐसे में कंपनि‍यों को बि‍जनेस और पैसा बनाने का टाइम नहीं मि‍ला। जब कोई नया सेगमेंट बनता है तो पहले पैसा बनाने के बारे में सोचा जाता है फि‍र कंपनि‍यां बनती हैं। भारत में इसका उलट हुआ। यहां कंपनि‍यों को ये समझ नहीं आया कि‍ पैसा कैसे बनाना है। दो साल में हालत यह हो गई कि‍ मार्केट ज्‍यादा बड़ा नहीं हुआ है और कॉम्‍पीटि‍टर्स बहुत ज्‍यादा हो गए हैं। ऐसे में कंसोलि‍डेशन होना जरूरी भी हो गया।     

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