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खास खबर: वॉलमार्ट-फ्लिपकार्ट डील से क्‍यों डरे 3 करोड़ रिटेलर, समझिए नफा-नुकसान का गणित

नई दिल्‍ली. अमेरिकी कंपनी वॉलमार्ट और भारतीय ई-कॉमर्स प्‍लेटफॉर्म फ्लिपकार्ट की डील ने एक बार फिर भारत के खुदरा कारोबारियों की नींद उड़ा दी है। करीब 1 लाख करोड़ रुपए की इस प्रस्‍तावित डील को ऑनलाइन मार्केट के जरिए ऑफलाइन मार्केट यानी रिटेल पर विदेशी कंपनियों के कब्‍जे के तौर पर देखा जा रहा है। घबराए ट्रेडर्स सरकार से इसे रोकने को कह रहे हैं। दूसरी ओर, एक धड़ा इसके समर्थन में है जिसका कहना है कि देश में कंज्यूमर्स की संख्‍या तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में इस तरह का इन्‍वेस्‍टमेंट लंबे समय के लिए भारतीय इकोनॉमी के लिए पॉजिटिव रहेगा। 

 
2012 में तत्‍कालीन UPA सरकार ने जब मल्‍टी ब्रांड रिटेल में FDI का रास्‍ता खोलने का फैसला किया था और इसके विरोध में रातोंरात बीजेपी समेत देशभर के ट्रेडर्स खड़े हो गए थे। उस वक्‍त, गुजरात के तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी ने FDI के मसले को उठाते हुए UPA सरकार को 'विदेशियों की सरकार, विदेशियों के द्वारा, विदेशियों के लिए' बताया था। हालांकि, मई 2014 में सत्‍ता में आने के बाद मोदी सरकार ने खुद ई-कॉमर्स सेक्‍टर में 100 फीसदी FDI को मंजूरी दे दी। इसे FDI के मसले पर बीजेपी का बड़ा यू-टर्न कहा गया। आइए समझते हैं वॉलमार्ट-फ्लिपकार्ट डील के नफा-नुकसान का गणित... 
 
 

क्‍या है वॉलमार्ट-फ्लिपकार्ट डील?

अमेरिकी कंपनी वॉलमार्ट भारत की ई-कॉमर्स साइट फ्लिपकार्ट में 75 फीसदी हिस्‍सेदारी खरीदने जा रही है। फ्लिपकार्ट के बोर्ड ने इस डील को मंजूरी भी दे दी है। इस सौदे की कीमत करीब 1 लाख करोड़ रुपए आंकी जा रही है। रिपोर्ट्स के मुताबि‍क, वॉलमार्ट के साथ गूगल-पेरेंट कंपनी अल्‍फाबेट इंक भी इस इन्‍वेस्‍टमेंट में हि‍स्‍सा ले सकती है। माना जा रहा है कि 10 दि‍न के भीतर डील पूरी हो सकती है। 
 

क्‍यों यह सौदा करना चाहती है वॉलमार्ट?

ग्रेहाउंड रि‍सर्च के सीईओ संचि‍त गोगि‍या का कहना है कि वॉलमार्ट अमेरि‍का और दूसरे देशों में अमेजन को टक्‍कर देने का रास्‍ता ढूंढ रही है। ऑनलाइन सेल्‍स को बढ़ाने के लि‍ए वॉलमार्ट अमेरि‍का में हुए हालि‍या जेट.कॉम डील और चीन में जेडी.कॉम के साथ हुई डील से आगे नि‍कलना चाहती है। भारत में वॉलमार्ट को रेग्‍युलेशन के कारण मुश्‍कि‍लों का सामना करना पड़ रहा है और फ्लि‍पकार्ट में इन्‍वेस्‍टमेंट उसे ऑनलाइन रि‍टेल मार्केट में बड़ी जगह दे देगा। बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच की रि‍पोर्ट के मुताबिक, इस वक्‍त फ्लिपकार्ट 43 फीसदी से ज्‍यादा मार्केट शेयर के साथ लीडर है। अनुमान है कि 2019 में उसकी हिस्‍सेदारी 44 फीसदी शेयर तक पहुंच जाएगी। वहीं, अमेजन का मार्केट शेयर 37 फीसदी और स्‍नैपडील का मार्केट शेयर मात्र 9 फीसदी रह जाएगा।
 

कौन कर रहा है डील का विरोध? 

 

3 करोड़ रिटेलर्स को होगा सीधे नुकसान 

भारतीय ट्रेडर्स का कहना है कि वॉलमार्ट भले ही देश में ऑनलाइन मार्केट के जरिए एंट्री कर रही है लेकिन आगे चलकर वह ऑफलाइन बाजार में आएगी ही आएगी। कन्‍फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) के सेक्रेटरी जनरल प्रवीण खंडेेलवाल का कहना है कि ऐसी कंपनियां दुनिया में से कहीं से भी सामान लाएंगी और देश को डंपिंग ग्राउंड बना देंगी। भारतीय रिटेलर्स के लिए लेवल प्‍लेइंग फील्‍ड बराबर का नहीं रहेगा और वे कॉम्पिटीशन में पिछड़ जाएंगे। उनका बिजनेस बर्बाद हो जाएगा। उनका कहना है कि देश में इस वक्‍त लगभग 7 करोड़ रिटेलर्स हैं, जिनमें से लगभग 3 करोड़ रिटेलर्स को इस डील से सीधे तौर पर नुकसान होने वाला है। 
 

5-6 लाख नौकरियों पर खतरा 

खंडेलवाल का कहना है कि भारत के ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों सेगमेंट के रिटेलर्स को मिलाकर कुल 40 लाख करोड़ रुपए सालाना का रिटेल कारोबार होता है और कम से कम 20 लाख करोड़ के बिजनेस को इससे नुकसान होने वाला है। जहां तक जॉब लॉस की बात है तो रिटेलर्स कां धंधा गिरने से वे लोगों को निकालेंगे ही, इससे 5-6 लाख लोगों की नौकरी पर खतरा मंडराने लगेगा। 
 

कोर्ट तक जाने को तैयार हैं रिटेलर

2012 में जब मल्‍टीब्रांड रिटेल में 51 फीसदी FDI को मंजूरी मिली थी, तो रिटेल कारोबारियों ने इसका पुरजोर विरोध किया था। खंडेलवाल का कहना है, अभी उस वक्‍त जैसे हालात नहीं हैं। लेकिन, हमने इस डील को रोकने के लिए सरकार से अपील की है। कॉमर्स मिनिस्‍ट्री को CAIT की तरफ से ज्ञापन देकर इस मामले में दखल देने के लिए कहा गया है। खंडेलवाल के मुताबिक, अगर सरकार इस मामले में कोई कदम नहीं उठाती है तो फिर ट्रेडर्स आंदोलन करेंगे और कोर्ट भी जाएंगे। यह पूछे जाने पर कि अगर सरकार कोई बीच का रास्‍ता निकाल ले तो क्‍या ट्रेडर्स मानेंगे, इस पर उन्‍होंने कहा कि पहले हम देखेंगे कि वह रास्‍ता क्‍या है। अगर कोई ऐसा रास्‍ता निकलता है, जिससे इस डील से ट्रेडर्स और रिटेलर्स को कोई नुकसान न हो तो इस पर विचार किया जा सकता है। 
 

क्‍यों कर रहे हैं विरोध?

 

ई-कॉमर्स के लिए FDI कानूनों को नहीं हो रहा पालन 

CAIT के मुताबिक, FDI की 2016 की पॉलिसी के मुताबिक, ई-कॉमर्स प्‍लेटफॉर्म केवल बायर-सेलर प्‍लेटफॉर्म रहेंगे। वे खुद के प्रोडक्‍ट नहीं बेच सकते हैं। लेकिन ये प्‍लेटफॉर्म नियमों के खिलाफ जाकर अपनी शेल कंपनियों के जरिए खुद के प्रोडक्‍ट भी अपने प्‍लेटफॉर्म पर बेचने लगे हैं। यहां तक कि माल रखने के लिए उनके वेयरहाउस भी हैं। दूसरा वे कीमतों के मामले में भी ग्राहकों को लुभाते हैं, जो पॉलिसी का उल्‍लंघन है। इसकी वजह है कि देश में ई-कॉमर्स सेगमेंट के लिए कोई ठोस नियम-कानून नहीं हैं। फ्लिपकार्ट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड इनकम टैक्‍स डिपार्टमेंट के समक्ष यह स्‍वीकार चुकी है कि वह होलसेल में काफी ज्‍यादा डिस्‍काउंट की पेशकश कर रही है और यह उसकी मार्केटिंग स्‍ट्रैटेजी का हिस्‍सा है। लेकिन सरकार इस पहलू पर गौर नहीं कर पा रही है। 
 

क्‍या कर रहे हैं डिमांड? 

CAIT का कहना है कि सरकार को चाहिए कि वह इस नियम को अनिवार्य करे कि वॉलमार्ट-फ्लिपकार्ट जैसी डील तभी हो सकेगी, जब ई-प्‍लेटफॉर्म के 75 फीसदी सेलर्स अपनी मंजूरी दे दें। ऐसा इसलिए क्‍योंकि सबसे ज्‍यादा नुकसान उन्‍हीं को होने की गुंजाइश रहती है। 
CAIT ने सरकार से ई-कॉमर्स के लिए जल्‍द से जल्‍द पॉलिसी और रेगुलेटरी अथॉरिटी का गठन करने की भी अपील की है। उनका कहना है कि जब तक यह अथॉरिटी न बन जाए इस तरह की किसी भी डील को मंजूरी न दी जाए। 
 
आगे पढ़ें- कौन कर रहा डील का समर्थन 

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