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कुल्लू दशहरा शुरू, लाखों की संख्या में पहुंचेंगे सैलानी

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में 7 दिवसीय अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव आज से शुरू हो गया है।

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नई दिल्ली: हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में 7 दिवसीय अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव आज से शुरू हो गया है। उत्सव की तैयारियों को लेकर बीते बुधवार को जिला प्रशासन और जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने आयोजन स्थल ढालपुर मैदान और लाल चंद प्रार्थी कला केंद्र के आस-पास मॉक ड्रिल कर आपदा प्रबंधन का अभ्यास किया था। इस मॉक ड्रिल में हिमाचल प्रदेश पुलिस के अलावा होमगार्ड, अग्निशमन और पुलिस प्रशासन के अधिकारियों और कर्मचारियों के अलावा विभिन्न विभागों और नगर परिषद के अधिकारियों-कर्मचारियों, नेहरू युवा केंद्र और अन्य संस्थाओं के कार्यकर्ताओं, राष्ट्रीय एंबुलेंस सेवा के कर्मचारियों ने भी भाग लिया। 

 

अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव को कुल्लू दशहरा के नाम से भी जाना जाता है। यह 19 से 25 अक्टूबर तक चलेगा। कुल्लू में 7 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव को देखने के लिए भारत ही नहीं विदेशों से भी लोग यहां पहुंचते हैं। यह उत्सव ऐसे ही अंतरराष्ट्रीय उत्सव नहीं बना है इसके पीछे ऐसे की कारण हैं जिन्होंने इसे पहले राज्य फिर देश और अब अंतरराष्ट्रीय उत्सव बना दिया है। इस उत्सव में ना तो रावण का वध होता है और ना ही रामलीला का आयोजन किया जाता है। यह 17वीं शताब्दी में शुरू हुआ था। आज इसे देखने के लिए रोजाना हजारों-लाखों लोग शिरकत करते हैं। आज के समय में इस उत्सव में करोड़ों का व्यापार किया जाता है। 

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क्या है कुल्लू दशहरा का इतिहास
बताया जाता है कि 17वीं शताब्दी में कुल्लू के राजा जगत सिंह के हाथों एक ब्राह्मण की मौत हो गई थी। इसके बाद राजा जगत ने प्रायश्चित करने के लिए अपने सिंहासन का त्याग कर दिया और उस पर भगवान रघुनाथ की मूर्ति को विराजमान कर दिया। इसके साथ ही राजा जगत सिंह ने कसम खाई कि अब से इस कुल्लू साम्राज्य पर केवल भगवान रघुनाथ के वंशज ही राज करेंगे। कथाओं की मानें तो राजा जगत, प्रभु राम की एक मूर्ति को लाने के लिए उनके जन्मस्थान अयोध्या पहुंचे। कुछ दिन बाद वापस आने पर राजा जगत ने प्रभु राम की उस मूर्ती को अपने सिंहासन पर स्थापित कर दिया। कुल्लू के लोगों का ऐसा मानना है कि दशहरा के दौरान प्रभु रघुनाथ स्वर्ग से और भी देवताओं को यहां बुलाते हैं। 

 

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आम दशहरा से थोड़ा अलग मनाया जाता है कुल्लू दशहरा
कुल्लू में दशहरा मनाने का तरीका छोड़ा अलग तरह का है। दशहरे के दिन श्रद्धालु यहां अलग-अलग भगवानों की मूर्तियों को अपने सिर पर उठा कर प्रभु राम से मिलने के लिए मंदिर पहुंचते हैं। मंदिर के मैदान में सैंकड़ों की संख्या में भगवानों को लाया जाता है। इनमें कुल्लु की कुल देवी हडिंबा माता भी मौजूद होती हैं। सात दिनों तक चले इस उत्सव के आखिरी दिन  लोग खूब सारी लकड़ियों को एकत्रित करके उसे जला देते हैं। ऐसा करने के पीछे लोगों का मानना है कि वे रावण के घर यानी की लंका को जला रहे हैं। 

 

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