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खास खबर: भारतीयों को सिखाई ऑनलाइन शॉपिंग, ऐसी थी बंसल दोस्तों की जोड़ी

फ्लिपकार्ट के इस 11 साल के सफर को बनाने में दो शख्स का सबसे अहम हाथ रहा है। वह हैं उसके को-फाउंडर और दोस्त सचिन बंसल और

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नई दिल्‍ली. देश की सबसे बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट बिककर अमेरिकी कंपनी वॉलमार्ट के हाथों में चली गई है। दुनिया की सबसे बड़ी रिटेल कंपनी वॉलमार्ट पिछले दो साल से इस डील को करने की कोशिशों में लगी हुई थी। उसे डर था कि कहीं अमेजन, फ्लिपकार्ट को खरीद कर बाजी न मार जाय। इसीलिए उसने दुनिया की सबसे महंगी ई-कॉमर्स डील कर 1.07 लाख करोड़ रुपए में फ्लिपकार्ट की 77 फीसदी हिस्सेदारी खरीद ली। आखिर ऐसा क्या था कि मात्र 11 साल में 2 कमरों के फ्लैट से शुरू हुई फ्लिपकार्ट अमेरिका की दिग्गज कंपनियों की फेवरेट बन गई। फ्लिपकार्ट के इस 11 साल के सफर को बनाने में दो शख्स का सबसे अहम हाथ रहा है। वे हैं उसके को-फाउंडर और दोस्त सचिन बंसल और बिन्नी बंसल। इन दोनों ने साबित किया कि भारतीय कंज्यूमर ऑनलाइन शॉपिंग कर सकता है। बशर्ते कि उसको भारतीय कंज्यूमर माइंडसेट के अनुसार शॉपिंग एक्सीपीरियंस दिया जाय। 

 

बंसल दोस्‍तों ने भारत को बनाया हॉट

साल 2007 में दो कमरे के फ्लैट से शुरू हुई फ्लिपकार्ट पर पहले शॉपिंग प्रोडक्ट किताब को रखने से लेकर वॉलमार्ट को बिकने तक की स्ट्रैटेजी बहुत खास रही है। दोनों दोस्तों ने भारत में फ्लिपकार्ट को सफल बनाकर 2080 करोड़ डॉलर (1.39 लाख करोड़ रुपए) तक पहुंचाने का रास्ता तैयार किया है। साथ ही अमेरिका और दुनिया की दो दिग्गज कंपनियों के लिए भारत को सबसे अहम मार्केट के रुप में खड़ा कर दिया। आइए जानते हैं सचिन और बिन्नी बंसल ने कैसे छोटी-छोटी बातों को ध्यान रखकर आज भारत को दुनिया की सबसे बड़ी ऑनलाइन डील का गवाह बना दिया... 

 

 

मौके को बेहतर तरीके से भुनाया 


इमेज गुरु दिलीप चेरियन ने money.bhaskar.com को बताया कि भारत में ऑनलाइन शॉपिंग का जो बाजार डेवलप हुआ है, उसको बनाने में फ्लिपकार्ट का अहम रोल रहा है। फ्लिपकार्ट ने जिस तरह से मोबाइल के जरिए ऑनलाइन शॉपिंग को आसान बनाया वो उसके बिजनेस को बढ़ाने में सबसे अहम कदम था। इसके अलावा कंपनी ने जो समय - समय पर मर्जर और अधिग्रहण किए उससे फ्लिपकार्ट को मार्केट में अपनी हिस्‍सेदारी बढ़ाने में मदद मिली। इसका फायदा उन्‍हें अच्‍छे इन्‍वेस्‍टमेंट के रूप में भी मिला। हालांकि इतना होने के बावजूद भी फ्लिपकार्ट अभी तक मुनाफा नहीं कमाई पाई है, यही दूसरी कंपनियों के लिए भी चैलेंज है। 

 

 

यूं समझीं भारत की जरूरतें  

सचिन और बिन्नी एक समय अमेरिका में अमेजन में साथ में काम करते थे। वहीं उन्होंने ई-कॉमर्स बिजनेस मॉडल को समझा और भारत में नई संभावनाओं को भी महसूस किया। उनका मानना था कि भारत जैसे देश में जहां दूर-दराज के इलाकों में कई चीजें नहीं पहुंच पाती, बाजार काफी दूर हैं और कई जगहों पर सब चीज उपलब्‍ध होना संभव नहीं है, ऐसे में एक ऑनलाइन प्‍लेटफॉर्म इस गैप को भर सकता है। इस जरूरत के चलते भारत में ई-कॉमर्स का बाजार खड़ा हो सकता है।

 

 

बेहद खास स्ट्रैटेजी से किताब को बनाया पहला प्रोडक्ट

ई-कॉमर्स के लिए कंसल्‍टैंसी फर्म टेक्‍नोपैक एडवाइजर में सीनियर वाइस प्रेसिडेंट अंकुर बिसेन ने money.bhaskar.com को बताया कि किताबों को खरीदने के लिए ज्‍यादा सोचने और देखने-परखने की जरूरत नहीं होती। लोग नाम देखते हैं, राइटर देखते हैं और खरीद लेते हैं। इस बात को समझकर अमेजन ने भी किताबों की बिक्री से ही शुरुआत की थी और इसीलिए फ्लिपकार्ट ने भी एक्‍सपेरिमेंट के तौर पर पहले प्रोडक्‍ट के तौर पर किताबों को ही चुना। 

 

 

कैश ऑन डिलीवरी और रिटर्न पॉलिसी से पकड़ी कंज्यूमर की नब्ज

भारतीय कंज्यूमर शॉपिंग करते समय काफी सोच-समझ कर फैसले करते हैं। ऐसे में अमेरिकी मॉडल यानी पहले पेमेंट बाद में डिलीवरी भारत में आसान नहीं था। इसी माइंडसेट को समझते हुए साल 2010 में फ्लिपकार्ट ने कैश ऑन डिलीवरी सर्विस शुरु की। यानी पहले प्रोडक्ट देखो-परखो, फिर पैसा दो। यह स्ट्रैटेजी काम कर गई। अंकुर के मुताबिक, फ्लिपकार्ट के पास आने वाले ऑर्डर्स में से 90 फीसदी कैश ऑन डिलीवरी के रहने लगे। यह स्ट्रैटेजी इतनी कामयाब है कि अभी भी 60 फीसदी ऑर्डर इसी से मिलते हैं। इसके बाद कंपनी ने रिटर्न पॉलिसी देकर भी कन्ज्‍यूमर का भरोसा अपने ऊपर और बढ़ा लिया।

 

 

टाइम से मिले प्रोडक्ट, उसके लिए किया खास एक्सपेरीमेंट

अंकुर कहते हैं कि फ्लिपकार्ट की सबसे बड़ी स्‍ट्रेंथ उसका बदलते ट्रेंड को भांपना और उसे अपनाना रहा। सही मौकों पर नई चीजों और कैटेगरीज को जोड़ना फ्लिपकार्ट की कामयाबी में टर्निंग प्‍वॉइंट साबित हुआ। इसमें एक खास स्‍ट्रैटेजी खुद के वेयरहाउस और लॉजिस्टिक्‍स सर्विस शुरू करने की भी रही। यह चीज ई-कॉमर्स के लिए एक तरह से नई थी। क्‍योंकि कंपनी शुरुआती दौर में थी तो उसके पास सेलर्स भी नहीं थे, लिहाजा फ्लिपकार्ट ने खुद ही सेलर की भूमिका निभाई। इस तरह से कंपनी ने ई-कॉमर्स के लिए नए रूल बनाए और नए पैमाने सेट किए। 

 


थर्ड पार्टी सेलर्स को जोड़कर घर-घर पहुंचे

2013 आते-आते कंपनी भारत के ई-कॉमर्स सेगमेंट की पहचान बन चुकी थी। ऑर्डर्स बढ़ने के साथ ही लोगों की प्रोडक्‍ट्स में वैरायटीज को लेकर अपेक्षाएं बढ़ चुकी थीं। इस चीज को समझकर कंपनी ने 2013 में कंपनी ने अपने साथ थर्ड पार्टी सेलर्स को जोड़ा। कस्‍टमर्स को यह चीज पसंद आई और सेल्‍स में अच्‍छी ग्रोथ दिखी। 

 

 

ग्लोबल इन्वेस्टर्स को लुभाया

2009 तक यूरोप, अमेरिका, चीन जैसे देशों में ई-कॉमर्स सेगमेंट काफी आगे बढ़ चुका था लेकिन भारत में यह उस वक्‍त शुरुआती मोड में ही था। उस वक्‍त बैंकों से स्‍टार्टअप के लिए लोन लेना आसान नहीं था। लेकिन देश में ई-कॉमर्स के लिए पोटेंशियल बहुत था। इसी चीज को स्‍ट्रेंथ बनाते हुए कंपनी ने यूरोप, अमेरिका जैसे देशों में इन्‍वेस्‍टमेंट करने वाली कंपनियों को लुभाया। फ्लिपकार्ट ने उन्‍हें भारत फ्यूचर ग्रोथ वाले ई-कॉमर्स मार्केट का पोटेंशियल दिखाते हुए इन्‍वेस्‍टमेंट के लिए कन्विंस किया। अक्‍टूबर 2009 में कंपनी को एसेल पार्टनर्स के तौर पर अपना पहला इन्‍वेस्‍टर मिला। उसके बाद सचिन और बिन्‍नी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। धीरे-धीरे अन्‍य इन्‍वेस्‍टर्स भी कंपनी से जुड़ते चले गए। इनमें अमेरिकी हेज फंड टाइगर ग्‍लोबल, टेंसेंट, ईबे और माइक्रोसॉफ्ट, सॉफ्टबैंक जैसे नाम शामिल हैं।

 

 

डील से पहले फ्लि‍पकार्ट के टॉप शेयरहोल्‍डर्स

शेयरहोल्‍डर हि‍स्‍सेदारी
सॉफ्टबैंक 20.8 %
टाइगर ग्‍लोबल 20.6 %
नेस्‍पर  12.8 %
टेनसेंट 5.9 %
ईबे सिंगापुर 6.1 %
एक्‍सेल पार्टनर्स 6.4 %
बि‍न्‍नी बंसल 5.25 %
सचि‍न बंसल 5.55 %

 

आगे पढ़ें- कॉम्पिटीशन में बने रहने के लिए अपनाई मर्जर की स्‍ट्रैटेजी 

अमेजन, स्नैपडील से टक्‍कर के लिए मर्जर की अपनाई स्ट्रैटेजी 

2013 तक कंपनी ने भारत में ई-कॉमर्स मार्केट को ऊंचाई पर पहुंचा दिया था। अब अन्‍य कंपनियां भी भारतीय मार्केट में संभावनाएं तलाश रही थीं। फ्लिपकार्ट ने जो शुरुआत की थी, उसे अब हर कोई भुनाना चाहता था। स्‍नैपडील पहले से मार्केट में आ चुकी थी और अब अमेजन भारत में फ्लिपकार्ट की प्रतिद्वंदी बनकर खड़ी हो गई। लेकिन एक ओर जहां अमेजन भारत में नई थी, वहीं फ्लिपकार्ट को यहां के लोगों की जरूरत और उनकी सोच का काफी अंदाजा हो चला था। 2014 में फ्लिपकार्ट ने बढ़ते कॉम्पिटीशन को देखते हुए मर्जर व एक्‍वीजीशन पर दांव खेला। कंपनी ने 2014 में कई प्‍लेटफॉर्म को खरीदा। इनमें वीरीड, लेट्सबाय, एफएक्‍स मार्ट, मिंत्रा और यूपीआई पेमेंट स्‍टार्टअप फोन पे जैसे नाम शामिल हैं। कंपनी ने आफ्टर सेल्‍स प्रोवाइड जीव्‍स और पेमेंट्स प्‍लेटफॉर्म नागपे में बड़ी हिस्‍सेदारी खरीदी। साल खत्‍म होते-होते कंपनी 11 अरब डॉलर की वैल्‍युएशन वाली हो गई। इसके अलावा फ्लिपकार्ट पहली ऐसी भारतीय ऑनलाइन रिटेल फर्म बनी, जिसकी ग्रॉस मर्चेंडाइज वैल्‍यु 1.9 अरब डॉलर रही। 

 

आगे पढ़ें- भारत के ई-कॉमर्स में दो अमेरिकी कंपनियां भिड़ीं

दो अमेरिकी कंपनियां भारत में भिड़ीं 

फ्लिपकार्ट की मार्केट में पैठ को देखते हुए वॉलमार्ट के साथ-साथ अमेजन भी इसे खरीदने की रेस में शामिल थी। अमेजन, फ्लिपकार्ट में 60 फीसदी हिस्‍सेदारी खरीदना चाहती थी। एक टीवी चैनल की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके लिए अमेजन ने 2 अरब डॉलर (13,200 करोड़ रुपए) की ब्रेकअप फी का ऑफर दिया था। लेकिन वह इसे खरीदने में नाकामयाब रही और वॉलमार्ट बाजी मार ले गई। फ्लिपकार्ट का भारत के 40 फीसदी ऑनलाइन रिटेल मार्केट पर कब्जा है। रिसर्च कंपनी फॉरेस्टर के मुताबिक अमेजन फिलहाल फ्लिपकार्ट से पीछे है। क्रिसिल रिसर्च के डायरेक्‍टर अजय श्रीनिवासन का कहना है कि दुनिया की बड़ी कंपनियों के लिए भारत के कंजंप्‍शन मार्केट का आकर्षण बढ़ रहा है और यह डील इसी को दर्शाती है।  

 

आगे पढ़ें- फ्लिपकार्ट से अलग हो गए सचिन बंसल 

सचिन को अलग होने का है दु:ख

वॉलमार्ट डील के साथ ही फ्लिपकार्ट के को-फाउंडर्स में से एक सचिन बंसल ने अपनी 5.5 फीसदी हिस्‍सेदारी भी वॉलमार्ट को बेच दी है और कंपनी से नाता तोड़ लिया है। हिस्‍सेदारी को बेचकर सचिन बंसल को लगभग 6700 करोड़ रुपए मिले हैं। लेकिन वह कंपनी को छोड़कर खुश नहीं हैं। उन्‍हें फ्लिपकार्ट से अपना 10 साल पुराना नाता टूटने का दुख है। सचिन ने अपनी एक फेसबुक पोस्‍ट में लिखा है कि मुझे दुख है कि फ्लिपकार्ट में मेरा काम खत्‍म हो गया और अब 10 साल बाद मेरा इसे छोड़ने और किसी और को जिम्‍मेदारी देने का वक्‍त है। मैं बाहर रहकर फ्लिपकार्ट का भविष्‍य के लिए उत्‍साह बढ़ाऊंगा। फ्लिपकार्ट इंप्‍लॉइज के लिए मेरा यही कहना है कि आप अच्‍छा कर रहे हैं और आगे भी इसी चीज को बनाए रखें। 

 

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