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    वुडन हैंडीक्राफ्ट के 4,000 करोड़ के बिजनेस पर खतरा, इंटरनेशनल नियमों ने बढ़ाई परेशानी

    नई दिल्ली। इंटरनेशनल नियमों की वजह से देश की 4,000 करोड़ रुपए की वुडन हैंडीक्राफ्ट इंडस्ट्री के नए नियमों पर खतरा मंडरा रहा है। बीते महीने वुडन हैंडीक्राफ्ट एक्सपोटर्स के लिए ‘वृक्ष सर्टिफिकेट’ लेना अनिवार्य कर दिया है। इससे उनके लिए एक्सपोर्ट करना मुश्किल हो गया है।
     
    क्या है सीआईटीईएस
     
    कंन्वेशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड इन एनडेंजर स्पीसिज ऑफ वाइल्ड फाउना एंड फ्लोरा (सीआईटीईएस) एक इंटरनेशनल ट्रीटी है, जिसने 182 देशों के लिए नियमों में बदलाव किया है। सीआईटीईएस का मकसद लुप्त होने वाले वाइल्ड लाइफ और पेड़ों को सुरक्षित करना है। इंटरनेशनल बॉडी सीआईटीईएस ने दलबर्जिया एसपीपी (शीशम और रोजवूड लकड़ी) को अपेंडिक्स टू यानी लुप्त होने वाले पेडों की के केटेगरी में डाल दिया है। 
     
    इंटरनेशनल एजेंसी ने बढ़ाई मुश्किलें
     
    सीआईटीईएस के ऐसा करने से इंडियन वुड एक्सपोर्टर अमेरिकी और यूरोपीय बाजार के लिए एक्सपोर्ट नहीं कर पा रहे थे। इससे हैंडीक्राफ्ट वुड एक्सपोर्टर का 4,000 करोड़ रुपए का कारोबार दांव पर लग गया। इंडियन गवर्मेंट के दखल देने पर सीआईटीईएस बार कोड और वृक्ष सर्टिफिकेट लेने में 15 दिन का समय और फीस दोनो लगते हैं। इसके कारण एक्सपोटर्स को ऑर्डर भेजने में देरी हो रही है।
     
    शीशम और रोजवूड लकड़ी की नहीं है कमी
     
    एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ हैंडीक्राफ्ट (ईपीसीएच) के एक्जक्यूटिव डायरेक्टर राकेश कुमार ने moneybhaskar.com  को बताया कि  इंडिया में शीशम और रोजवूड लकड़ी की कोई कमी नहीं है। अमेरिका और यूरोपीय देशों में इसकी कमी है जिसके कारण इसे अपेन्डिक्स टू में डाला गया है। उन्होंने सरकार को सीआईटीईएस में इंडिया का पक्ष रखने और इसे अपेन्डिक्स टू से हटवाने के लिए कह है। एक्सपोटर्स ये चाहते हैं कि वह पहले की तरह बिना ‘वृक्ष सर्टिफिकेट’ के एक्सपोर्ट कर पाएं।
     
    क्या हैवृक्ष सर्टिफिकेट
     
    ‘वृक्ष सर्टिफिकेट’ का मतलब होगा कि कारोबारी ने लकड़ी की पैदावार और खरीद कानूनी तरीके से की है। इसके जरिए इंटरनेशनल बॉडी और सरकार वुड के गैरकानूनी तरीके से बेचने और खरीदने के तरीके को रोकना है।
     
    अगली स्लाइड में जानें –कितना बड़ा है कारोबार..

     

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