मोदी के स्मार्ट सिटी के आइडिया से पहले ही यह कस्बा बिना खर्च बन गया था स्मार्ट

  • देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर के पास स्थित है गौतमपुरा कस्बा
  • लोग गर्व से कहते हैं कि ऐसे जनप्रतिनिधि हर जगह हों तो सारे शहर सुधर जाएं

money bhaskar

Apr 13,2019 01:35:00 PM IST

नई दिल्ली. शहर से करीब 56 किलोमीटर दूर एक ऐसा शहर जहां है भरपूर पानी। साफ रोड। प्राइवेट को मात देते सरकारी अस्पताल। हर घर में आरओ प्लांट से पानी की सप्लाई। प्रदूषणमुक्त पब्लिक ट्रांसपोर्ट ई-रिक्शा। हर घर से रोजाना और बाजार में दिन में दो बार कचरे का डोर टू डोर कलेक्शन। कचरे को फेंकने के बजाए इससे बनाई जाती है जैविक खाद।

न भारी भरकम बजट और न कोई सरकारी मदद

अपने आप में एक कंप्लीट प्रदेश के स्मार्ट सिटी गौतमपुरा में आपका स्वागत है। दरअसल, यह इंदौर से 56 किलोमीटर दूर है। नगर पंचायत अध्यक्ष विशाल राठी को 16 हजार की आबादी वाले इस नगर को नए रूप में ढालने में 11 साल लगे। मगर न भारी भरकम बजट। न कोई बड़ी सरकारी मदद। अपनी योजनाएं बनाईं। संसाधन जुटाए और नतीजे लाए। जब पार्टी ने दूसरी बार टिकट नहीं दिया तो जनता ने चुनाव में उतारा और भाजपा-कांग्रेस की जमानत जब्त करके जिताया। लोग गर्व से कहते हैं कि ऐसे जनप्रतिनिधि हर जगह हों तो सारे शहर सुधर जाएं। वर्ष 2015 में आरक्षण की वजह से वे अध्यक्ष नहीं बन पाए लेकिन लोगों की सहयोग से अब भी काम जारी है।

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विशाल राठी जिन्होंने यह कर दिखाया

28 साल की उम्र में साल 2004 में नगर पंचायत अध्यक्ष बने। तीन तालाब और इतने ही स्टॉप डैम जनभागीदारी से बनवाए। इस काम में उनकी मदद की नगरीय प्रशासन के पूर्व अर्बन प्लानर प्रवीण भागवत और अर्बन गवर्नेंस अधिकारी नीलेश दुबे ने। गौतमपुरा को इन्हीं कामों की वजह से राष्ट्रीय स्तर के छह पुरस्कार मिले हैं। राठी कहते हैं-मुझे मौका मिला। एक-एक पैसे और हर मिनट का उपयोग मैंने नगर को ठीक करने में किया। लोगों की मदद के बिना यह मुमकिन नहीं था। गौरतलब है कि भारत सरकार ने वर्ष 2015 में स्मार्ट सिटी मिशन लांच किया था जिसमें सभी बड़े शहर थे। लेकिन राठी ने इससे पहले ही अपने छोटे से शहर को स्मार्ट में बदल दिया।

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लोगों की जरूरतों से दो कदम आगे के काम, जिन्हें हम सीख सकते हैं


1. स्ट्रीट लाइट के लिए लोहे के खंभे से दो तिहाई कम कीमत वाले फाइबर खंभे लगवाए। पांच साल में एक भी खराब नहीं हुआ।
2. दस साल के अंदर यहां पानी की व्यवस्था पहले से ठीक हुई है। अब 105 लीटर प्रतिदिन का बिल भी पहले जितना ही आता है। बिल कम होने के कारण लोगों की आमदनी भी बढ़ी है।
3. डॉक्टर शहर में ही रहें, इसके लिए लोगों के सहयोग से उनके लिए होटल जैसे कमरे बनवाए। ईसीजी, पैथालॉजी लैब, एक्स रे समेत तमाम आधुनिक मशीनें खरीदीं। अब आलम यह है कि किसी को प्राइवेट हॉस्पिटल जाने की जरूरत नहीं पड़ती।

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