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36 सेकंड से ज्यादा लेट नहीं होती ये बुलेट ट्रेन, अब दौड़ेगी भारत में

Moneybhaskar.com

Dec 12,2015 05:14:00 PM IST

नई दिल्ली. जापान में जो बुलेट ट्रेन चलती है उसका नाम है शिंन्कासेन। अब यही ट्रेन भारत में भी चलेगी। इस ट्रेन की खास बात ये है कि यह कभी भी 36 सेकंड से ज्यादा लेट नहीं हुई। कहा यह भी जाता है कि जापान के लोग घड़ी देखने के बजाय, शिंन्कासेन के आने से ही टाइम का अंदाजा लगा लेते हैं। इस बुलेट ट्रेन की टेक्नोलॉजी, डिजाइन और इंजन सब कुछ खास हैं। मनी भास्कर आपको इस ट्रेन के बारे में बता रहा है।
क्या है शिंन्कासेन ट्रेन की खासियत
> इस ट्रेन का नाम शिंन्कासेन है। शिंन्कासेन का मतलब होता है, नई ट्रंक लाइनें।
> एडवांस टेक्नोलॉजी की वजह से इस गाड़ी की सफाई में कुल 10 मिनट भी नहीं लगते हैं।
> यह ट्रेन कभी लेट नहीं होती है। अगर विशेष परिस्थितियों में यह गाड़ी लेट भी हो जाती है तो यह अधिकतम 36 सेकंड ही लेट होती है।
> इसके कर्मचारी ट्रेन में आने-जाने वाले का अभिवादन करने के साथ ही उन्हें खुश करने के लिए उनके कपड़े पर कोई न कोई फूल लगाते हैं।
> टोक्यो स्टेशन पर दिन भर में करीब 210 बाल बुलेट ट्रेन आती-जाती हैं।
> यह पूरी तरह कंप्यूटरीकृत प्रणाली से नियंत्रित होती है।
> पूरी तरह साउंडप्रूफ बनाया गया है, जिससे ट्रेन के भीतर आपको इसकी रफ्तार से परेशानी नहीं होती।
> ट्रेन जब ज्यादा रफ्तार में होती है, तो पहिए वाइब्रेट करते हैं। यदि ये वाइब्रेशन कंपार्टमेंट में बैठे हुए यात्रियों तक पहुंचता है, तो उन्हें झटका महसूस होता है। यात्रियों को झटकों से बचाने के लिए बोगियों को सपाट बनाया जाता है। साथ ही एयर स्प्रिंग का इस्तेमाल किया जाता है, जो हवा के दबाव से पहियों से पैदा हुए झटकों से यात्रियों को बचाता है।
क्या है हाई-स्पीड ट्रेन
इंटरनेशनल यूनियन ऑफ रेलवेज (यूआइसी) के मुताबिक, 250 किमी प्रति घंटे या उससे ज्यादा स्पीड से दौड़ने वाली ट्रेन को हाई-स्पीड ट्रेन कहा जाता है। इस तरह की ट्रेनें कई मामलों में सामान्य ट्रेनों से अलग होती हैं। इस ट्रेन में इस्तेमाल किए जाने वाले कोच से लेकर इंजन तक सब कुछ हाईटेक होता है।
आगे की स्लाइड में जानिए कैसे होता है बुलेट ट्रेन का इंजन....
कैसा होता है इंजन बुलेट ट्रेन के इंजन का आकार एयरोडायनिक टाइप का होता है। जो बेहद तेजी से आगे बढ़ता है। यह ट्रेन विशेष रूप से तैयार हाई-स्पीड लाइन पर चलाई जाती है। इसमें बेहतर पावर सप्लाई होती है। यहां तक कि इसके लिए ज्यादतर देशों में अलग से ट्रैक बिछाया जाता है। कहां-कहां चलती हैं हाई स्पीड ट्रेनें अभी बेल्जियम, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड, स्पेन, इंग्लैंड, चीन, जापान, कोरिया और ताइवान में हाई-स्पीड ट्रेनें चलती हैं। इसके अलावा ब्राजील, भारत, मोरक्को, रूस, सऊदी अरब समेत अमेरिका में हाई-स्पीड लाइनों के निर्माण या विकास पर काम चल रहा है। हाई-स्पीड लाइनों के विकास और उसकी तकनीक मुहैया कराने वाली प्रमुख कंपनियों में शामिल एबीबी के मुताबिक 2020 तक दुनिया में हाई-स्पीड लाइनों का नेटवर्क 42,000 किमी तक पहुंच जाएगा। आगे की स्लाइड में जानिए कैसा होता है हाईस्पीड ट्रेनों का डिजाइन....क्या है हाई स्पीड ट्रेनों का डिजाइन दुनिया में हाई-स्पीड ट्रेनों के संचालन पर तेजी से काम चल रहा है। हालांकि, इसके अलग-अलग देशों में अलग-अलग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाता है। वैसे इसकी सबसे पुख्ता तकनीक मैग्नेटिक लेविटेशन है। क्योंकि इसके लिए अलग तरह का ढांचा तैयार करना पड़ता है। लेकिन, कई देश ऐसे भी हैं जहां मौजूदा ढांचे को विकसित करते हुए उसी ट्रैक पर हाई-स्पीड ट्रेनें चलाई जा रही हैं। ज्यादातर हाई-स्पीड ट्रेनें स्टील के बने ट्रैक और स्टील के ही बने हुए पहियों पर चलती हैं, जिनकी स्पीड 200 किमी प्रति घंटे से ज्यादा है। आगे की स्लाइड में जानिए कैसे होता है बुलेट ट्रेनों का संचालन, इसलिए चलती हैं तेज...ऐसे होता है हाई स्पीड ट्रेनों का संचालन, क्यों चलती है तेज सामान्य ट्रेनों का संचालन ट्रैक्शन मोटर्स द्वारा होता है। इन ट्रेनों में लोकोमोटिव (इंजन) से जुड़ा होता है। जबकि हाई स्पीड ट्रेन में लोकोमोटिव नहीं होते। सामान्य ट्रेन के संचालन के समय ट्रांसफॉर्मर्स और रेक्टिफायर्स की तरह वे सभी उपकरण, जो लोकोमोटिव में लगे होते हैं, हाई स्पीड ट्रेनों में वह हर बोगियों में लगे होते हैं। बुलेट ट्रेन की तकनीक में ट्रैक्शन मोटर्स को ज्यादा से ज्यादा बोगियों के पहियों से जोड़ दिया जाता है, इसलिए ट्रेन बेहद तेजी से चलती है। इसे एक अन्य तरीके से भी समझ सकते हैं। सामान्य ट्रेन के लोकोमोटिव यानी इंजन में किसी ट्रेन को खींचने की जितनी क्षमता होती है, उतनी क्षमता बुलेट ट्रेन की बोगियों के भीतर लगे उपकरणों में होती है। इसलिए इनकी बोगियों को अलग नहीं किया जा सकता और न ही किसी अन्य ट्रेन में इसे आसानी से जोड़ा जा सकता है। बुलेट ट्रेन में चालक के केबिन के तुरंत बाद यात्रियों के कम्पार्टमेंट शुरू होते हैं। इसमें ट्रेन संचालन व नेटवर्क से जुड़ी सभी चीजें कंप्यूटर से नियंत्रित होती है और ट्रेन व ट्रैक पर बहुत से सेंसर लगे होते हैं। आगे की स्लाइड में जानिए टिल्टिंग की वजह से सामान्य रहती है ट्रेन....होती है टिल्टिंग बुलेट ट्रेन की सबसे खास बात ये है कि इसके ट्रेन सेट्स पूरी तरह ‘टिल्टिंग’; क्षमता वाले होते हैं। टिल्टिंग उस टेक्नोलॉजी को कहते हैं, जब तेज स्पीड से घुमावदार ट्रैक पर दौड़ते यह झुक जाती है। इसे बैलेंस बना रहता है। इससे पैसेंजर्स को भी घुमाव से पैदा हुए गुरुत्वाकर्षण बल का प्रभाव महसूस नहीं होता है। ठीक वैसे ही जैसे आप बाइक चलाते समय तेजी से उसे मोड़ लेते हैं। जापान में है ये तकनीक बुलेट ट्रेन के लिए ट्रैक अलग तरह का होता है। जापान में ट्रेनों को चलाने के लिए दो अलग गेज का इस्तेमाल होता है। एक 1,067 मिमी और 1,435 मिमी पर। हालांकि, अब छोटी गेज खत्म हो चुकी है और सभी ट्रेनें बड़ी गेज की हैं। इस ट्रेन में एडवांस टेक्नोलॉजी होती है, ताकि इमरजेंसी के वक्त तुरंत नजदीकी स्टेशन से संपर्क किया जा सके।
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