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US, UK और सिंगापुर में इंडियन आईटी कंपनियों की बढ़ी परेशानी, बनानी पड़ सकती है नई स्ट्रैटजी

नई दिल्ली।भारतीय आईटी कंपनियों के अपने तीन बड़े मार्केट यूएस, यूके और सिंगापुर में परेशानी बढ़ती जा रही है। ऐसा इसलिए हो रहा है कि ये देश स्थानीय लोगों को आईटी सेक्टर में नौकरी देने के का फोकस बढ़ा रहे हैं, जिसका भारतीय कंपनियों ने विरोध जताना शुरू कर दिया है। ऐसे में अगले तीन से चार महीने आईटी सेक्टर के लिए महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। इन देशों में अगर प्रोटेक्शनिज्म को अहमियत दी तो भारतीय आईटी कंपनियों को नए मार्केट तलाशने पड़ सकते हैं।
 
85 फीसदी हिस्सेदारी है इन 3 मार्केट की
 
नैस्कॉम के आंकड़ों के मुताबिक फाइनेंशियल ईयर 2016 में इंडियन आईटी एक्सपोर्ट करीब 110 अरब डॉलर रहा। इंडिया का सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट करीब 62 फीसदी यूएस में होता है। यानी करीब 68.2 अरब डॉलर अकेले अमेरिका में एक्सपोर्ट होता है। यूएस के बाद 17 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दूसरा नंबर यूके का है, जहां करीब 18.7 अरब डॉलर का एक्सपोर्ट है। इसके बाद 8 फीसदी हिस्सेदारी एशियाई देशों की है।
 
कैसे बढ़ी परेशानी
 
-अमेरिका के राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रम्‍प कह चुके हैं कि अमेरिकन को विदेशी वर्कफोर्स से रिप्लेस न किया जाए। वह H1B वीजा के नियम कड़े करने की पक्ष में हैं। वह इमिग्रेशन रिफॉर्म से जुड़े एग्‍जीक्‍यूटिव ऑर्डर पर दस्‍तखत कर चुके हैं। H1B वीजा से जुड़ा एक बिल भी अमेरिकी संसद में पेश हो चुका है जिसमें मिनिमम वेज को बढ़ाकर 1.30 लाख डॉलर करने का प्रावधान है।
 
- 2016 की शुरूआत में सिंगापुर सरकार नें नए वीजा जारी करने से मना कर दिया। सिंगापुर सरकार ने इंडियन कंपनी को लोकल लोगों को हायर करने के लिए कहा है। सिंगापुर में एचसीएल, टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो, कॉन्गनिजेट और एल एंड टी इंफोटेक के ऑफिस है।
 
-बीते साल यूके टियर टू इंट्रा कंपनी ट्रांसफर के तहत न्यूनतम वेतन को 20,800 पाउंड से बढ़ाकर 30 हजार पाउंड कर चुका है जिससे इंडियन कंपनी की कॉस्ट बढ़ गई है।
 
आईटी कंपनियों को 7 फीसदी तक नुकसान
 
नैस्कॉम के चेयरमैन आर चंद्रशेखर ने कहा कि ये देश प्रोटेक्शनिज्म की पॉलिसी अपना रहे हैं और अपने स्थानीय लोगों को जॉब देने पर जोर डाल रहे हैं। लेकिन यहां टैलेंटेड वर्कफोर्स की कमी है जिसके कारण यहां मौजूदा वर्कफोर्स के साथ काम करना मुश्किल होता जा रहा है। नैस्कॉम के एक्स वाइज प्रेजिडेंट और बंगलुरू चैंबर ऑफ आईटी इंडस्ट्री के प्रमुख राजु भटनागर ने कहा कि ये सभी प्रोटेक्शनिज्म एंट्री लेवल जॉब्स पर ज्यादा है जिससे इंडियन कंपनियों को 5 से 7 फीसदी का नुकसान हो रहा है।
 
अमेरिका में 10 लाख जॉब है खाली
 
भटनागर ने बताया कि इस तरह के प्रोटेक्शनिज्म से अमेरिका में इंडियन आईटी कंपनियों में 10 लाख जॉब पोस्ट खाली है। अमेरिका में टैलेंटेड वर्कफोर्स की कमी है। यही कारण है कि इंडियन कंपनीज को अमेरिका में लोग ही नहीं मिल रहे है। यदि अमेरिका H1B वीजा सख्त और सैलेरी को लेकर नए नियम लागू होते हैं तो अमेरिका में 1 लाख जॉब पोस्ट और खाली हो जाएंगी।
 
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