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मनी भास्कर खास / बाजार में आलू और मक्के के कैरी बैग, चारे के रूप में भी खिला सकेंगे गायों को

प्लास्टिक बैग की जगह इको फ्रेंडली कैरी बैग बनाने के लिए स्टार्च का इस्तेमाल

Bio plastic carry bags made through Starch of potatoes and corn also can be used as cows fodder
  • दिल्ली के कारोबारी ने 4.5 करोड़ रुपए की लागत से स्टार्च से बायोप्लास्टिक बैग बनाने का प्लांट शुरू किया।
  • बायो प्लास्टिक बैग बनाने के लिए विदेश से स्टार्च (कच्चा माल) 280 रुपए प्रति किग्रा की दर पर मंगाया जाता है, जिस पर 18 प्रतिशत जीएसटी अलग से देना पड़ता है।

सौरभ कुमार वर्मा

नई दिल्ली. देश में प्लास्टिक कैरी बैग और प्लास्टिक गारबेज बनाने और सप्लाई करने वाली कंपनी नवकर प्लास्टिक (Navkar Plastic) अपने करोड़ों रुपए के प्लास्टिक कारोबार को बंद करके बायो कैरी बैग बना रही है। इस कंपनी के मालिक पकंज जैन ने 2017 में प्लास्टिक का हद से ज्यादा इस्तेमाल देखकर इसका विकल्प बाजार में उतारा। अब वे  खेती के प्रोडक्ट्स से बॉयो प्लास्टिक कैरी बैग बनाते हैं। इस बैग की खास बात यह है कि इसे गाय चारे के तौर पर खा सकती हैं। कंपनी के दिल्ली एनसीआर में चार मैन्युफैक्चरिंग प्लांट हैं। 

ऐसे की शुरुआत  

पंकज जैन के साथ एक दिन ऐसी घटना घटी, जिसके बाद उन्होंने जीवन में कभी भी प्लास्टिक बैग न बनाने की कसम खायी। दरअसल हुआ, यूं कि पंकज जैन ने घर के नजदीक की एक गौशाला में गाय के पेट से 30 से 35 किग्रा प्लास्टिक बैग निकलते देखा, जिसके बाद उन्होंने प्लास्टिक बैग बनाने से तौबा कर ली। अब पंकज जैन आलू, मक्का जैसे खेती की प्रोडक्ट से निकलने वाले स्टार्च से बनी बायो प्लास्टिक कैरी बैग बनाने है। पंकज जैन ने करीब 4.5 करोड़ रुपए की लागत से नवकर समूह के अंतर्गत ही स्टार्च से बायोप्लास्टिक बैग बनाने का प्लांट शुरु किया था, जिसमें करीब 60 से 70 लोग काम कर रहे हैं। 

सरकार का नहीं मिल रहा साथ 

पकंज जैन की मानें, तो बायो प्लास्टिक बैग मार्केट में मौजूद बायोडिग्रेडेबल, 50 माइक्रोन बैग से दोगुना महंगे होते हैं। इसकी एक वजह इसके कच्चे माल को विदेशों से आयात किया जाना है, जो कि ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, चीन, यूएस और  थाईलैंड से मंगाया जाता है, जबकि यह स्टार्च देश में ही निकाला जा सकता है। लेकिन इसके लिए सरकारी मदद की जरुरत होगी, क्योंकि स्टार्च निकालने का प्लांट महंगा होता है। साथ ही प्रोडक्ट की कीमत ज्यादा होती है।पकंज जैन बताते हैं कि अगर उन्हें सरकार का साथ मिलें, तो वो न सिर्फ पर्यावरण फ्रेंडली बायो प्लास्टिक बना पाएंगे, बल्कि देश के किसानों को फायदा पहुंचा पाएंगे, जो आलू अभी कौड़ियों के दाम बेचा जाता है। उसे बायो प्लास्टिक बनाने में प्रयोग किया जा सकता है। इसके लिए सरकार को बॉयोप्लास्टिक बैग बनाने वालों को सस्ता लोन मुहैया कराना होगा। 

बायो प्लास्टिक बैग पर जीएसटी कम करने की मांग

आज के वक्त में बायो प्लास्टिक बैग बनाने के लिए विदेशों से स्टार्च (कच्चा माल) 280 रुपए प्रति किग्रा की दर पर मंगाया जाता है, जिस पर 18 प्रतिसत जीएसटी अलग से देना पड़ता है। पकंज पर्यावरण को फायदा पहुंचाने वाले इस व्यापार को सरकार से जीएसटी फ्री करने की मांग कर रहे हैं, जिसकी वजह से इसे आम लोगों को सस्ती कीमत पर बेच जा सके। पंकज बताते हैं कि एक किग्रा स्टार्च से आधा किग्रा वाले 250 से 300 कैरी बैग बनाए जा सकते हैं। वहीं एक किग्रा वाले 170 के करीब कैरी बैग बनते हैं, जबकि 5 किग्रा के 60 पीस बनते हैं।

क्या होगा फायदा

बॉयो प्लास्टिक बैग को घुलने में एक दिन का वक्त लगता है, जो खेतों में कंपोस्ट खाते के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है,क्योंकि इसमें स्टार्च होता है। नालों ने निकलने वाली मीथेन गैस स्टार्च जल्द घुलता है। इससे शहरों के नदी और नालों के बंद होने की समस्या दूर हो सकेगी। जानवर इसका इस्तेमाल चारे के तौर पर कर पाएंगे। 

ऐसे जुड़े इस मुहिम से 

अगर कोई नवकर प्लास्टिक की पर्यावरण की बचाने की मुहिम के साथ जुड़ना चाहते हैं, तो उन्हें Navkarplastic.1977@gmail.com पर संपर्क करना होगा। साथ ही कंपनी के प्रोडक्ट की बिक्री पर 3 से 4 प्रतिशत मार्जिन दिया जाएगा। 

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