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अमेरिका के ग्रीन कार्ड को ठोकर मार भारत में शुरू किया कारोबार, 10.7 करोड़ लोग यूज कर रहे इनका प्रोडक्ट

कंपनी का रेवेन्यू भी हर साल तीन-चार गुना बढ़ रहा है।

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नई दिल्ली।  मूल रूप से कश्मीरी। जालंधर एनआईटी से इंजीनियरिंग की। अमेरिका के स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ने गई। अमेरिका के नामी डिजिटल वैले पेपॉल में अच्छी-खासी नौकरी की। ग्रीन कार्ड मिल गया। पर सब छोड़ कर चली आई हिन्दुस्तान। मां-बाप, कंपनी वाले सबने मना किया, लेकिन जिद थी कुछ नया करने की। अब भारत के 10 करोड़ से अधिक लोग उनके प्रोडक्ट का इस्तेमाल कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं मोबिक्विक डिजिटल प्लेटफार्म की को-फाउंडर एवं डायरेक्टर उपासना टाकू की। आइए, जानते है उनकी ही जुबानी में उनके सफर की दास्तां...

 

 प्रश्नः कब और कैसे ख्याल आया एंटरप्रेन्‍योर बनने का?

 

उत्तरः मैं यूएस में पेपाल में काम कर रही थी। पढ़ने गई थी अमेरिका। पहले एचएसबीसी में काम किया, फिर पेपाल ज्वाइन कर लिया था। 2006-08 की बात है। पेपाल की तरफ से स्पेन, जर्मनी जैसे कई देशों में डिजिटल वैलेट लांच करने का मौका मिला। फिर मुझे लगा कि अब बहुत कुछ सीख लिया अब कुछ इंपैक्टफुल करना चाहिए। इजरायल का एक प्रोजेक्ट था पेपाल का। प्रोजेक्ट खत्म होते ही इस्तीफा डाल दिया। बोरिया-बिस्तर उठाया और चली आई इंडिया।

 

प्रश्नः तो क्या घरवालों का पूरा सपोर्ट था?

 

उत्तरः बहुत अजीब था तब। इंडिया आने से पहले माता-पिता से खूब लड़ाई हुई थी। दो-तीन महीने तक बात नहीं किया था मेरे पापा ने। वे फिजिक्स के प्रोफेसर थे और जब मैं इंडिया आने का प्लान कर रही थी तब अफ्रीका के किसी यूनिवर्सिटी में पढ़ाने गए थे। फोन पर समझाते थे, वापस नहीं आने के लिए। मां मेरी म्युजिक में मास्टर है। कोई कल्चर नहीं था एंटरप्रेन्योरशिप का। मैं कश्मीरी फैमिली से हूं जहां पढ़ाई करेंगे और नौकरी करेंगे।

 

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प्रश्नः तो क्या अचानक ख्याल आ गया था एंटरप्रेन्‍योर बनने का?

 

उत्तरः अचानक नहीं था। एनआईटी जालंधर से बीटेक करने के बाद एमएस करने स्टैनफोर्ड गई थी। स्टैनफोर्ड की खास बात है कि वहां की हवा में है एंटरप्रेन्‍योरशिप। वहां पढ़ाई के दौरान कंपनी के साथ मिलकर लाइव प्रोजेक्ट करना होता है।

 

प्रश्नः मोबिक्विक प्लेटफार्म का आइडिया कहां से मिला? 

 

उत्तरः 2008 में इंडिया आई तो देखा कि मोबाइल का बिल पे करने के लिए दुकान में जाना पड़ता है। अलग-अलग बिल पे करने के लिए अलग-अलग साइट पर जाना पड़ता था। यहीं से आइडिया आया कि हम कोई ऐसा वैलेट प्लेटफार्म क्यों नहीं बनाते हैं जिसके माध्यम से सारे पेमेंट चुटकी में हो जाए। यह एक बिलियन डॉलर की अपरचूनिटी थी क्योंकि तब भारत में 1 फीसदी लोग भी डिजिटल ट्रांजेक्शन नहीं कर रहे थे। 2009 में सफर शुरू हुआ। फरवरी-मार्च में लांच किया था मोबिक्विक। उस समय जीरो लोग थे हमारे प्लेफार्म पर। अभी 10.7 करोड़ लोग है। हमारे रेवेन्यू भी हर साल तीन-चार गुना बढ़ रहे हैं।

 

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प्रश्नः आपको लगता है कि इंडिया में एंटरप्रेन्योरशिप को सपोर्ट नहीं मिलता?

 

उत्तरः इंडियन फैमिली में बहुत पुश बैक है। पहले हम अंग्रेजों के गुलाम थे अब हम विदेशी कंपनियों के हो रहे हैं। हम कुछ ऐसा इनोवेट क्यों नहीं करते जिसे खरीदने के लिए दुनिया पागल हो। यूएस में इनोवेट करने वालों को रेस्पेक्ट मिलता है। इंडिया में ऐसा नहीं है। बाहर के देश के लोग इंडियन स्टार्ट अप में पैसा लगा रहे हैं। चीन से, जापान से, अमेरिका से पैसा आ रहा है इंडिया के स्टार्ट अप में, लेकिन हमारे देश के बड़े बिजनेस हाउस पैसा बचाने में लगे हैं।

 

प्रश्नः वूमन एंटरप्रेन्योर के लिए क्या मैसेज देना चाहेंगी?

 

उत्तरः भारतीय फैमिली में लड़कों को भी इंस्प्रेशन नहीं मिल रही है। 30 फीसदी महिलाएं ही वर्किंग है। लेकिन इतना जरूर है कि अगर आपके अंदर पोटेंशियल है तो उसको वेस्ट जाने नहीं देना। शुरू में सपोर्ट नहीं मिलता है, लेकिन बाद में मिलने लगता है।

 

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