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खास खबर: मिडिल क्‍लास का 'ब्रांड' रही थी वीडियोकॉन, कैसे आ गई दिवालिया होने की कगार पर?

टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन और एसी जैसे प्रोडक्‍ट जब लग्जरी माने जाते थे, तब वीडियोकॉन ने इसे घर-घर तक पहुंचाया।

Why a 800 cr rs profitable company faces bankruptcy proceedings

नई दिल्ली. टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन और एसी जैसे प्रोडक्‍ट जब देश के बड़े मिडिल क्लास के लिए लग्जरी माने जाते थे, तब वीडियोकॉन ने इसे घर-घर तक पहुंचाया। वीडियोकॉन लिमिटेड ने 1990 के दशक में मिडिल क्लास की जेब को ध्‍यान में रखते हुए ब्लैक एंड व्हाइट टीवी, कलर टीवी और वॉशिंग मशीन जैसे प्रोडक्ट मार्केट में उतारे थे। इलेक्ट्रॉ‍निक अप्‍लायंसेस को कोर बिजनेस बनाने के बाद एक समय ऐसा भी रहा जब वीडियोकॉन देश की सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाली कंपनियों में शामिल हो गई। लेकिन, तेजी से बढ़ने की कोशिश में जिस तरह से कंपनी ने कोर बिजनेस के अलावा टेलिकॉम, एनर्जी जैसे दूसरे क्षेत्र में कारोबारी विस्‍तार का रास्‍ता अपनाया, वह उसे रास नहीं आया। यह रणनीति असफल होती गई और कंपनी पर कर्ज का बोझ बढ़ता गया। कर्ज के दबाव में कोर बिजनेस पर पकड़ भी दिन-ब-दिन कमजोर होती गई। नतीजा यह रहा कि आज वीडियोकॉन दिवालिया होने की कगार पर आ गई है। 

 

 

कोर बिजनेस को छोड़ दूसरे सेक्टर में एंट्री पड़ी भारी
जियोजित फाइनेंशियल सर्विसेज के रिसर्च हेड गौरांग शाह का कहना है कि वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज के डूबने की अहम वजहों में से एक है, उसका कोर बिजनेस को छोड़कर दूसरे सेक्टर में एंट्री करना। उन्होंने कहा कि वीडियोकॉन ने अपने मुख्य बिजनेस को छोड़ दूसरे बिजनेस में हाथ आजमाया। कंपनी ने 2008 के बाद से  टेलिकॉम, डायरेक्ट टू होम, ऑयल एंड गैस जैसे सेक्टर में भारी निवेश किया था। लेकिन कंपनी को इन बिजनेस से मुनाफा नहीं आया। कंपनी पर कर्ज बढ़ता गया, जिसे चुकाना मुश्किल हो गया। दूसरी ओर इसी कर्ज के चलते कंपनी का अपने कोर बिजनेस से भी फोकस हटता गया। कंपनी का मुख्‍य बिजनेस इलेक्ट्रॉनिक अप्‍लायंसेस था, जिससे ज्यादातर रेवेन्यू आता था। लेकिन दूसरे बिजनेस डूबने पर कंपनी को भारी घाटा उठाना पड़ा, जिससे कंपनी अब दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गई। 

 

 

बढ़ते कॉम्पिटीशन में सर्वाइव करना मुश्किल 

वीडियोकॉन के कन्ज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स बिजनेस से जुड़े एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ने moneybhakar को बताया कि वीडियोकॉन छोटे शहरों में अपनी पहुंच बनाने के लिए जाना जाता है। हमने यूजर की जरूरत और उसकी जेब को देखते हुए प्रोडक्ट उतारे जिसका फायदा मिला। लेकिन जब विदेशी कंपनियां मार्केट में आई, उसके बाद हम इन्नोवेशन पर फोकस नहीं कर पाए, साथ ही उनकी तरह एक्सपेंशन नहीं कर पाया। कंपनी का फोकस दूसरे बिजनेस  पर चला गया, जिसका उसके कोर बिजनेस पर इम्पैक्ट हुआ। असल में कर्ज चुकाने के फेर में कंपनी कोर बिजनेस पर ज्यादा खर्च नहीं कर पाई। 

 

 

कंपनी के दूसरे बिजनेस
2009: कंपनी ने अपना पहला मोबाइल फोन मार्केट में उतारा।
2009: कंपनी डायरेक्ट टू होम यानी DTH बिजनेस में आई। कंपनी ने दूसरी कंपनियों से मॉडर्न टेक्नोलॉजी पर यह कारोबार शुरू किया।
2010: वीडियोकॉन टेलिकम्युनिकेशंस लिमिटेड को देश में मोबाइल सर्विस ऑपरेट करने के लिए लाइसेंस मिला। इसी साल कंपनी इस बिजनेस में आई।
रिटेल बिजनेस: प्लैनेट एम, डिजी वर्ल्ड, NEXT
वीडियोकॉन पेट्रोलियम: वीडियोकॉन पेट्रोलियम की रवावा ऑयलफील्ड में 25 फीसदी हिस्सेदारी है, जिसे केयर्न इंडिया ऑपरेट करती है। 

 

 

800 करोड़ मुनाफे वाली कंपनी से कर्ज वाली कंपनी 
साल 2007 तक कंपनी डेट फ्री कंपनी मानी जाती थी और लगातार मुनाफे में थी। सितंबर 2008 तक लगातार 3 फाइनेंशियल ईयर तक कंपनी का स्टैंडअलोन प्रॉफिट 800 करोड़ रुपए रहा। लेकिन इसी के बाद से कंपनी अपने एक्सपेंशन प्लान में लग गई और कर्ज बढ़ता चला गया। 2010-11 तक कंपनी का कर्ज 12500 करोड़ रुपए हो गया था। वहीं, फाइनेंशियल ईयर 2017 में ग्रुप की सभी कंपनियों पर स्टैंडअलोन कर्ज बढ़कर 40 हजार करोड़ रुपए तक हो गया। फाइनेंशियल ईयर 2018 की दूसरी तिमाही में कंपनी को 1300 करोड़ से ज्यादा घाटा हुआ। 

 

11 साल में मार्केट कैप 98% घटा 
दिसंबर 2007 से अबतक कंपनी का मार्केट कैप 98 फीसदी से ज्यादा गिर चुका है। दिसंबर 2007 में वीडियोकॉन लिमिटेड का मार्केट कैप 18500 करोड़ रुपए था, जो 7 जून 2018 को गिरकर 294 करोड़ रुपए रह गया। इस दौरान कंपनी के शेयर में बड़ी गिरावट रही। 28 दिसंबर 2007 को कंपनी का एक शेयर 754 रुपए का था जो घटकर अब 8.80 रुपए प्रति शेयर के भाव पर रह गया। 

 

कर्ज चुकाने के लिए एसेट बेच रही है कंपनी
कर्ज चुकाने के लिए कंपनी ने अपने अलग-अलग एसेट्स बेचने का प्लान बनाया है। पिछले दो सालों में वीडियोकॉन ने केनस्टार ब्रांड की बिक्री एवरस्टोन कैपिटल को की। समूह ने बैंकों को आश्वस्त किया है कि वह कर्ज चुकाने के लिए अपनी जमीन बेचेगी। फोर्ट मुंबई में कंपनी का मुख्यालय था जिसे पिछले साल 300 करोड़ रुपए में बेचा था और अब यह टाटा समूह का अस्थायी मुख्यालय है। 
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज के चेयरमैन वेणुगोपाल धूत को उम्मीद है कि कंपनी बैंकरप्सी प्रॉसेस से बाहर निकल सकेगी। उन्हें उम्मीद है कि वह नए प्रावधानों का इस्तेमाल करेंगे, जिसके तहत अगर 90 फीसदी कर्जदाता सहमत हों तो केस को वापस लिया जा सकता है। उनके मुताबिक, कंपनी के मामले में 100 फीसदी लेंडर्स नहीं चाहते कि कंपनी को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में ले जाया जाए।

 

NCLT के दायरे में आ गई कंपनी
नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के मुंबई पीठ ने वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज के खिलाफ लेनदारों की दिवालिया याचिका स्वीकार कर ली है। वीडियोकॉन अब बैंकरप्सी कोड के तहत एनसीएलटी के दायरे में आ गई है। कंपनी बैंकों का 21,000 करोड़ रुपए का कर्ज चुकाने में नाकाम रही। अगले 180 दिनों में बोली के जरिए कंपनी के लिए नए मालिक की तलाश की जा सकती है। इस खबर से गुरुवार के कारोबार में वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज के शेयर में 5 फीसदी का लोअर सर्किट लग गया। बीएसई पर वीडियोकॉन का शेयर 5 फीसदी गिरकर 8.62 रुपए पर आ गया। कारोबार के अंत में शेयर 2.98 फीसदी टूटकर 8.80 रुपए पर बंद हुआ।


ग्रुप की जिन कंपनियों के खिलाफ दिवालिया कोर्ट में याचिका दायर की गई है, उनमें सेंचुरी अप्लायंसेज, वैल्यू इंडस्ट्रीज, ट्रेंड इलेक्ट्रॉनिक्स, स्काई अप्लायंसेज और पीई इलेक्ट्रॉनिक्स शामिल हैं। ये विडियोकॉन इंडस्ट्रीज की सब्सिडियरीज हैं, जो कन्ज्यूमर गुड्स की मैन्युफैक्चरिंग, सेल और डिस्ट्रीब्यूशन से जुड़ी हैं। 

 

विदेशी इकाई दायरे से बाहर
भारतीय रिजर्व बैंक की तरफ से दिवालिया संहिता के तहत कर्ज समाधान वाली कंपनियों की दूसरी सूची में वीडियोकॉन को शामिल किए जाने के बाद लेनदारों ने कंपनी के खिलाफ मामले की शुरुआत की। वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज का कुल कर्ज 44,000 करोड़ रुपए है, लेकिन लेनदार इसकी विदेशी इकाई को दिवालिया अदालत नहीं ले गए हैं क्योंकि वह अभी भी अपने कर्ज का पुनर्भुगतान कर रही है। वीडियोकॉन का करीब आधा कर्ज इसकी विदेशी इकाई का है।

 

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