रंगीन मिजाजी नहीं इस गलती की वजह से बर्बाद हुआ माल्या, आज लंदन में शरण लेने को है मजबूर

विजय माल्या एक बार फिर से चर्चा में हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली से मुलाकात के दावे के बाद भाजपा कांग्रेस में आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। अब भी लोग जानना चाहते हैं कि कभी देश के टॉप कॉरपोरेट में शुमार इंडियन बिजनेस जगत का एक पोस्टर ब्वॉय आखिर कैसे हजारों करोड़ के कर्ज में डूब गया। वैसे तो माल्या की बर्बादी के पीछे पीछे कई वजह हैं, लेकिन 2007 में किया गया एक सौदा माल्या के लिए सबसे बड़ी गलती साबित हुआ। इस सौदे के 5 साल के भीतर माल्या की किंगफिशर एयरलाइंस बंद हो गई और उनका पूरा कारोबारी साम्राज्य लगभग खत्म हो गया।

Money bhaskar

Sep 15,2018 03:40:00 PM IST

नई दिल्ली। विजय माल्या एक बार फिर से चर्चा में हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली से मुलाकात के दावे के बाद भाजपा कांग्रेस में आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। अब भी लोग जानना चाहते हैं कि कभी देश के टॉप कॉरपोरेट में शुमार इंडियन बिजनेस जगत का एक पोस्टर ब्वॉय आखिर कैसे हजारों करोड़ के कर्ज में डूब गया। वैसे तो माल्या की बर्बादी के पीछे पीछे कई वजह हैं, लेकिन 2007 में किया गया एक सौदा माल्या के लिए सबसे बड़ी गलती साबित हुआ। इस सौदे के 5 साल के भीतर माल्या की किंगफिशर एयरलाइंस बंद हो गई और उनका पूरा कारोबारी साम्राज्य लगभग खत्म हो गया।

कितने कर्जदार हैं माल्या?
माल्या पर बैंकों का लगभग 9400 करोड़ रुपए बकाया है। उनके खिलाफ 17 बैंकों के कंसोर्शियम ने सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दाखिल की थी। माल्या की तरफ से कहा गया है कि तेल के रेट बढ़ने, ज्यादा टैक्स और खराब इंजन के चलते उनकी किंगफिशर एयरलाइन्स को 6,107 करोड़ का घाटा उठाना पड़ा था। हालांकि वह अभी करीब 1800 करोड़ रुपए के विलफुल डिफॉल्टर हैं। बाकी बैंक अब भी माल्या के खिलाफ कोर्ट नहीं गए हैं।

2005 में शुरू हुई थी किंगफिशर
प्रीमियम सेवाओं के लिए जानी जाने वाली किंगफिशर एयरलाइंस की स्थापना वर्ष 2003 में हुई थी। इसका स्वामित्व विजय माल्या की अगुआई वाले यूनाइटेड ब्रेवरीज ग्रुप के पास था। 2005 में इसका कमर्शियल ऑपरेशन शुरू हुआ। कुछ समय के भीतर ही यह एविएशन सेक्टर की बड़ी कंपनी बन गई। उस दौर में प्रीमियम सेवाओं में इसका कोई जोड़ नहीं था। हालांकि, कंपनी को इसके लिए भारी रकम खर्च करनी पड़ रही थी, जिससे उसे कॉस्ट निकालना मुश्किल हो रहा था। ऐसे में कंपनी ने देश की एक लो कॉस्ट एविएशन कंपनी खरीदने की कोशिशें शुरू कर दीं। यह कोशिश 2007 में जाकर कामयाब हुई, लेकिन इस तरह उन्होंने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती की ओर कदम बढ़ा दिया था।

आगे पढ़ें- इस गलती ने कर दिया माल्या को बर्बाद......

माल्या ने 2007 में खरीदी थी एयर डेक्कन

माल्या ने 2007 में देश की पहली लो कॉस्ट एविएशन कंपनी एयर डेक्कन का अधिग्रहण किया था। इसके लिए 30 करोड़ डॉलर की भारी रकम खर्च की गई, जो उस समय लगभग 1,200 करोड़ रुपए (2007 में 1 डॉलर लगभग 40 रुपए के बराबर था) के बराबर थी। इस सौदे से माल्या को तत्काल फायदा भी हुआ और 2011 में किंगफिशर देश की दूसरी बड़ी एविएशन कंपनी बन गई। हालांकि, कंपनी एयर डेक्कन को खरीदने के पीछे के लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाई और उसकी ऊंची कॉस्ट की समस्या जस की तस बनी रही।
 
आगे पढ़ें-  कैसे फेल हो गई माल्या की स्ट्रैटजी

 

 

इस तरह फेल हो गई माल्या की स्ट्रैटजी
माल्या भले ही एयर डेक्कन को खरीदने में कामयाब रहे, लेकिन उनकी इसके माध्यम से किंगफिशर को मजबूती देने की स्ट्रैटजी बुरी तरह फेल हो गई। बाद में माल्या ने दोनों एयरलाइंस का विलय कर दिया और फिर एयर डेक्कन का नाम बदलकर किंगफिशर रेड हो गया, जो प्रीमियम सेवाओं के साथ ही लो कॉस्ट सेवाएं भी देने लगी। इस प्रकार कंपनी एक ही ब्रांड किंगफिशर के तहत लो कॉस्ट और प्रीमियम सेवाएं दोनों देने लगी।  भारत में लो कॉस्ट एविएशन मॉडल को लाने वाले और एयर डेक्कन के संस्थापक कैप्टन गोपीनाथ ने एक मीडिया रिपोर्ट में कहा था, 'माल्या का एक ब्रांड का फैसला संभावित तौर पर अच्छा था, लेकिन उन्हें सभी घरेलू सेवाओं को लो-कॉस्ट और अंतरराष्ट्रीय सेवाओं को प्रीमियम रखना चाहिए था।' गोपीनाथ के मुताबिक, एक ब्रांड की दोनों सेवाओं में ज्यादा अंतर भी नहीं था, बस तभी से समस्याएं पैदा होने लगीं। 
 
आगे पढ़ें-किंगफिशर पर कैसे पड़ी दोहरी मार

 

 

लो कॉस्ट सर्विस की ओर जाने लगे ग्राहक
गोपीनाथ के मुताबिक, इस तरह अप्रत्यक्ष रूप से किंगफिशर की दोनों सर्विसेज के बीच अपने मौजूदा कस्टमर बेस को छीनने के लिए होड़ होने लगी। इससे किंगफिशर पर दोहरी मार पड़ी। पहली किंगफिशर के इकोनॉमी पैसेंजर्स ने किंगफिशर रेड की ओर रुख करना शुरू कर दिया, जहां सुविधाएं काफी हद तक समान थीं, लेकिन कॉस्ट कम थी। लेकिन जब माल्या ने किंगफिशर रेड के किराये को बढ़ाने का फैसला किया तो कस्टमर इंडिगो या स्पाइसजेट जैसी लो कॉस्ट एयरलाइंस की ओर रुख करने लगे।
 
आगे पढ़ें- आखिरकार कैसे बंद हो गई किंगफिशर एयरलाइंस

 

 

आखिरकार बंद हो गई किंगफिशर 


गोपीनाथ के मुताबिक, माल्या ने एक और गलत फैसला लिया। उन्होंने कहा, 'माल्या ने एयर डेक्कन के साथ गोद लिए हुए बेटे की तरह व्यवहार किया। विलय के बाद माल्या को उम्मीद थी कि एयर डेक्कन के कस्टमर किंगफिशर की ओर रुख करेंगे, लेकिन इसका उलटा होने लगा। आखिर में एयर डेक्कन (किंगफिशर रेड) के कस्टमर दूसरी लो कॉस्ट एयरलाइंस की ओर रुख करने लगे।' इस प्रकार अक्टूबर 2012 में किंगफिशर एयरलाइंस बंद हो गई। इसका असर माल्या के कारोबारी साम्राज्य पर भी पड़ा, जो अब लगभग खत्म होने के कगार पर है।

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