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जिसे महिला होने के कारण नहीं मिली थी नौकरी, वह आज है 37 हजार करोड़ की कंपनी की मालकिन

Forbes की 100 सर्वाधिक प्रभावशाली महिलाओं में शुमार हैं किरण मजूमदार शॉ

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नई दिल्ली.

देश की सबसे बड़ी बायोफार्मा कंपनी बायोकॉन की संस्थापक किरण मजूमदार शॉ की कहानी बड़ी ही दिलचस्प है। वे आज दुनिया की 100 सबसे ताकतवर महिलाओं की Forbes लिस्ट में शामिल हैं, लेकिन एक वह वक्त भी था जब उन्हें कंपनियों ने नौकरी देने से इनकार कर दिया था। इसकी वजह थी, उनका 'महिला’ होना। हर जगह से इनकार सुनने के बाद उन्होंने 1200 रुपए लगाकर अपना कारोबार शुरू किया जो आज 37000 करोड़ रुपए की कंपनी में बदल चुका है।

 

जब लोगों ने एक 'महिला' को नौकरी देने से कर दिया था इनकार

एक अंग्रेजी मीडिया के मुताबिक बेंगलुरु के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मीं किरण जब 1978 में ऑस्ट्रेलिया से Brewing (ब्रूइंग) यानी शराब बनाने की प्रक्रिया में मास्टर्स की डिग्री लेकर भारत लौटीं तो उन्होंने देश की तमाम बीयर उत्पादक कंपनियों में नौकरी के लिए आवेदन दिया। लेकिन सभी कंपनियों ने उन्हें यह कहकर मना कर दिया कि वे एक महिला को इस नौकरी पर नहीं रख सकते। तब वे सिर्फ 25 वर्ष की थीं। योग्यता होने के बाद भी जब उन्हें भारत में नौकरी नहीं मिली तो वे स्कॉटलैंड चली गईं। वहां उन्होंने ब्रूवर की नौकरी की। यहीं उनकी किस्मत बदली और बायोकॉन की स्थापना की राह खुली।

 

ऐसे बनी 'बायोकॉन'

स्कॉटलैंड में काम करते हुए उनकी मुलाकात आइरिश उद्यमी लेस्ली औचिनक्लॉस से हुई। लेस्ली भारत में फार्मास्युटिकल्स कारोबार शुरू करना चाहती थीं। वे किरण से काफी प्रभावित थीं लिहाजा उन्होंने उन्हें अपना पार्टनर बनने और भारत में कारोबार संभालने का प्रस्ताव दिया। यह प्रस्ताव मिलने के बाद किरण को काफी हैरानी हुई क्योंकि उन्हें कारोबार का कोई पूर्व अनुभव नहीं था। उन्हें लेस्ली को भी यह बात कही और यह भी कहा कि वे इस कारोबार में कुछ निवेश भी नहीं कर पाएंगी क्योंकि उनके पास कुछ नहीं है। इसके बावजूद लेस्ली नहीं मानीं और उन्होंने किरण को कारोबार संभालने के लिए मना ही लिया। इस तरह 1978 में बायोकॉन अस्तित्व में आई।

 

 

1200 रुपए से की शुरुआत

किरण ने भारत में अपने कारोबार की शुरुआत एक गैराज से की। इसके लिए उन्होंने तकरीबन 1200 रुपए लगाए। जब लोगों को जोड़ने की बारी आई तो इसमें भी उन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा क्योंकि लोग एक महिला के साथ काम करने से कतराते थे। न सिर्फ पुरुषबल्कि महिलाएं भी ऐसी कंपनी में काम नहीं करना चाहती थींजिसकी बॉस एक महिला थी। कई लोग उन्हें सेक्रेट्री समझ लेते थे। तकरीबन 40 लोग कंपनी में इंटरव्यू देने आए लेकिन कोई भी सही उम्मीदवार नहीं था। आखिरकार उन्होंने एक रिटायर गैरेज मैकेनिक को पहले कर्मचारी के तौर पर नियुक्त किया।

 

 

पूंजी जुटाने में भी आई मुश्किलें

कारोबार को बढ़ाने के लिए पूंजी जुटाना भी आसान नहीं था। बैंक भी एक 25 साल की लड़की पर भरोसा नहीं कर पा रहे थे। उन्हें लगता था कि किरण को कारोबार की समझ नहीं है और पूंजी देने का मतलब होगा पैसा को डुबाना। आखिरकार 1979 में एक बैंकर ने उन्हें लोन दिया और इसके बाद उन्होंने अपनी काबिलियत के दम पर बायोकॉन को देश की शीर्ष बायोफार्मा कंपनी बना दिया। आज कंपनी का मार्केट कैप 37000 करोड़ रुपए से अधिक है। किरण मजूमदार शॉ भारत की अकेली ऐसी बिजनेसवुमन हैंजो अपने दम पर अरबपति बनीं हैं। फोर्ब्स ने उन्हें दुनिया की 100 सर्वाधिक प्रभावशाली महिलाओं की सूची में शामिल किया है।

 
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