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15 दिसंबर तक ट्रेन-18 से पब्लिक कर पाएगी सफर

ट्रेन-18 की रफ्तार 160 किलोमीटर प्रतिघंटा

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नई दिल्ली। भारत की पहली बिना इंजन की ट्रेन-18 को 15 दिसंबर तक यात्रियों के लिए चालू किया जा सकता है। इस बात की जानकारी रेल मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दी है। वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ट्रेन-18 की रफ्तार 160 किलोमीटर प्रति घंटा होगी। ट्रेन-18  को सबसे पहले दिल्ली से वाराणसी या दिल्ली से भोपाल तक चलाया जा सकता है। मंगलवार को  ट्रेन-18 का मंगलवार को 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार पर ट्रायल किया गया था। उम्मीद जताई जा रही है कि 15 दिसंबर तक इसका परिचालन शुरू किया जा सकता है। ट्रेन-18 की इस स्पीड की वजह से दिल्ली से भोपाल जाने में राजधानी के मुकाबले 1 घंटे का समय बचेगा।  

 

दरवाजों में लगे हैं स्लाइडिंग स्टेप 
ट्रेन के दरवाजों में स्लाइडिंग स्टेप लगे हैं, जो पहली बार किसी ट्रेन में इस्तेमाल किए गए हैं। यह आटोमेटिक होंगे। इनके बंद होने के बाद ही ट्रेन आगे बढ़ेगी। इससे ट्रेन और प्लेटफार्म के बीच गैप खत्म हो जाएगा। सवारी इसी में पैर रखकर ट्रेन में चढ़ सकेंगी। इससे पहले कई बार जल्दबाजी में सवारी का पैर अंदर चला जाता था, जिससे हादसे हो जाता था। यह स्लाइडिंग स्टेप ट्रेन के प्लेटफार्म पहुंचने के बाद और ऑटोमैटिक गेट खुलने से पहले 150 मिमी बाहर आएगा। इसी तरह गेट बंद होने के बाद अंदर की ओर चला जाएगा। अगर किसी स्टेशन में ट्रेन और प्लेटफॉर्म के बीच में गैप कम है तो ये प्लेटफॉर्म से टकराकर 20 मिमी प्लेटफॉर्म से पीछे स्वत: ही चला जाएगा।  एक कोच से दूसरे कोच में जाने पर अंदर पता नहीं चलेगा। दोनों कोचों को जोड़ने वाला सील गैंग वे काफी चौड़ा है और ज्वाइंट में झटके नहीं लगेंगे। इसके अलावा बाहर से भी कोच अलग अलग नहीं लगेंगे। कोच की चौड़ाई के बराबर गैंग-वे लगाया गया है।

 

स्क्रीन पर मिलेगी खराबी की सूचना 
ट्रेन पूरी  तरह कंप्यूटराइज्ड (ट्रेन कंट्रोल मैनेजमेंट सिस्टम यानी टीसीएमएस से लैस ) होगी। इस वजह से चलती ट्रेन में खराबी कहां आई, ड्राइवर को मल्टीपल स्क्रीन से सूचना मिल जाएगी। मसलन किस कोच में ब्रेक जाम हो रहे हैं, पता चलने पर ड्राइवर गाड़ी रोक देगा। अभी पहिए से धुआं निकलने के बाद ही पता चलता है और खराबी ढूंढ़ने में समय लगता है। इसी तरह ट्रेन में खराबी के बारे में पास के कंट्रोल रूप में सूचना स्वत: पहुंच जाएगी, कंट्रोल रूप करीब के स्टेशन को यह सूचना दे देगा, जिससे जल्दी मदद मिल जाएगी। अभी मैन्युअल सूचना दी जाती है, इसमें समय लगता है। इसी तरह एसी अपने आप एडजस्ट होगा। मसलन किसी कोच में सवारी कम हैं तो वहां का तापमान बढ़ जाएगा और जहां पर अधिक हैं, वहां कम हो जाएगा। अभी एक ही स्पीड से एसी चलता है। इसके अलावा एसी का चैंबर ऐसा डिजाइन है, जिससे सीधे ठंडी हवा सीधे सवारी पर नहीं पड़ेगी। लेकिन पूरा कोच एक जैसा कूल रहेगा।

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तीन तरह की होंगी लाइट 
इसमें तीन तरह की लाइट लगी हैं। पहली डिफ्यूज यानी डायरेक्ट लाइट, जो एलइडी पूरी ट्रेन में स्टिप की तरह लगी है, दूसरी इनडायरेक्ट जहां लगेज रखा जाएगा, वहां पर हल्की लाइट लगी होगी, जिससे रात में सवारी को परेशानी न हो।  तीसरी रीडिंग लाइटें लगी हैं ये लाइटें टच हैं। इसके अलावा प्रत्येक सीट के नीचे चार्जर का प्वाइंट लगा है। मौजूदा समय 8 से 10 सीटों के बीच 2 चार्जर प्वाइंट होता है। सीटें पुश वाली नहीं होंगी, जो पीछे होती हैं। क्योंकि इससे पीछे बैठी सवारी को खाना खाने में या निकलने में परेशानी होती है, इसलिए ये सीटें स्लाइडिंग हेागी। जिससे नीचे का हिस्सा स्लाइड होकर आगे या पीछा हो जाएगा।   

 

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80 फीसदी मैटेरियल मेक इन इंडिया 
आईसीएफ के महाप्रबंधक सुधांशु मणि बताते हैं कि इस ट्रेन का कोच मेक इन इंडिया के तहत बनाया गया है 80 फीसदी मैटेरियल भारतीय है, वही मैटेरियल बाहर से मंगाया गया है जो अभी यहां उपलब्ध नहीं है। यही वजह है कि इसकी कीमत प्रति कोच 6 करोड़ आई है जबकि विदेशों में इसकी कीमत 14 करोड़ तक होती है।  रेलवे बोर्ड के चेयरमैन अश्वनी लोहानी बताते हैं कि ट्रेन-18, सितंबर माह तैयार बनकर हो जाएगी और अगले माह ट्रायल शुरू हो जाएगा। ट्रायल और कमिश्नर आॅफ रेलवे सेफ्टी (सीआरएस) से क्लीयरेंस में 3 से 4 माह का समय लगेगा। अगले वर्ष  फरवरी तक दिल्ली भोपाल शताब्दी को रिप्लेस कर देंगे।

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