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कभी कैंटीन में धोता था बर्तन, आज है सागर रत्‍ना का मालिक

18 रुपए मिलती थी पगार, छह साल तक किया प्‍लेट धोने और टेबल साफ करने का काम

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नई दिल्‍ली. अगर आप दक्षिण भारतीय खाने के शौकीन हैं, तो सागर रत्‍ना रेस्‍टोरेंट के बारे में जरूर जानते होंगे। इस रेस्‍टोरेंट चेन को स्थापित करने वाला शख्‍स कभी 18 रुपए वेतन पर एक कैंटीन में प्‍लेट धोता था। लेकिन कठिनाइयों से हार न मानते हुए और अपने दम पर कुछ कर दिखाने की चाह ने उसे एक बड़ी और फेमस रेस्‍टोरेंट चेन का मालिक बना दिया। वह शख्‍स हैं जयराम बानन। आइए जानते हैं जयराम बानन के जीरो से हीरो बनने के सफर के बारे में-  

 

पिता के डर से छोड़ा घर

जयराम बानन का जन्‍म मंगलौर (कर्नाटक) के पास स्थित 'उडुपी' में हुआ था। उनके पिता ड्राइवर थे और बहुत ही गुस्‍सैल स्‍वभाव के थे। कई दफा गलती करने पर पिता ने बानन की आंख में मिर्ची पाउडर तक डाल दिया था। जब जयराम बानन स्‍कूल एग्जाम में फेल हो गए तो पिता से पिटने की डर से 13 साल में ही घर से भाग गए। घर से भागने के लिए उन्होंने अपने पिता के पॉकेट से कुछ पैसे निकाले और मंगलौर से मुंबई जाने वाली बस में सवार हो गए। बानन 1967 में बॉम्बे (आज का मुंबई) पहुंचे।

 

18 रुपए से शुरू की नौकरी

कई दिनों तक मुंबई में भटकने के बाद जयराम को एक छोटी कैंटीन में नौकरी मिली। इसमें प्‍लेट धोने से लेकर टेबल साफ करने का काम था। इसके लिए मासिक पगार 18 रुपए मिलती थी। जयराम ने प्‍लेट धोने और टेबल साफ करने का काम छह साल तक किया। प्‍लेट धोने के लिए सोडा का इस्‍तेमाल होता था,‍ जिससे इनका हाथ बुरी तरह से खराब हो गया था। इसके बावजूद बानन अपने काम में डटे रहे।

 

मुंबई से दिल्‍ली का सफर

जयराम उडुपी समुदाय से ताल्‍लुक रखते हैं। इसी समुदाय ने मुंबई में मसाला-डोसा से सभी को परिचय कराया है। मुंबई में बहुत सारे कॉम्‍पिटीटर को देखते हुए बानन ने दिल्‍ली का रुख करना बेहतर समझा। 1973 में जयराम मुंबई से दिल्‍ली आ गए। दिल्‍ली में इनका भाई एक उडुपी रेस्‍टोरेंट में काम करता था। यहां पर आकर बानन ने 1974 सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्‍स की कैंटीन का टेंडर लिया।

 

आगे पढ़ें- कैसे शुरू किया पहला आउटेलट 

5,000 रुपए से शुरू किया पहला आउटलेट

बानन ने 1986 में 5 हजार रुपए की सेविंग और दोस्‍तों-रिश्तेदारों से लोन लेकर डिफेंस कॉलोनी में सागर नाम से पहला आउटलेट खोला। यहां पर बानन को सप्‍ताह में 3,250 रुपए रेंट देने होते थे। इस आउटलेट में 40 लोगों के बैठने की जगह थी। पहले दिन की बिक्री 408 रुपए की हुई थी। बानन ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए हुए इंटरव्‍यू में बताया कि दिल्‍ली में शुरुआती दिन काफी कठिन थे, क्‍योंकि लोग दक्षिणी भारतीय डिश से ज्‍यादा अवगत नहीं थे। लेकिन खुद पर भरोसा था। मैंने फाइव स्‍टार होटल की क्‍वालिटी की डिश की कीमत हलवाई की दुकान के बराबर रखी।

 

आगे पढ़ें- ऐसे बना सागर रत्‍ना 

Woodlands बना सागर रत्‍ना

दिल्‍ली के लोग दक्षिण भारतीय डिश खाने के लिए वुडलैंड और दसप्रकासा (Dasaprakasa) रेस्‍टोरेंट में जाते थे। बानन को वुडलैंड रेस्‍टोरेंट लेने का मौका मिला। इस रेस्‍टोरेंट रेंट को लेने के लिए 34 लोगों ने आवेदन दिया, लेकिन बानन ने सबको पीछे छोड़ते हुए इस रेस्‍टोरेंट को हासिल कर लिया। फिर इसका नाम वुडलैंड से बदलकर सागर रत्‍ना रख दिया। इसके बाद बानन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज देश और विदेश में सागर रत्‍ना की कई फ्रेंचाइजी हैं। सिर्फ दिल्‍ली में ही इसके 30 से अधिक आउटलेट्स हैं। उत्‍तर भारत में 60 से अधिक आउटलेट्स हैं। विदेश में कनाडा, सिंगापुर, बैंकॉक जैसे देशों में भी आउटलेट्स हैं।

 

आगे पढ़ें- रोज 16 घंटे काम 

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