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टूटे शीशे से शुरू हुई ल्यूमैक्स की कहानी, अब हर दूसरी गाड़ी में लगती है इनकी लाइट्स

सालाना 13 हजार करोड़ रुपए है कंपनी का टर्नओवर

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नई दिल्ली. कभी गाड़ियों के शीशों के कारोबार से खर्च चलाने वाले परिवार ने आज करीब 13 हजार करोड़ रुपए सालाना टर्नओवर की कंपनी खड़ी कर दी। हैरत की बात है कि यह परिवार आजादी से पहले से बिजनेस कर रहा है और इस बिजनेस का आइडिया उसे कार के एक टूटे शीशे से मिला था। हम बात कर रहे हैं ल्यूमैक्स इंडस्ट्रीज की और मौजूदा दौर में इसकी अगुुुुआई डीके जैन कर रहे हैं।

 

हर दूसरी गाड़ी में लगते हैं इनके बल्ब

दिल्ली के सदर बाजार में साल 1945 में छोटी सी दुकान से शुरुआत करने वाले जैन परिवार के लाइटिंग इक्विपमेंट अब देश की हर दूसरी गाड़ी में लगते हैं। हीरो, मारुति, टाटा, टोयोटा, निसान, लैंड रोवर, ऑडी ल्यूमैक्स इंडस्ट्रीज जैसी कंपनियां इनकी कस्टमर हैं।

 

बड़े परिवार को चलाने के लिए शुरू की ट्रेडिंग

दिल्ली के सदर बाजार में छोटी सी दुकान चलाने वाला जैन परिवार आज 13 हजार करोड़ रुपए के सेल्स टर्नओवर वाले ल्यूमैक्स इंडस्ट्रीज का मालिक है। इंडियन ऑटोमोबाइल लाइटिंग इंडस्ट्री में कंपनी की हिस्सेदारी 60 फीसदी से अधिक है। ग्रुप के चेयरमैन एमेरिटस डीके जैन ने बताया कि उनके पिता सागर चंद जैन सरकारी नौकरी करते थे। जैन परिवार 1930 में हरियाणा से दिल्ली आया था। बड़ा परिवार होने के कारण वेतन से घर नहीं चलता था, इसलिए उनके पिता ने गाड़ियों के शीशों की ट्रेडिंग शुरू की।

 

ऑस्टिन के टूटे शीशे से मिला बिजनेस आइडिया

उनके पिता ने उस समय चलने वाली गाड़ी ऑस्टिन का टूटा शीशा देखा और उसेे बनवाने के लिए कहा। उन्हें उस टूटे शीशे में बिजनेस आइडिया मिल गया। साल 1945 में जैन परिवार ने सदर बाजार में दुकान खोली और शीशे का ही कारोबार शुरू किया। करीब पांच साल शीशे की ट्रेडिंग करने के बाद जैन परिवार ने ऑटोमोटिव लाइटिंग प्रोडक्ट मैन्युफैक्चरिंग करना शुरू किया।

 

आगे पढ़ें - अंग्रेजी नहीं आने से हुई कैसी परेशानी..

 

कम उम्र में संभालनी पड़ी कारोबार की जिम्मेदारी

पारिवारिक समस्याओं के कारण डीके जैन ने किसी कॉन्वेन्ट स्कूल में पढ़ाई नहीं की। स्कूली शिक्षा खत्म होने के बाद कॉलेज में दाखिला लिया, लेकिन एक साल में ही कारोबार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। उस समय अच्छी अंग्रेजी नहीं आने के कारण उन्हें कई बार नुकसान भी हुआ। हालांकि उन्होंने नुकसान से कई सबक भी सीखे।

 

 

अंग्रेजी नहीं आने से हुई कई परेशानी

अपने इन्हीं अनुभवों में से डी के जैन ने बताया कि 20 साल की उम्र में वह स्टैनली कंपनी के पास गाड़ी के शीशे के सैंपल देने गए। उस समय कंपनी के प्लांट मैनेजर जॉन टेलर ने सैंपल गाड़ी में लगाकर देखना चाहा लेकिन गाड़ी में लगाते के साथ ही शीशा टूट गया। इस पर जॉन टेलर अपना आपा खो बैठे और अंग्रेजी में चिल्लाने लगे। जैन ने बताया कि उन्हें टेलर की कोई भी बात समझ नहीं आ रही थी और वह सिर्फ सॉरी सर और यस सर कहे जा रहे थे। जैन उन पर चिल्लाए नहीं और न ही बहस की। जॉन टेलर को बाद में अहसास हुआ कि जिस पर वह चिल्ला रहे थे, उन्हें उनकी कोई बात समझ नहीं आई। टेलर ने जैन को लेटर भेजा, जिसमें लिखा था कि उनमें सीखने का गुण है।

 

 

1968 में शुरू किया पहला प्लांट

डीके जैन वह वक्त नहीं भूले जब वह साइकिल से कश्मीरी गेट जाया करते थे। उन्होंने साल 1960 में पहली एम्बेस्डर कार खरीदी थी। मायापुरी में 1968 में पहला प्लांट शुरू किया। इसके लिए उन्होंने दिल्ली फाइनेंशियल को-ऑपरेशन से तब 3 लाख रुपए का कर्ज लिया। उन्होंने बताया कि 1970 से 80 के दशक तक कारोबार में काफी तेजी आई। इस दौरान हीरो होंडा उनकी क्लाइंट बनी।

 

आगे पढ़ें - स्टैनले से किया समझौता

 

स्टैनले से किया समझौता

हीरो होंडा ने बाइक लाइटिंग बनाने को लेकर डी के जैन ग्रुप से संपर्क किया। उसी समय मारुति की भी शुरुआत हुई थी। उस दौरान मारुति ने 12 जेवी किए थे, जिसमें ल्यूमैक्स भी शामिल था। मारुति ने ल्यूमैक्स के प्रोडक्ट सैंपल चेक करने के बाद उनके साथ कारोबार की हामी दी। करीब 2 साल बाद मारुति को सप्लाई शुरु हो गई। जैन ने बताया कि स्टैैनलेे शुरू में समझौता नहीं करना चाहता था लेकिन हीरो होंडा और मारुति के दबाव के कारण झुकना पड़ा। समझौते के बाद कई मशीनेंं आईं और उनकी तकनीक बेहतर हुई, जिससे उनकी कॉस्ट भी कम हुई। अब स्टैनले के साथ उनके रिश्ते को करीब 34 साल हो चुके हैं।

 

 

1984 में आया पब्लिक इश्यू

1984 में ल्यूमैक्स का पब्लिक इश्यू आया जो 40 गुना ओवर सबस्क्राइब्ड हुआ। 1993 में स्टैैनले ने ल्यूमैक्स में 10 फीसदी हिस्सेदारी खरीद ली। साल 2002 तक कंपनी ने पांच प्लांट लगा लिए थे। अब उनके 10 प्लांट, 2 आरएंडडी सेंटर और ताइवान में डिजाइन सेंटर है। कंपनी के करीब 2,292 कर्मचारी हैं। ये जानकारी कंपनी की सालाना रिपोर्ट से ली गई है।

 

 

परिवार की तीसरी पीढ़ी चला रही है कारोबार

अब ल्यूमैक्स इंडस्ट्री को बागडोर अब परिवार की तीसरी पीढ़ी के हाथों में है। उनके बड़े बेटे दीपक जैन ने साल 1997 में कारोबार को ज्वाइन किया और छोटे बेटे अनमोल ने साल 2003 में कारोबार को ज्वाइन किया। अब उनके बड़े बेटे दीपक जैन कंपनी के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। उनके छोटे बेटे अनमोल ज्वाइंट मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। कंपनी का टर्नओवर 12,997 करोड़ रुपए है।

 

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