Home » Industry » Companiesऐसे शुरू हुई मारुति सु‍जुकी, संजय गांधी जन्‍मदिन विशेष- sanjay gandhi initiated for maruti suzuki and sonia gandhi was also MD

इस कंपनी पर गांधी परिवार ने लगाया था दांव, आज है नंबर वन

देश की सबसे बड़ी कार कंपनी मारुति सुजुकी संजय गांधी के चलते शुरू हुई थी..

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नई दिल्ली. संजय गांधी अगर जीवित होते तो आज 71 साल के होते। कल ही के दिन 14 दिसंबर 1946 को उनका जन्‍म हुआ है। महात्‍मा गांधी के अलावा संजय गांधी भारतीय  राजनीति के ऐसे नेता हैं, जिनके बारे में बारे में ये कयास लगाए जाते हैं कि अगर वह जीवित होते तो देश की राजनीति की दिशा क्‍या होती। हालांकि मात्र 34 साल की उम्र में उनका प्‍लेन दुर्घटना में निधन हो गया। 

संजय गांधी का राजनीति के अलावा इंडियन कॉर्पोरेट वर्ल्‍ड में भी बड़ा योगदान रहा है। देश की सबसे बड़ी कार कंपनी मारुति सुजुकी उन्‍हीं की वजह से शुरू हुई। किसी जमाने में सोनिया गांधी इस कार कंपनी की एमडी थीं। यह किस्‍सा करीब 45 साल पुराना है। रोचक बात यह है कि अपनी स्‍थापना के 13 साल तक कंपनी कोई कार भी नहीं बना सकी। तमाम विवादों से गुजरने के बाद केंद्र सरकार को 1980 में इसका नेशनलाइजेशन करना पड़ा। मारुति सुजुकी आज देश की टॉप-5 वैल्‍युएबल कंपनियों में शामिल है। हम यहां इस कंपनी से जुड़ी दिलचस्प बातों के बारे में बता रहे हैं...

 
ऐसे हुई थी कंपनी की शुरुआत
16 नवंबर 1970 को एक कंपनी मारुति टेक्निकल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड (एमटीएसपीएल) की शुरुआत हुई थी। इस कंपनी का उद्देश्य पूरी तरह से एक देसी कार बनाने के लिए डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग और असेंबलिंग से संबंधित टेक्निकल सर्विस उपलब्ध कराना था। कार बनाने के लिए जून, 1971 में कंपनी एक्ट के अंतर्गत एक कंपनी ‘मारुति लिमिटेड’ का गठन किया गया और संजय गांधी इसके पहले मैनेजिंग डायरेक्टर बन गए। सोनिया गांधी और एमटीएसपीएल के बीच 1973 में हुए एक फॉर्मल एग्रीमेंट के तहत उन्हें संजय गांधी के साथ मारुति लिमिटेड का एमडी बना दिया गया।
 

 

सोनिया गांधी को मिलती थी सैलरी 
इस एग्रीमेंट के तहत सोनिया गांधी और संजय गांधी की सैलरी पांच साल तक के लिए 2 हजार रुपए प्रति महीने तय की गई थी। कमीशन और पर्क्स अलग से थे। 1973 में ही एमटीएसपीएल और मारुति लिमिटेड के बीच एग्रीमेंट हुआ, जिसके तहत एमटीएसपीएल को भारत में पूरी तरह देसी कार बनाने के लिए डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग और असेंबलिंग से जुड़ी टेक्नोलॉजी सप्लाई करनी थी। 1975 में एमटीएसपीएल और मारुति लिमिटेड की सहायक कंपनी मारुति हैवी प्रा. लि. के साथ एक और एग्रीमेंट हुआ, जिसके तहत एमटीएसपीएल को रोड रोलर बनाने के लिए टेक्नोलॉजी से जुड़ी सर्विसेज देनी थीं।

 

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200 रुपए की पूंजी के साथ शुरू हुई थी कंपनी
 सोनिया गांधी और संजय गांधी एमटीएसपीएल के पहले परमानेंट डायरेक्टर थे, जिनके पास 10 रुपए प्रति शेयर कीमत के महज 20 शेयर थे। दूसरे शब्दों में लॉन्च के समय कंपनी की पेड अप कैपिटल 200 रुपए थी। इस प्रकार सोनिया और संजय शुरुआत में कंपनी के बराबर के पार्टनर थे। 15 दिसंबर, 1971 को एमटीएसपीएल सोनिया और संजय गांधी को बड़ी संख्या में शेयर अलॉट किए। 2 जून, 1972 को एमटीएसपीएल का मारुति लिमिटेड के साथ एग्रीमेंट हुआ, जिसके तहत तकनीक जानकारी देने के बदले एमटीएसपीएल को लगभग 5 लाख रुपए का भुगतान किया गया। इसके तहत, सोनिया और संजय को कारों की नेट सेल्स की 2 फीसदी सालाना टेक्निकल फीस भी मिलनी थी।

 

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कंपनी की कार का नमूना नहीं हो सका पास
 इस कार के बारे में माना जा रहा था कि यह पूरी तरह देसी कार होगी। हालांकि मारुति का प्रोटोटाइप (नमूना) 30 हजार किलोमीटर तक चलाने के लिए होने वाला वीआरडीई टेस्ट कभी पास ही नहीं कर पाया। इस कार में जर्मनी के टेक्नीशियन द्वारा जर्मन इंजन फिट किया गया था। इस टेक्नीशियन को कंसल्टेंट के तौर पर नियुक्त किया गया था। इस प्रोटोटाइप में वाइब्रेशन से लेकर ब्रेक फेल होने और स्टीयरिंग से जुड़ी समस्याएं सामने आई थीं।

 

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सरकार ने बदला नियम, मारुति को मिला लाइसेंस
आखिरकार, तत्‍कालीन हैवी इंडस्ट्रीज मिनिस्टर टीए पई ने आदेश दिया कि मारुति को मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस देने के लिए वीआरडीई टेस्ट अनिवार्य नहीं है। इस तरह 22 जुलाई 1974 को मारुति को 50 हजार कारों के प्रोडक्शन के लिए इंडस्ट्रियल लाइसेंस भी मिल गया। उस दौरान लगातार कंपनी को दिए जा रहे संरक्षण की जमकर आलोचना भी हुई थी। आरोपों पर तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी को भी सफाई देनी पड़ी थी।
 

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इंदिरा गांधी ने क्या कहा था
सितंबर 1970 में एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था, 'मेरा बेटा भद्र युवक है और उसके पास जो भी पैसा और एनर्जी है, उसने उससे एक मॉडल कार बनाई है, जो भारतीय हालात के लिए आरामदेह और उपयुक्त है। मेरे बेटे ने ऐसा प्रयास किया है और मैं उसके लिए उसे मना नहीं कर सकती। अगर उसे बढ़ावा नहीं दिया जाए तो मैं दूसरे युवाओं को जोखिम लेने के लिए कैसे कह सकती हूं।'
 
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1970 में मिल गया था 50 हजार कारों का ऑर्डर
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, तत्कालीन केंद्र सरकार ने संजय के कार के सपने को पूरा करने के लिए हरसंभव कोशिश की। कंपनी के पास पर्याप्त टेक्नोलॉजी और कैपिटल नहीं थी, जो इतने बड़े एंटरप्राइज के लिए जरूरी होते हैं। इसके बावजूद 30 सितंबर 1970 को संजय गांधी को सालाना 50 हजार कारों के प्रोडक्शन के लिए लेटर ऑफ इंटेंट (एलओआई) जारी कर दिया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, तत्कालीन इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट मिनिस्टर फखरुद्दीन अली अहमद और मिनिस्टर ऑफ स्टेट भानु प्रताप सिंह ने डायरेक्टरेट जनरल ऑफ टेक्निकल डेवलपमेंट पर कंपनी को एलओआई जारी करने के लिए खासा दबाव बनाया था। इसको लेकर तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी पर वंशवाद को बढ़ावा देने के आरोप लगे थे।

 

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1977 में इलेक्शन हारीं इंदिरा, हालात बिगड़े
 स्थापना के बाद से कंपनी एक भी कार नहीं बना सकी थी। हालांकि 1975 से 77 के बीच इमरजेंसी लगने के दौरान संजय पॉलिटिक्स में खासे सक्रिय हो गए और ‘आम आदमी की कार’ का मुद्दा खासा पीछे छूट गया। हालांकि, हालात तब खासे विपरीत हो गए, जब 1977 में देश में जनता पार्टी की सरकार बन गई और मारुति लिमिटेड बंद होने की कगार पर आ गई। इस बीच नई सरकार ने मारुति की जांच के लिए जस्टिस एपी गुप्ता की अगुआई में एक आयोग का गठन कर दिया। इस आयोग ने केंद्र सरकार को बेहद गंभीर रिपोर्ट सौंपी।
 

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मारुति का हुआ नेशनलाइजेशन, सोनिया का नाता टूटा
संजय गांधी की 23 जून 1980 को एक प्लेन क्रैश में मौत हो गई। इसके बाद कंपनी का परिचालन अधर में लग रहा था। इस बीच 1980 में इंदिरा गांधी में कांग्रेस सरकार फिर सत्ता में काबिज हो गई। संजय गांधी की मौत के एक साल बाद इंदिरा गांधी ने मारुति को उबारने के प्रयास शुरू किए। सरकार ने नई कंपनी के लिए एक सक्रिय पार्टनर की तलाश शुरू की। 1981 में मारुति उद्योग लिमिटेड नाम देकर कंपनी का नेशलाइजेशन कर दिया गया। इसके साथ ही सोनिया गांधी का कंपनी से नाता टूट गया। इस बीच जापानी कंपनी सुजुकी ने भारत में कार के प्रोडक्शन के लिए सरकार से संपर्क किया।
 

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मारुति और सुजुकी के बीच एग्रीमेंट
आखिरकार 1982 में मारुति उद्योग लिमिटेड और जापान की सुजुकी के बीच लाइसेंस और ज्वाइंट वेंचर एग्रीमेंट (जेवीए) पर दस्तखत हुए। इस प्रकार मारुति सुजुकी अस्तित्व में आई, जो शुरुआत में कारों की इंपोर्टर थी। उस समय कंपनी में सरकार की हिस्सेदारी 74 फीसदी थी। उस दौरान भारत 'क्‍लोज इकोनॉमी' वाला देश था। सुजुकी को पहले दो साल के लिए 40,000 कारों के इंपोर्ट का अधिकार दिया गया था, हालांकि शुरुआत में 33 फीसदी स्वदेशी उपकरणों की खरीद का लक्ष्य था। इससे स्थानीय मैन्युफैक्चरर्स को खासी निराशा हुई।
 
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1983 में बनी मारुति 800
तमाम प्रयासों के बाद आखिरकार 1983 में मारुति की पहली कार मारुति 800 मार्केट में आई, जो 796 सीसी की हैचबैक कार थी और भारत की पहली किफायती कार थी। दिसंबर 1983 में इसका लोकल प्रोडक्शन चालू हुआ था। उसके बाद मारुति वैन और जिप्सी मार्केट में आईं। 1986 में ओरिजिनल मारुति 800 ने 796 सीसी की कार की जगह ले ली। कंपनी ने 1986 में एक लाख कार बनाने की उपलब्धि हासिल कर ली। कंपनी ने 1987 में हंगरी को 500 कार भेजकर एक्सपोर्ट भी चालू कर दिया।
 

कब बनी पूरी तरह प्राइवेट कंपनी
 धीरे-धीरे यह कंपनी पूरी तरह प्राइवेट हो गई। इसका नाम अब मारुति सुजुकी प्राइवेट लिमिटेड है। सरकार अपनी हिस्सेदारी इसमें कम करती गई। वर्ष 2007 में सरकार अपनी शेष हिस्सेदारी फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस को बेचकर इस कंपनी से पूरी तरह निकल गई। शुरुआत में मारुति सुजुकी में सरकार की हिस्सेदारी 74 फीसदी और सुजुकी की हिस्सेदारी 26 फीसदी थी।

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