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भुट्टे से बनाई साड़ी, और 12 वीं पास ने ऐसे खड़ी कर दी 500 करोड़ की कंपनी

लक्ष्मीपति ब्रांड के संजय सरावगी ने भूट्‌टे से साड़ी बनाई है

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नई दिल्ली। भारत में पहली बार भुट्टे से साड़ी बनाई गई है। ये कारनामा 12वीं पास एक भारतीय ने अमेरिकी कंपनी के साथ मिलकर किया है। हम बात कर रहे हैं श्री लक्ष्मीपति ब्रांड और सिध्दी विनायक नॉट्स एंड प्रिंट प्राइवेट के एमडी संजय सरावगी की, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत 13 साल की उम्र में एक सेल्समैन के रूप में की, जो आज 500 करोड़ रुपए का साड़ी का बिजनेस करने वाले प्रमुख उद्योगपति के रूप में जगह बना चुके हैं।

 

 

13 साल की उम्र में संभाला कारोबार

सिध्दि विनायक नॉट्स एंड प्रिंट प्राइवेट लिमिटेड के एमडी संजय सरावगी ने moneybhaskar.com को बताया कि उनके पिता गोविंद प्रसाद सरावगी ग्वालियर रहते थे और उनका ट्रेडिंग का बिजनेस था। वह कारोबार में बेहतर करने के लिए सूरत आए। सूरत उस समय टेक्सटाइल हब के तौर पर डेवलप हो रहा था। उनके पिता ने सूरत में साड़ी की ट्रेडिंग का बिजनेस शुरू किया। सरावगी ने बताया, ‘पिता की हेल्थ प्रॉब्लम की वजह से 13 साल की कम उम्र में मुझे दुकान संभालनी पड़ी। तब मैं सुबह स्कूल जाता और उसके बाद दुकान संभालता।’

 

 

कम उम्र में सीखे मार्केटिंग के गुर

सरावगी ने कहा, ‘साल 1984 में 10वीं क्लास में पढ़ता था और तब मुझे गुजराती नहीं आती थी। ऐसे में मेरे लिए गुजरती बोलने वाले कस्टमर और डीलर को संभालना आसान नहीं था क्योंकि बच्चा होने के कारण कोई भी मुझे सीरियसली नहीं लेता था।’ उस समय दुकान चलाना आसान नहीं था क्योंकि दुकान किराए की थी। सरावगी ने कहा, ‘उस समय दुकान का किराया 1,500 रुपए था। कई बार हाल इतना बुरा होता था कि किराया चुकाने के लिए ही पैसे नहीं होते थे। 6 लोगो के परिवार को चलाने के लिए तंगी होती थी।’ उन्हें इन मजबूरियों ने मार्केटिंग के गुर सिखाने के साथ ही अच्छा सेल्समैन भी बना दिया।

 

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अपना फैब्रिक बनाकर निकाली साड़ी

उन्होंने साड़ी का कारोबार आगे बढ़ाने के लिए बुनकरों को साथ जोड़कर नए मैटेरियल पर साड़ी बनाने का काम शुरू किया। वह यार्न लेकर लूम्स वाले वीवर को देकर साड़ी बनाने लगे। उन्होंने सबसे पहले 90 के दशक में मैंगो सिल्क निकाला। वह कस्टमर को पसंद आया। उसके बाद लक्ष्मीपति ने मक्खन क्रेप, काजू क्रेप निकाला। आज के समय में लक्ष्मीपति ब्रांड 50 तरह के फैबरिक की साड़ी बनाते हैं।

 

 

मटका सिल्क हुआ फेमस

उनके पास जगह की कमी होने लगी, तो उन्होंने किराए की दुकान जे जे कॉलोनी में खरीदी। इसके बाद उन्हें कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा। इंडिया में उस समय सिल्क की साड़ी का दौर आया, तो उन्होंने पॉलिस्टर में सिल्क की साड़ी का फील देने वाला ‘मटका सिल्क’ बनाया। उस समय ‘मटका सिल्क’ साड़ी की कीमत 330 रुपए थी। वह चल निकला और कारोबार नॉर्थ इंडिया में तेजी से बढ़ने लगा।

 

 

फैक्ट्री खोलने पर लोगों ने बनाया मजाक

साल 2005 में इंडिया का टेक्सटाइल सेक्टर बहुत अच्छी हालत में नहीं था। संजय सरावगी ने बताया कि बहुत सारे लोगों और उनके पिता फैक्ट्री खोलने के फेवर में नहीं थे। लोग उनके प्रोजेक्ट को बेवकूफी वाला कदम मान रहे थे लेकिन उन्होंने दूसरों की बातों को गलत साबित किया।

 

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विदेशों में जाकर किया रिसर्च

संजय साल 2005 में पहली बार विदेश गए और वहां के टेक्सटाइल सेक्टर पर रिसर्च की। उन्होंने वहां के मैटेरियल, डिजाइन, कलर को एक्स्पलोर किया। उन्होंने अपने तरह के मैटेरियल बनाकर साड़ी बनाने के लिए टेक्नोलॉजी को इंपोर्ट किया। उन्होंने इटली, कोरिया, जापान से मशीनें मंगाई। अपनी फैक्ट्री शुरू की। उनका ये प्रोजेक्ट करीब 35 करोड़ रुपए का था। आज उनकी कैपेसिटी 50 लाख मीटर यानी करीब 8 लाख साड़ी महीना बनाने की है। उनकी कंपनी का टर्नओवर करीब 500 करोड़ रुपए है।

 

 

मक्के से बना रहे हैं साड़ी

अब वह मक्का का इस्तेमाल करके साड़ी बना रहे हैं। वह भुट्टे से बने फैबरिक को प्रोसेस कर साड़ी बना रहे हैं। ये इंडिया में पहली बार ऐसा हो रहा है कि भुट्टे का इस्तेमाल साड़ी बनाने में हो रहा है। पॉलिस्टर यार्न की जगह भुट्टे के बने यार्न जिसे सोरोना कहा जाता है उससे साड़ी बना रहे हैं। भुट्टे से बनी साड़ी का प्रोजेक्ट 250 करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट है। उनका टारगेट अगले 2 साल में भुट्टे के यार्न से करीब 1 लाख साड़ी बनाने का है।

 

 

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