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स्‍मार्टफोन में खतरे में आ जाती है आपकी प्राइवेसी, ये हैं 7 वजह

स्‍मार्टफोन ने इन्‍सान की जिदंगी और कामों को कई गुना आसान बनाया है लेकिन इससे प्राइवेसी पर खतरा भी है।

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नई दिल्‍ली. आजकल स्‍मार्टफोन का इस्‍तेमाल बहुत ही आम हो चला है। हर 10 में से 9 नए मोबाइल ग्राहक स्‍मार्टफोन ही खरीद रहे हैं। पूरी दुनिया में 232 करोड़ स्‍मार्टफोन यूजर हैं। इनमें से कई लोग तो एक से ज्‍यादा स्‍मार्टफोन इस्‍तेमाल कर रहे हैं। 

 

टेक्‍नोलॉजी बेहतर होने के फायदे तो होते ही हैं, साथ ही नुकसान भी होते हैं। यही बात स्‍मार्टफोन पर भी लागू होती है। कई मायनों में इसने इन्‍सान की जिदंगी और उसके कामों को कई गुना तक आसान बनाया है लेकिन इससे यूजर की प्राइवेसी पर खतरा भी है। वैसे तो लोग स्‍मार्टफोन की सिक्‍योरिटी को लेकर कई तरह के उपाय अपनाते हैं लेकिन कुछ चीजें ऐसी भी हैं, जिनके बारे में हमें पता ही नहीं है कि वे हमारा नुकसान भी करा सकती हैं।

 

स्‍मार्टफोन में कुछ ऐसे फीचर भी होते हैं, जिनके चलते उनकी इनफॉर्मेशन अनजान लोगों तक जा सकती है। इसके अलावा आपकी तरफ से अनजाने में हुई कुछ गलतियां भी इसकी वजह हैं। आइए आपको बताते हैं इन्‍हीं के बारे में-  

 

सोर्स: टेकरडार डॉट कॉम 

1. जियोट्रैकिंग या GPS

फोन में मौजूद इंटीग्रेटेड GPS चिप के जरिए फोन को लोकेट किया जा सकता है। वैसे तो यह इन्‍फॉरमेशन मुसीबत के वक्‍त आपकी लोकशन को पता करने के लिए काफी काम की होती है। लेकिन यह आपकी प्राइवेसी पर खतरा भी है। जीपीएस की मदद से आप कहां जा रहे हैं, किस शॉप से खरीदारी कर रहे हैं, किस बैंक में पहुंचे हैं आदि जैसी इन्‍फॉरमेशन लोकेट होती रहती है। अगर आप यह सोच रहे हैं कि जीपीएस ऑफ कर देने से आपको ट्रैक नहीं किया जा सकता है तो आप गलत हैं। ऐसी कई रिपोर्ट्स हैं, जिनमें सामने आया है कि फोन को कई अन्‍य सेंसर जैसे एक्‍सीलरोमीटर, बैरोमीटर और मैग्‍नेटोमीटर आदि से भी लोकेट किया जा सकता है और कई मामलों में ऐसा किया भी गया है। 

 

आगे पढ़ें- कुछ एप्‍स 

2. मैलिसियस एप्‍स 

कई स्‍मार्टफोन एप्‍स ऐसे भी होते हैं, जो इन्‍स्‍टॉलेशन के वक्‍त आपसे जरूरत से ज्‍यादा और गैर-जरूरी इन्‍फॉर्मेशन की एक्‍सेस मांगते हैं। उन एप्‍स को डाउनलोड करने के लिए हम बिना ज्‍यादा सोचे इस मांग को एक्‍सेप्‍ट कर लेते हैं। जबकि जरूरी है कि इन्‍स्‍टॉलिंग के वक्‍त अगर कोई नया गेम या ऐप हमारे कॉन्‍टैक्‍ट्स, जीपीएस और कैमरा के लिए एक्‍सेस मांग रहा है तो हम एक बार यह जरूर सोचें कि इसका उससे क्‍या लेना-देना है। अगर उन एप्‍स का इस इन्‍फॉर्मेशन से कोई संबंध नहीं है तो हमें ऐसे एप्‍स को इन्‍स्‍टॉल करने से बचना चाहिए। साथ ही हमें एप्‍स केवल भरोसेमंद सोर्स से ही डाउनलोड करने चाहिए। 

 

आगे पढ़ें- फ्री वाई-फाई का लालच 

3. फ्री वाई-फाई का लालच

कई बार हम अपने पर्सनल इंटरनेट डाटा को इस्‍तेमाल न करके किसी अनजान जगह या अनजान व्‍यक्ति के वाई-फाई कनेक्‍शन का इस्‍तेमाल मुफ्त में करने के लालच में आ जाते हैं। फ्री वाई-फाई आपका इंटरनेट डाटा तो बचा लेता है लेकिन आपकी प्राइवेसी के लिए खतरा बन जाता है। चूं कि इसमें किसी भी ऑथेंटिकेशन की जरूरत नहीं होती, इसलिए हैकर्स आसानी से आपके फोन तक पहुंच सकते हैं और उन्‍हें आपकी इंटरनेट एक्टिविटीज तक एक्‍सेस मिल जाती है। 

 

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4. एंटीवायरस सॉफ्टवेयर की कमी

कई लोग ऐसे भी हैं जो पर्सनल कंप्‍यूटर या लैपटॉप की सिक्‍यो रिटी के लिए तो एंटीवायरस सॉफ्टवेयर इन्‍स्‍टॉल करते हैं, लेकिन स्‍मार्टफोन के लिए ऐसा करना जरूरी नहीं समझते। लेकिन सच तो यह है कि आज के टाइम में लैपटॉप या कंप्‍यूटर से ज्‍यादा डाटा स्‍मार्टफोन में रहने लगा है, इसलिए इसमें भी एंटीवायरस सॉफ्टवेयर जरूरी है। 

 

आगे पढ़ें- फोन कैमरा भी बन सकता है मुसीबत 

5. अपग्रेडेशन

स्‍मार्टफोन के मामले में आईओएस में सिक्‍योरिटी अपग्रेडेशन काफी बेहतर है। समय-समय पर इसका ऑपरेटिंग सिस्‍टम अपग्रेड होता रहता है। लेकिन एंड्रॉयड के मामले में ऐसा नहीं है। यहां अपग्रेडेशन बहुत जल्‍दी-जल्‍दी नहीं होता। साथ ही कई लोग ऐसे भी हैं, जो अपग्रेडेशन आने के बावजूद पुराने एंड्रॉयड पर ही काम कर रहे होते हैं। इनमें से कई लोगों को अपग्रेडेशन की जानकारी नहीं होती है तो कई इसे जरूरी नहीं समझते हैं। ऑपरेटिंग सिस्‍टम आउटडेटेड होने के साथ सिक्‍योरिटी भी मजबूत नहीं रहती है। 

 

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6. आपके फोन का कैमरा 

स्‍मार्टफोन कैमरा भी आपके लिए खतरा बन सकता है। इसे आप पर नजर रखने के लिए एक्टिवेट किया जा सकता है। हैकर आपके फोन में फिजिकल एक्‍सेस या रिमोट एक्‍सप्‍लॉइटेशन के जरिए सॉफ्टवेयर इन्‍स्‍टॉल कर आप पर नजर रख सकते हैं। 

 

आगे पढ़ें- माइ‍क्रोफोन

7. माइक्रोफोन

हर स्‍मार्टफोन में माइक्रोफोन इनबिल्‍ट होता है। लेकिन यह माइक्रोफोन भी आपकी प्राइवेसी के लिए जोखिम है। कई बार कुछ कंपनियां स्‍मार्टफोन माइक के जरिए यूजर के इनवॉयरमेंट में घटित होने वाली चीजों को रिकॉर्ड कर लेती हैं और फिर इसे बेच देती हैं। इस डाटा से कई बार एडवर्टाइजिंग कंपनियां लोगों की रुचि को जानकर उन तक कैसे एड पहुंचाए जाएं इसका निर्णय लेती हैं।

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