Home » Industry » Companiesभारत के पहले दलित अरबपति राजेश सरैया- meet indias first dalit billionaire rajesh Saraiya

पैदा होते ही पिता ने तोड़ दी थी परंपरा, मिलिए देश के पहले दलित अरबपति से

राजेश सरैया देश के पहले अरबपति हैं। उनका कारोबार भारत से बाहर रूस और जर्मनी जैसे देशों में फैला है।

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नई दिल्‍ली. पुणे में अंग्रेजों की जीत का जश्‍न मनाने को लेकर शुरू हुए प्रदर्शन के बाद मुंबई का जीवन बुरी तरह पटरी से उतर गया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इस घटना के बाद शुरू हुए दलितों के प्रदर्शन में अब तक करीब 6 लोगों की मौत हुई है और सैकड़ों लोग घायल हुए हैं। इस हिंसा के चलते बीते दो दिनों के दौरान महाराष्‍ट्र की इकोनॉमी का हजारों करोड़ का नुकसान हुआ है। हाल के दौर में नजर दौड़ाएं तो दलित एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरे हैं। मुंबई का प्रदर्शन इसका सबसे ताजा उदाहरण है। 

 

हालांकि ऐसा नहीं है कि दलित सिर्फ राजनीतिक ताकत बनकर उभरे हैं। कई दलित ऐसे भी हैं जिन्‍होंने बिजनेस की दुनिया में भी बड़ा नाम किया है। इसमें सबसे बड़ा नाम राजेश सरैया का है। राजेश सरैया देश के पहले दलित अरबपति हैं। वह यूपी के एक मध्‍यमवर्गीय परिवार में पैदा हुए और आज उनका कारोबार भारत से बाहर रूस और जर्मनी जैसे देशों में फैला है। वह यूक्रेन बेस कंपनी SteelMont के चीफ एग्‍जीक्‍यूटिव हैं। उनकी कंपनी का टर्नओवर करीब 1200 करोड़ रुपए का है। 

 

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पिता ने नहीं रखा नाथू कालू जैसा नाम 
यूपी के सीतापुर जिले से सटे सरैया सैनी गांव में पैदा हुए। पिता नाथराम को उम्‍मीद थी कि बेटा बड़ा होकर कुछ बड़ा करेगा। यही कारण है कि उन्‍होंने बेटे का नाम दलितों के परंपरिक नामों नाथू, कालू न रखकर राजेश रखा। राजेश के पिता कहते हैं, मेरा पिता का खुद नाम कल्‍लूराम था, जबकि मेरा नाम नाथराम। पर मैंने यह परंपरा तोड़ दी, लेकिन गांव के नाम उनके नाम के आगे रखा। इस तरह नाम पड़ा राजेश सरैया। 

 

 

 

25 साल से यूरोप में पर बसेंगे तो भारत में 
राजेश की शुरआती पढ़ाई देहरादून में हुई और बाद में उन्‍होंने रूस से एयरोनॉटिक्‍स इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। बाद में SteelMont की नींव रखी। उनकी कंपनी मेटल में ट्रेडिंग करती है। उसका बेस यूक्रेन में है, जबकि आजकल वह जर्मनी में रहते हैं। उनकी कंपनी ब्रिटेन में ट्रेडिंग करती है। हालांकि राजेश को भारत से बेहद प्‍यार है। वह कहते हैं कि उनके बच्‍चे और वह इतने साल तक बाहर रहने के बावजूद भारतीय पासपोर्ट रखते हैं। उनका इरादा आने वाले वक्‍त में भारत में आकर ही बसने का है।  वह भारत में फूड प्रोसेसिंग की यूनिट खोलना चाहते हैं। यह सारे बाते पिछले साल मीडिया को दिए इंटरव्यू में कहीं थी।

 

 

 

नहीं हुआ कोई भेदभाव 
राजेश के मुताबिक, इतने साल से वह भारत और भारत से बाहर करोबार कर रहे हैं, लेकिन उनके साथ कभी भी दलित होने के नाते किसी तरह का भेदभाव नहीं हुआ। राजेश कहते हैं कि भारत सरकार के साथ साथ अन्‍य विदेशी सरकारों को का रूख उनको लेकर हमेशा पॉजिटिव रहा। राजेश को भारत सरकार की ओर से दो बड़े अवॉर्ड मिल चुके हैं। इसमें 2014 का पद्मश्री और 2012 का प्रवासी भारतीय अवॉर्ड शामिल हैं। 

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