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मिलिए असली पैडमैन से, एक जिद ने 106 देशों में हिट कर दिया बिजनेस

फिल्म 'पैडमैन' अरूणाचलम मुरूगनाथन की जिंदगी पर आधारित है जिन्होंने अपनी वाइफ और गांव की महिलाओं की परेशानी को देखते हुए

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नई दिल्ली। शुक्रवार को फिल्म 'पैडमैन' आ रही है। फिल्म 'पैडमैन' अरूणाचलम मुरूगनाथन की जिंदगी पर आधारित है जिन्होंने अपनी वाइफ और गांव की महिलाओं की परेशानी को देखते हुए सेनेटरी नैपकिन बनाने की सस्ती मशीन डेवलप की। अब उन्हें देश-विदेश में लोग जानते हैं लेकिन एक समय ऐसा था कि जिनकी परेशानी को खत्म करने के लिए वह काम कर रहे थे, वहीं उनकी वाइफ और मां उन्हें छोड़कर चले गए। गरीब परिवार से आने वाले मुरूगनाथन ने सेनेटरी नैपकिन के कारोबार का बिजनेस मॉडल डेवलप किया है।

 

 

14 साल की उम्र में छोड़ना पड़ा स्कूल

 

अरूणाचलम मुरूगनाथन के माता-पिता कोयम्बटूर में हैंडलूम बुनकर थे। मुरूगनाथन छोटे थे जब उनके पिता की रोड एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई। अपने पिता की मृत्यु के बाद उनकी लाइफ गरीबी में बीती। अरूणाचलम की पढ़ाई जारी रहे इसके लिए उनकी मां फार्म लेबर के तौर पर काम करने लगी। 14 साल की उम्र में उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा। स्कूल छोड़ने के बाद अरूणाचलम ने फॉर्म लेब, मशीन टूर ऑपरेटर, वेल्डर जैसी कई नौकरी की। वह फैक्ट्री वर्कर को खाना भी सप्लाई करते थे।

 

शादी के बाद वाइफ की परेशानी ने किया मोटिवेट

 

उनकी साल 1998 में शांति से शादी हो गई। तब उन्हें पता चला कि उनकी वाइफ अपने सैनिटरी नैपकिन की जगह न्यूजपेपर या पुराने कपड़ें इकट्ठा करती है। जब उन्होंने अपनी वाइफ की इस परेशानी को देखा तो उन्होंने इस दिशा में काम करने के बारे में सोचा। उन्होंने शुरूआत में कॉटन से सैनिटरी नैपकिन बनाया, जिसे उनकी वाइफ और बहनों ने रिजेक्ट कर दिया। उन्होंने अरूणाचलम के बनाए नैपकिन का टेस्ट करने से ही मना कर दिया।

 

आगे पढ़ें - फुटबाल से बनाया यूटरस

कोई महिला नहीं मिली प्रोडक्ट टेस्टिंग के लिए

 

सैनिटरी नैपकिन बनाते हुए उन्हें उस समय पता चला कि नैपकिन बनाने की कॉस्ट अगर 10 पैसा आती थी तो कंपनियां उन्हों रॉ मैटेरियल से 40 गुना ज्यादा दाम में मार्केट में बेचती थी। मुरूगनाथन को अपने बनाए सैनिटरी नैपकिन के लिए फीमेल वॉल्युंटर चाहिए थी जो उनके बनाए पैड को टेस्ट कर सके लेकिन गांव की कोई भी महिला टेस्ट करने के लिए तैयार नहीं थी। उन्होंने मेडिकल कॉलेज की स्टूडेंट को भी टेस्ट करने के लिए कहा लेकिन वहां भी कोई तैयार नहीं हुआ।

 

फुटबाल से बनाया यूटरस

 

उन्होंने इसे स्वयं ही टेस्ट करने का फैसला लिया। उन्होंने फुटबाल का यूटरस बनाया और उसे बकरी के ब्लड से भर दिया। मुरूगनाथन चलकर, भागकर, साइकिल चलाकर आर्टिफिशल यूटरस से अपने बनाए सैनिटरी पैड का अब्जॉर्पशन रेट चेक करते। उनके इस तरीके से टेस्ट करने से उनके कपड़ों से गंदी स्मैल आती जिसके कारण लोग उनको बॉयकॉट करने लगे। गांव के लोगों को लगा कि वह पागल हो गए हैं।

 

उनकी वाइफ उन्हें छोड़कर चली गई

 

उन्होंने जिसके लिए यह रिसर्च शुरू की यानी उनकी वाइफ उनकी रिसर्च के 18 महीने बाद मुरूगनाथन को छोड़कर चली गई। कुछ समय बाद उनकी मां भी उन्हें छोड़कर चली गई। मुरूगनाथन को उनके परिवार और गांव ने बहिष्कृत कर दिया था। उनके गांव के लोग मुरूगनाथन के बारे में सोचने लगे थे कि उनपर किसी का साया हैं और वह उन्हें एक पेड़ से बांध रहे थे। वह अपने आप को गांव वालों से छुड़ाने में तब कामयाब जब उन्होंने कहा कि वह गांव छोड़ देंगे।

 

आगे पढ़ें - कितने साल लगे रिसर्च में..

पैड किससे बनता है इसकी मिस्ट्री हुई सॉल्व

 

एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा कि उनकी मां, पत्नी उन्हें छोड़कर चली गई थी और गांव के लोगों ने उन्हें बहिष्कृत कर दिया था लेकिन तब भी उन्होंने सस्ते सैनिटरी नैपकिन बनाने के अपने रिसर्च को बंद नहीं किया। एक दिन उनके लिए यह मिस्ट्री खत्म हो गई कि सैनिटरी पैड किसका बनता है। उन्हें ये पता चला कि यह कॉटन से बनता है लेकिन वह जिस कॉटन का इस्तेमाल करते थे। मल्टीनेशनल कंपनी उसी कॉटन का इस्तेमाल नहीं करती थी।

 

 

करीब 2 साल लगे रिसर्च में..

 

मुरूगनाथन उस समय अंग्रेजी नहीं बोल पाते थे, तो एक कॉलेज प्रोफेसर ने उन्हें बड़ी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को लेटर लिखने में मदद की। इस पूरे प्रोसेस में मुरूगनाथन करीब 7,000 रुपए फोनकॉल्स पर खर्च कर चुके थे। कोयंबटूर की टेक्सटाइल मिल ने उनसे सैंपल मांगे। कुछ हफ्तों बाद मुरूगनाथन को फाइनली पता चला कि सैनिटरी नैपकिन सेलुलोज के बनते हैं। उन्हें ये जानने में करीब 2 साल 3 महीने लगे कि सैनिटरी नैपकिन किसके बनते हैं।

 

स्वयं बनाई सैनिटरी नैपकिन बनाने की मशीन

 

अब उन्हें ऐसी मशीन चाहिए थी, जो इस मैटेरियल से सस्ते सैनिटरी नैपिकन बना सके। मल्टीनेशनल कंपनियां करोड़ों रुपए महंगी मशीनों से सैनिटरी नैपिकन बनाती हैं। अब उन्हें एक अपने लिए मशीन भी डिजाइन करनी थी। करीब साढे चार साल बाद हजारों एक्सपेरिमेंट के बाद वह सस्ते सैनिटरी नैपिकन बनाने की मशीन बनाने में कामयाब रहे। उनकी वह पहली मशीनरी ज्यादातर लकड़ी से बनी थी जिसे उन्होंने आईआईटी मद्रास के साइंटिस्ट को दिखाई। उन्होंने उनकी बनाई मशीन को नेशनल इनोवेशन अवार्ड के लिए भेजा। उनका मॉडल टॉप 943 एंट्री में शामिल हुआ। तब उन्हें तब राष्ट्रपति रहीं प्रतिभा पाटिल ने इनोवेशन के लिए अवार्ड दिया। ये एक स्कूल ड्रॉपआउट के लिए बड़ी बात थी।

 

अपनी मशीन का कराया पेटेंट

 

तब वह लाइमलाइट में आए और करीब साढे पांच साल बाद उन्हें उनकी पत्नी शांति का कॉल आया। उसके बाद उन्होंने जयश्री इंडस्ट्रीज बनाई, जो लो कॉस्ट सैनिटरी नैपकिन बनाने वाली मशीन बनाती है। उनके पास अपनी बनाई मशीन का पेटेंट राइट है। एमबीए पास करके आया छात्र अपनी इस इनोवेशन से करोड़ों कमा सकता था लेकिन मुरूगनाथन ने ऐसा नहीं किया। मुरूगनाथन फेमस हो गए थे लेकिन उनका मकसद प्रॉफिट कभी नहीं रहा।

 

आगे पढ़ें - बनाई सस्ते में पैड बनाने वाली मशीन..

75,000 रुपए की बनाई मशीन

 

मुरूगनाथन ने 18 महीने में 250 लो कॉस्ट सैनिटरी नैपकिन बनाने वाली मशीन बेची। ये ज्यादातर बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में बेची। उनके ज्यादातर क्लाइंट एनजीओ और सेल्फ हेल्प ग्रुप हैं। उनकी बनाई मैनुअल मशीन की कीमत 75,000 रुपए है। इसके अलावा उन्होंने सेमी ऑटोमेटेड मशीन भी बनाई है। ये मशीन रोजाना 200 से 250 सैनिटरी नैपकिन बना सकती है। अरूणाचलम मुरूगनाथन की कंपनी जयश्री इंडस्ट्रीज ने सेनेटरी नैपकिन के कारोबार का बिजनेस मॉडल बनाया हुआ है। ये कंपनी अन्य लोगों को भी सेनेटरी नैपकिन बनाने की यूनिट लगाने में भी मदद करती है।

 

 

आईआईएम और हार्वर्ड में दे चुके हैं लेक्चर

 

उनका मकसद न सिर्फ सस्ते सैनिटरी नैपकिन बनाने की थी बल्कि वह रूरल एरिया में महिलाओं के लिए रोजगार के मौके भी बढ़ाना चाहते थे। अब वह एक सोशल एंटरप्रेन्योर बन चुके हैं। आईआईएम अहमदाबाद, आईआईएम बैंगलोर, आईआईटी बॉम्बे और हार्वर्ड में लेक्चर दे चुके हैं। वह अपना कारोबार मॉरिशियस, केन्या, नाइजीरिया और फिलिपिन्स जैसे करीब 106 देशों में फैला चुके हैं।

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