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10वीं पास अनिल अग्रवाल ने शुरू की थी वेदांता, कभी होटल में जाने से लगता था डर

तमिलनाडु के तूतीकोरन में प्रदूषण फैलाने के चलते वेदांता समूह की कंपनी स्टरलाइट कॉपर बंद करने की मांग तेज होती जा रही है

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नई दिल्‍ली. तमिलनाडु के तूतीकोरन जिले में प्रदूषण फैलाने के चलते वेदांता समूह की कंपनी स्टरलाइट कॉपर को बंद करने की मांग तेज होती जा रही है। यह वही वेदांता रिसोर्सेज है, जो भारत में सबसे बड़ी माइनिंग और नॉन फैरस मेटल्‍स कंपनी के तौर   पर जाना जाता है। 78,950 करोड़ रुपए रेवेन्‍यु वाली वेदांता रिसोर्सेज को पटना के केवल 10वीं पास अनिल अग्रवाल ने शुरू किया और अपनी बिजनेस स्किल्‍स के दम पर भारत के मेटल मुगल बन गए। आज वेदांता का कारोबार भारत, ब्रिटेन, जांबिया, नामीबिया, साउथ अफ्रीका, आयरलैंड, ऑस्‍ट्रेलिया आदि में फैला हुआ है। आइए आपको बताते हैं 10वीं पास एक शख्‍स के मेटल मुगल बनने की कहानी-  

 

स्‍कूल छोड़कर पिता का हाथ बंटाया

15 साल के अनिल अग्रवाल ने 10वीं पास करने के बाद स्‍कूल छोड़ दिया और अपने पिता के एल्‍युमीनियम कंडक्‍टर बनाने के बिजनेस में हाथ बंटाने लगे। हालांकि इसमें उनका मन नहीं लगा और वह 19 साल की उम्र में एक बेहतर करियर की तलाश में मुंबई निकल गए। यहां उन्‍होंने स्‍क्रैप डीलर के तौर पर काम शुरू कर दिया। इस दौरान वह दूसरे राज्‍यों से स्‍क्रैप डीलिंग किया करते थे।    


ऐसे आया कंपनी शुरू करने का आइडिया 

अनिल के एक इंटरव्‍यू के मुताबिक, एक दिन वह मुंबई स्थित फाइव स्‍टार ओबेरॉय होटल के बाहर पहुंचे। वह होटल के अंदर जाना चाहते थे, लेकिन डर रहे थे क्‍योंकि उन्‍हें अंग्रेजी का एक शब्‍द भी नहीं आता था। किसी तरह दूसरों की मदद लेकर वह सिर्फ 1 दिन होटल में गुजारने की मंशा से अंदर गए। इसी दौरान उनके दिमाग में आइडिया आया कि वह यहां बैठकर अपने बिजनेस को बेहतर तरीके से चला सकते हैं। इस तरह करीब 3 महीने तक वह होटल में ही ठहरे। यहीं से उन्‍हें वेदांता रिसोर्सेज को शुरू करने का आइडिया आया।

 

लोन लेने के लिए बैंक के बाहर रहते थे खड़े

अनिल अग्रवाल ने वेदांता रिसोर्सेज की शुरुआत कर दी थी। कंपनी शुरुआत में दूसरे राज्‍यों की केबल कंपनी से स्‍क्रैप लेती थी और मुंबई में बेचती थी। इसी दौरान 1979 में अनिल ने शमशेर स्‍टर्लिंग कॉरपोरेशन नाम की कंपनी का अधिग्रहण कर अपना बिजनेस बढ़ाना चाहा। यह कंपनी तांबा समेत अन्‍य प्रोडक्‍ट्स बनाती थी। इसके लिए उन्‍हें 50 हजार रुपए लोन की जरूरत थी। अनिल सिंडिकेट बैंक से लोन हासिल करने के लिए रोज बैंक के बाहर खड़े रहते। उनकी नजर इस पर टिकी रहती कि अगर बैंक मैनेजर का मूड अच्‍छा है, तो वह लोन दे देगा। इस तरह उन्‍होंने लोन हासिल किया। इस कंपनी का नाम स्‍टरलाइट इंडस्‍ट्रीज रखा गया। 

 

आगे पढ़ें- ऐसे बढ़ाते गए कारोबार

ऐसे बढ़ाया कारोबार 

करीब 10 साल तक अनिल अग्रवाल अपने इन दोनों बिजनेस का आधार मजबूत करते रहे। 1986 में उन्‍होंने केबल मैन्‍युफैक्‍चरिंग का बिजनेस शुरू किया। इसके बाद अनिल ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्‍होंने 1995 में बंद पड़ चुकी मद्रास एल्‍यु‍मीनियम का और मालको में 80 फीसदी हिस्‍सेदारी का अधिग्रहण किया। 1999 में स्‍टरलाइट ने तस्‍मानिया और थलंगा कॉपर माइन्‍स का अधिग्रहण किया। 2001 में अनिल की कंपनी ने प्राइमरी एल्‍यु‍मीनियम प्रोड्यूसर बाल्‍को में 51 फीसदी हिस्‍सेदारी खरीदी। इस तरह अनिल अग्रवाल अपने बिजनेस को भारत में बढ़ाते रहे।
 
आगे पढ़ें- लंदन में लिस्‍टेड पहली भारतीय कंपनी 

लंदन स्‍टॉक एक्‍सचेंज में लिस्‍टेड होने वाली पहली भारतीय कंपनी 

2003 में लाइसेंसी राज से परेशान अनिल लंदन चले गए। यहां शुरुआत करते हुए कुछ ही सालों के भीतर उनकी कंपनी लंदन स्‍टॉक एक्‍सचेंज (LSE) में लिस्‍टेेड हो गई। ऐसा करने वाली यह भारत की पहली कंपनी बनी। 2004 में स्‍टरलाइट ने जांबिया की कोनकोला कॉपर माइन्‍स में 51 फीसदी हिस्‍सेदारी की खरीद की। 2007 में वेदांता ने सेसा गोवा लिमिटेड में 51 फीसदी हिस्‍सेदारी हासिल कर ली। 2013 में वेदांता ने स्‍टरलाइट इंडस्‍ट्रीज और सेसा गोवा का मर्जर कर दिया और नई कंपनी सेसा स्‍टरलाइट लिमिटेड खड़ी की। 

 

आगे पढ़ें- किन सेक्‍टर्स में कर रही काम 

कितने सेक्‍टर्स में ऑपरेशनल 

वर्तमान में वेदांता ग्रुप जिंक, सिल्‍वर, शीशा, ऑयल एंड गैस, लौह अयस्‍क, कॉपर, एल्‍युमीनियम और पावर सेक्‍टर्स में ऑपरेशन करती है। वेदांता न्‍यूयॉर्क स्‍टॉक एक्‍सचेंज पर भी लिस्‍टेड है।

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