कभी दूध की जगह पानी में Horlicks पीते थे भारतीय सैनिक, अमीरों का बन गया था स्‍टेटस सिंबल

145 साल पुराने ब्रांड हॉर्लिक्‍स का सौदा होने जा रहा है। इसके ओनर जीएसके ग्रुप ने इसे एक अन्‍य डील के लिए फंड जुटाने के तहत बेचने का फैसला कर लिया है। हालांकि यह पहली बार नहीं है जब हॉर्लिक्‍स का सौदा हो रहा है। इसे बनाने वाले दो ब्रिटिश भाइयों ने भी 1869 में इसे जीएसके ग्रुप को बेच दिया था।

moneybhaskar

Mar 28,2018 02:13:00 PM IST

नई दिल्‍ली. 145 साल पुराने ब्रांड हॉर्लिक्‍स का सौदा होने जा रहा है। इसके ओनर जीएसके ग्रुप ने इसे एक अन्‍य डील के लिए फंड जुटाने के तहत बेचने का फैसला कर लिया है। हालांकि यह पहली बार नहीं है जब हॉर्लिक्‍स का सौदा हो रहा है। इसे बनाने वाले दो ब्रिटिश भाइयों ने भी 1869 में इसे जीएसके ग्रुप को बेच दिया था। तब से यह जीएसके के ही पास है।

वैसे तो हॉर्लिक्‍स यूके का प्रॉडक्‍ट है लेकिन इसकी सबसे ज्‍यादा बिक्री भारत में होती है। भारत में इसकी एंट्री दूसरे विश्‍व युद्ध के बाद हुई। ब्रिटिश आर्मी के भारतीय सैनिक इसे अपने साथ लाए थे। उस वक्‍त इसे भारत की बड़ी रियासतों और अमीर घरानों ने न केवल अपनाया, बल्कि ये उनका स्‍टेटस सिंबल बन गया। आइए आपको बताते हैं कैसे शुरू हुई हॉर्लिक्‍स की जर्नी और भारत में कैसे बनाई इसने अपनी पैठ-

ये थे इसके ईजादकर्ता

इसे दो ब्रिटिश भाइयों विलियम हॉर्लिक और उनके भाई जेम्‍स ने इंग्‍लैंड में र्इजाद किया था। जेम्‍स एक केमिस्‍ट थे, जो ड्राई बेबी फूड बनाने वाली कंपनी के लिए काम करते थे। उनके छोटे भाई विलियम 1869 में अमेरिका आए थे। दोनों ने 1873 में मॉल्‍टेड मिल्‍क ड्रिंक बनाने वाली कंपनी J&W हॉर्लिक्‍स शुरू की। उन्‍होंने अपने प्रॉडक्‍ट को डायस्‍टॉइड नाम दिया। उनका स्‍लोगन था- हॉर्लिक का इन्‍फैंट और इनवैलिडट्स फूड। 5 जून 1883 को दोनों भाइयों ने अपने प्रॉडक्‍ट के लिक्विड में मिक्‍स हो जाने की योग्‍यता के लिए यूएस पेटेंट नंबर 278,967 हासिल कर लिया और पेटेंट पाने वाला पहला मॉल्‍टेड मिल्‍क प्रॉडक्‍ट बन गया।

आगे पढ़ें- यूके में पहली फैक्‍ट्री

1908 में यूके में पहली फैक्ट्री 1908 में विलियम और जेम्स ने बर्कशायर के स्लॉ में अपनी पहली यूके फैक्ट्री शुरू की। इसकी लागत 25.8 लाख रुपए थी। उसके बाद यह लोकप्रिय होता चला गया। माउंटेनियर्स और पोलर एक्सप्लोरर्स इसे एक्सपेडीशंस पर साथ ले जाते थे। एक माउंटेनियर रिचर्ड बायर्ड ने तो एक माउंटेन को हॉर्लिक्स माउंटेन का नाम भी दिया था। इसकी लोकप्रियता पहले विश्व युद्ध (1914) के दौरान और ज्यादा बढ़ गई। आम लोग और सैनिक इसे बहुत ही अच्छा सप्लीमेंट मानते थे। उस वक्त इसे पानी में घोल के पिया जाता था। उसके बाद दूसरे विश्व युद्ध में हॉर्लिक्स टैबलेट्स को कैंडी की तरह बेचा गया और अमेरिकी, ब्रिटिश और अन्य सैनिकों ने इसे एनर्जी बूस्टर के रूप में इस्तेमाल किया। आगे पढ़ें- 1948 लंदन ओलंपिक में रहा अहम1948 ओलंपिक में रही अहम भूमिका 1948 का लंदन ओलंपिक हॉर्लिक्स के लिए एक अन्य गर्व वाला क्षण रहा। ऑर्गेनाइजिंग कमेटी ने उस ओलंपिक में भाग लेने वाले सभी लोगों को हॉर्लिक्स प्रदान किया। इसे बेडटाइम ड्रिंक और खेल के दौरान सर्व किया जाता था। इसके अलावा हॉर्लिक्स अब तक कई प्रोग्राम्स और कॉम्पिटीशंस को स्पॉन्सर कर चुका है। 2010 की माउंटेन क्लाइंबिंग से जुड़ी वॉकिंग विद द वाउंडेड चैरिटी इनमें से एक है। आगे पढ़ें- ऐसा जीएसके को बिका1969 में गया जीएसके के पास हॉर्लिक्स की बढ़ती लोकप्रियता के चलते इसे 1969 में बीशम ग्रुप ने खरीद लिया। 1989 के बाद इस ग्रुप का नाम स्मिथलाइन बीशम हो गया और आज यह ग्लैक्सोस्मिथलाइन ग्रुप है। इसकी दूसरी फैक्ट्री 1958 भारत के आंध्र प्रदेश में खुली। आगे पढ़ें- भारत में ऐसे हुई एंट्रीभारत में कब हुई एंट्री द्वितीय विश्वयुद्ध से लौटे ब्रिटिश आर्मी के भारतीय सैनिक भारत में सबसे पहले हॉर्लिक्स लाए थे। 1940 और 1950 के दशक में पंजाब, बंगाल और मद्रास की रियासतों व देश के अन्य संपन्न परिवारों ने इसे सबसे पहले फैमिली ड्रिंक के रूप में अपनाया। उस वक्त यह अपर मिडिल क्लास और अमीर लोगों के लिए स्टेटस सिंबल बन गया। 70 के दशक के पहले हमारे देश में दूध की कमी थी। श्वेत क्रांति के बाद भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बना। उससे पहले लोगों को न्यूट्रीशन डायट नहीं मिल पा रही थी। उदारीकरण के बाद देश में कई घरेलू और इंटरनेशनल न्यूट्रीशनल प्रॉडक्ट्स की एंट्री हुई। हॉर्लिक्स भी उनमें से एक था। उस वक्त बॉर्नवीटा और कॉम्प्लैन, देश के पश्चिमी और उत्तरी हिस्से में हॉर्लिक्स के प्रमुख प्रतिद्वंदी थे। साथ ही एक लोकल कंपनी जगतजीत इंडस्ट्रीज के माल्टोवा और वीवा ब्रांड भी उत्तर में पैठ बनाए हुए थे। कॉम्पिटीशन को कम करने के लिए GSK ने माल्टोवा और वीवा को खरीद लिया। भारत में हॉर्लिक्स का सबसे पहला फ्लेवर मॉल्ट था। उसके बाद वनीला, टॉफी, चॉकलेट, हनी और इलायची, केसर-बादाम फ्लेवर पेश किए गए। आगे पढ़ें- पोषण पहुंचाने में कर रहा सहयोगभारत में पोषण में सहयोग देने में है आगे इस वक्त हॉर्लिक्स भारत में बच्चों से लेकर महिला-पुरुष हर किसी को न्यूट्रीशन के बारे में जागरुक करने और इसे प्रदान करने में अहम योगदान दे रहा है। भारत में आहार अभियान के तहत हर हॉर्लिक्स बॉटल की बिक्री से 1 रुपया इसमें जाता है। इसका उद्देश्य 3 से 6 साल के बच्चों की मां के बीच प्रॉपर न्यूट्रीशन के बारे में जागरुकता फैलाना है। इसके अलावा 1 से 12 वीं क्लास के बच्चों के लिए हॉर्लिक्स विजकिड्स कल्चरल व लिटरेरी कॉम्पीटीशन भी है। इसमें श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश के बच्चे भाग ले सकते हैं। यह बच्चों को अपना टैलेंट दिखाने का मौका देने वाला दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा इंटरस्कूल फिएस्टा है। आगे पढ़ें- इतने प्रॉडक्ट्स मौजूदइस वक्त कितने प्रॉडक्ट्स इस वक्त हॉर्लिक्स यूके, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, हांगकांग, बांग्लादेश, भारत और जमैका में मैन्युफैक्चर होता है। ओरिजिनल हॉर्लिक्स के बाद कंपनी ने 1982 में इंस्टैंट हॉर्लिक्स को ईजाद किया और इसे सैशे फॉर्म में उतारा। उसके बाद इसके चॉकलेट और चॉकलेट मॉल्ट फ्लेवर भी लाए गए। 1993 में हॉर्लिक्स बिस्किट, 1995 में बच्चों के लिए जूनियर हॉर्लिक्स, 1997 में मांओं के लिए मदर्स हॉर्लिक्स, 2005 में डायबिटिक लोगों के लिए हॉर्लिक्स लाइट, 2006 में हॉर्लिक्स न्यूट्रीबार्स, 2008 में वुमन्स हॉर्लिक्स, 2009 में फूडल्स इंस्टैंट नूडल्स, 2011 में हॉर्लिक्स गोल्ड और हॉर्लिक्स ओट्स लॉन्च किए।
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