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फौजी के लड़के ने मिल्कशेक बेच कर कमा लिए 100 करोड़, कभी डूब गई थी 100 साल पुरानी कंपनी

साल 2015 में सोहराब द्वारा कंपनी संभालने के 3 साल के अंदर कंपनी दुबई, लंदन, स्विटजरलैंड में भी अपनी पहुंच बना चुकी है।

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नई दिल्ली। मिल्कशेक से कमाई कर भी 100 करोड़ रुपए के क्लब में शामिल हो सकते हैं, ऐसा शायद आसान नहीं है। लेकिन देश में एक ऐसी कंपनी है केवल मिल्कशेक बेचकर इस क्लब में पहुंच गई है। हम कैवेंटर्स की बात कर रहे हैं। कैवेंटर्स के इस माइलस्टोन पर पहुंचने का कारनामा एक फौजी के लड़के सोहराब सीताराम न कर दिखाया है। जिन्होंने एक बंद पड़ी कंपनी को केवल 3 साल में इस लेवल तक पहुंचाया है। कैंवेटर्स करीब 119 साल पहले उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले से शुरू हुई है। लेकिन बाद में यह यंग जेनरेशन को अट्रैक्ट नहीं कर पाई जिसकी वजह से इसे डालमिया परिवार ने बंद कर दिया था। लेकिन साल 2015 में सोहराब द्वारा कंपनी संभालने के केवल 3 साल के अंदर कंपनी दुबई, लंदन, स्विटजरलैंड में भी अपनी पहुंच बना चुकी है।

 

आजादी से पहले हुई कैवेंटर्स की शुरुआत

 

साल 1900 में अलीगढ़ में स्वीडन के कारोबारी एडवर्ड कैवेंटर्स ने डेरी फार्म की शुरुआत की। जिसके बाद 1925 में कैवेंटर्स ब्रांड लोगों के सामने आया। साल 1940 में यह ब्रांड कृष्णा डालमिया को दिल्ली में 48 डिस्ट्रीब्यूशन आउटलेट के साथ मिल गया। यह लगातार बढ़ता गया। इसकी पब्लिसिटी का आलम यह था कि कैवेंटर्स इंडियन आर्मी को मिल्क पाउडर भी सप्लाई करने लगी।

 

फिर आया बुरा दौर

 

यंग जेनरेशन को अट्रैक्ट न कर पाने की वजह से धीरे-धीरे मिल्कशेक की डिमांड कम होने लगी। हालात यह हो गए कि साल 1970 में कैवेंटर्स ने मेन फैक्ट्री बंद कर दी और कैवेंटर्स का मिल्कशेक ब्रांड भी डूबने लगा था। हालांकि उसके एक दो आउटलेट दिल्ली में चलते रहे। लेकिन फिर करीब 44 साल बाद कृष्णा डालमिया के पर पोते अगस्त्य डालमिया ने अपने दोस्त के साथ खत्म होते ब्रांड को फिर से खड़ा करने का प्लान किया।

 

आगे पढ़े - कैसे हुई शुरुआत

2014 में फिर से की शुरुआत

 

उन्होंने कैवेंटर्स को साल 2014 में को कुछ पुराने और नए फ्लेवर्स के साथ रीइन्वेंट किया। अगस्त्य डालमिया और उनके दोस्त अमर अरोड़ा ने जब एक साल पीतमपुरा आउटलेट में काम किया तो जाना कि वह केवल पुरानी जेनरेशन को ही टारगेट कर पाएं हैं। एक साल के अंदर उन दोनों ने वह आउटलेट बंद कर दिया। फिर एक ऐसे व्यक्ति की तलाश करने लगे जिसे फूड एंड बेवरेज बिजनेस की समझ हो। डालमिया यह समझ चुके थे कि भले ही कंपनी बंद हो गई है लेकिन ब्रांड कैवेंटर्स अभी भी जिंदा है। यही से सोहराब सीताराम की एंट्री हुई।

 

सोहराब की बिजनेस में हुई एंट्री

 

अगस्त्य डालमिया और अमर अरोड़ा ने सोहराब सीताराम को संपर्क किया। सोहराब सीताराम एक फौजी के बेटे हैं जिन्हें फूड और बेवरेज इंडस्ट्री की अच्छी जानकारी थी। उन्होंने लेड ब्लैक वाटर, ची एशियन कुकहाउस, चैटर हाउस जैसे ब्रांड को खड़ा किया है। सोहराब ने कैवेंटर्स का नाम नहीं सुना था और वह अगस्त्य डालमिया और अमर अरोड़ा के साथ काम करने को लेकर बहुत उत्सुक नहीं थे लेकिन आखिर में उन दोनों ने सोहराब को साथ काम करने के लिए मना लिया।

 

आगे पढ़े - कैसे बना ग्लोबल ब्रांड

साल 2015 में कैवेटर्स की हुई रिब्रांडिंग

 

साल 2015 में उन्होंने सोहराब को बिजनेस प्लान और सीईओ की पोस्ट के साथ एक बार फिर ब्रांड ऑफर किया। इसके बाद उनकी पार्टनरशिप की शुरुआत हुई। सोहराब ने कैवेंटर्स में प्लास्टिक ग्लास और स्ट्रा को हटाकर ग्लास बोतल और पेपर स्ट्रा रखे। इससे ब्रांड की इमेज को सुधारने में मदद मिली। उन्होने कियॉस्क और उनकी ब्रांडिंग पर काफी काम किया। उन्होंने पहला आउटलेट दिल्ली में साकेत सिलेक्ट सिटी वॉक में खोला और यह हिट रहा। उसके बाद सोहराब और उसकी टीम को मुड़कर नहीं देखना पड़ा।

 

100 करोड़ का बन चुका है ब्रांड

 

अब कैवेंटर्स के ग्लोबली और इंडिया में 287 आउटलेट हैं। एक समय पर कैवेंटर्स लगभग बंद हो चुका था और अब स्विजरलैंड, दुबई और लंदन जैसे शहरों में इनके आउटलेट हैं। उनके फ्रेचाइजी मॉडल ने के कारण वह हर महीने 20 आउटलेट खोल रहे हैं। सोहराब सीताराम मिल्कशेक कारोबार को 100 करोड़ तक पहुंचा चुके हैं। साल 2019 तक सोहराब 100 नए आउटलेट खोलने का प्लान कर रहे हैं। अब वह नेपाल और वेस्ट एशिया में अपने स्टोर खोलना चाहते हैं। (सोर्स-योर स्टोरी और पीटीआई)

 

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