Home » Industry » Companiesधीरूभाई अंबानी का कारोबारी सफर- Journey of Dhirubhai Ambani

1000 रुपए बन गए 62 हजार करोड़, ऐसा था धीरूभाई अंबानी का कारोबारी सफर

धीरूभाई अंबानी को भारत में अब तक का सबसे जीनियस बिजनेसमैन माना जाता है।

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नई दिल्‍ली. इंडियन कॉरपोरेट वर्ल्‍ड में अक्‍सर यह बात कही जाती है कि अगर बिजनेस करना है तो धीरूभाई से सीखें। धीरूभाई अंबानी को भारत में अब तक का सबसे जीनियस बिजनेसमैन माना जाता है। धीरूभाई ने थोड़े समय में जितनी बड़ी सफलता अर्जित की, वह किसी सामान्‍य व्‍यक्ति के लिए आसान नहीं है। उनका तेज दिमाग जब भी बिजनेस में कुछ नया करने के बारे में सोचता था तो उसमें सफलता की पूरी गारंटी होती थी। आइए जानते हैं कि कैसे उन्‍होंने मुंबई में अपने कारोबारी सफर की शुरुआत की और कैसे कामयबी की सीढियां चढ़ते गए।

 

रिलायंस इंडस्‍ट्रीज की हाल ही में मनाई गई 40वीं वर्षगांठ पर मुकेश अंबानी ने कहा था कि धीरूभाई ने केवल 1000 रुपए से रिलायंस की शुरुआत की थी। 6 जुलाई 2002 को जब उनकी मौत हुई तब तक रिलायंस 62 हजार करोड़ की कंपनी बन चुकी थी। 1000 रुपए से 62 हजार करोड़ का सफर आसान नहीं था, इस दौरान उन्‍होंने कई कई उतार-चढ़ाव देखे। हालांकि हर बार धीरूभाई चैंपियन बनकर ही निकले।

 

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कठिनाई से शुरू हुआ सफर

गुजरात के छोटे से गांव चोरवाड़ के एक स्कूल में शिक्षक हीराचंद गोवर्धनदास अंबानी के तीसरे बेटे धीरूभाई अंबानी का जन्म 28 दिसंबर 1932 को हुआ। आर्थिक तंगी के चलते धीरूभाई ने हाईस्‍कूल तक की पढ़ाई की। इसके बाद उन्‍होंने छोटे-मोटे काम शुरू किए। हालांकि इससे परिवार की सारी जरूरतें नहीं पूरी हो पा रही थीं। यह धीरूभाई के सफर का शुरुआती दौर था, आगे बड़ी सफलता उनका इंतजार कर रही थी।

 

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काबोटा शिप, यमन और भारत वापसी

धीरूभाई के जीवन में सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब वह 1949 में 17 वर्ष की उम्र में काबोटा नामक शिप से यमन के अदन शहर पहुंचे थे। यहां उनके बड़े भाई रमणीकलाल पहले से ही काम किया करते थे। वहां अंबानी ने ‘ए. बेस्सी एंड कंपनी’ के साथ 300 रूपये प्रति माह के वेतन पर पेट्रोल पंप पर काम किया। लगभग दो सालों बाद ‘ए. बेस्सी एंड कंपनी’ जब ‘शेल’ नामक कंपनी के प्रोडक्‍ट्स की वितरक बनी तो धीरुभाई को अदन बंदरगाह पर कम्पनी के फिलिंग स्टेशन में मैनेजर बना दिया गया। हालांकि धीरूभाई के दिमाग में कुछ और ही था। इसलिए 1954 में वे वतन वापस आ गए।

 

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केवल 500 रुपए लेकर आए मुंबई

यमन में रहने के दौरान धीरूभाई के दिमाग में बड़ा आदमी बनने का सपना पलने लगा था। यही कारण है कि भारत आने के एक साल बाद वह सपनों के शहर मुंबई पहुंच गए। अंबानी जब घर से मुंबई के लिए निकले तो उनकी जेब में सिर्फ 500 रुपए की रकम थी। हालांकि मन में हौसला बड़ा था। उनके कारोबारी सफर की शुरुआत मुंबई से ही हुई। 

 

आगे पढ़ें- कैसे हुई रिलायंस की शुरुआत 

रिलायंस कॉरपोरेशन की शुरुआत 

गुजरात से मुंबई पहुंचे धीरूभाई के सपने तो बड़े थे, लेकिन उनके पास पूंजी कम थी। उस दौर में भारत में सबसे ज्‍यादा मांग पॉलिस्‍टर की थी और विदेश में भारत के मसालों की। 350 वर्ग फुट का कमरा, एक मेज़, तीन कुर्सी, दो सहयोगी और एक टेलिफोन के साथ धीरूभाई ने रिलायंस कॉमर्स कॉरपोरेशन की नींव रखी। उनकी कंपनी भारत से मसाला भेजती थी और वहां से पॉलिस्‍टर के धागे मंगाती थी। 

 

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VIMAL ब्रांड के साथ टेक्‍सटाइल में रखा कदम 

धीरूभाई अपने तरीकों से बिजनेस में आगे बढ़ रहे थे। उन्‍होंने 1966 में कपड़े बनाने के कारोबार में कदम रखा और VIMAL ब्रांड की शुरुआत की। शार्प एडवर्टिजमेंट स्‍ट्रैटेजी से कुछ ही सालों में विमल ब्रांड भारत का जाना-माना नाम बन गया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ल्‍ड बैंक के एक्‍सपर्ट पैनल ने VIMAL के कपड़ों को वर्ल्‍ड क्‍वालिटी का बताया था। धीरूभाई देश के सबसे बड़े टेक्‍सटाइल किंग बनाना चाहते थे, लेकिन उस दौर में बॉम्‍बे डाइंग उनकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा थी।

 

आगे पढ़ें- कॉरपोरेट जंग का भी हुआ सामना 

शुरू हुई कॉरपोरेट जंग 

अंबानी VIMAL को देश का नंबर वन टेक्‍सटाइल ब्रांड बनाना चाहते थे। लेकिन पहले से ही नंबर वन पोजीशन होल्‍ड करने वाले नुस्‍ली वाडिया को यह किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं था। इसके चलते दोनों के बीच वर्चस्‍व को लेकर तकरार शुरू हो गई। अंबानी को जोखिम पंसद था, आरोप लगा कि उन्‍होंने आगे बढ़ने और ज्‍यादा प्रोडक्‍शन के लिए सरकारी नियमों को अनदेखी की। वहीं नुस्‍ली वाडिया एक मंझे हुए कारोबारी थे, उन्‍होंने जनता पार्टी सरकार में 1977-78 के दौरान 60 हजार टन DMT के प्रोडक्‍शन का लाइसेंस हासिल कर लिया। हालांकि उन्‍हें इसका लाइसेंस मिलने में 3 साल लग गए। कहा जाता है कि ऐसा अंबानी के कारण हुआ। 

 

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लाइसेंस राज खत्‍म होने के बाद बदले दिन 

1985 में कांग्रेस सरकार के वित्‍त मंत्री और बाद में देश के प्रधानमंत्री बनने वाले वीपी सिंह से धीरूभाई के रिश्‍ते बेहतर नहीं बन पाए। हालांकि 1992 में जैसे ही देश में लाइसेंस राज की समाप्ति की घोषणा हुई, रिलायंस ने तेजी से तरक्‍की की। 1992 में ग्‍लोबल मार्केट से फंड जुटाने वाली रिलायंस देश की पहली कंपनी बनी। 2000 के आसपास रिलायंस पेट्रो कैमिकल और टेलिकॉम के सेक्‍टर में आई। 2000 के दौरान ही अंबानी देश के सबसे रईस व्‍यक्ति बनकर भी उभरे। हालांकि 6 जुलाई 2002 को धीरूभाई अंबानी की मौत हो गई। 

 

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बच्‍चे संभाल रहे विरासत  

धीरूभाई की मौत के बाद उनके दोनों बेटों ने कारोबार को आपस में बांट लिया। मौजूदा समय में उनके बड़े बेटे मुकेश अंबानी देश के सबसे रईस व्‍यक्ति हैं। उनके छोटे बेटे अनिल अंबानी भी देश के टॉप रईस लोगों में शुमार किए हैं। 

 

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