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सस्‍ते हेलमेट ले रहे जान, जानिए क्‍या है मोदी सरकार का प्‍लान

सस्‍ते हेलमेट आपकी जान बचने के चांस घटा देते हैं।

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नई दिल्‍ली. देश में रोज अनगिनत एक्‍सीडेंट होते हैं। इनमें ज्‍यादातर टूव्‍हीलर चलाने वाले होते हैं। अगर पूरी दुनिया की बात करें तो भी रोड एक्‍सीडेंट में कार ड्राइवर्स से ज्‍यादा आंकड़े टूव्‍हीलर राइडर्स के मरने के हैं। 2016 के आंकड़ों को देखें तो उस साल जितने भी एक्‍सीडेंट हुए, उनमें टूव्‍हीलर्स के एक्‍सीडेंट का आंकड़ा 33.8 फीसदी रहा। 

 

देश में एक बहुत बड़ा टूव्‍हीलर राइडर का तबका ऐसा है, जो राइडिंग के वक्‍त हेलमेट का इस्‍तेमाल करता ही नहीं है। 2016 में हुई सड़क दुर्घटनाओं में 52,500 टूव्‍हीलर राइडर्स थे और इनमें से 10,135 यानी 19.3 फीसदी बिना हेलमेट के थे। वहीं जो लोग हेलमेट इस्‍तेमाल करते हैं, उनमें से ज्‍यादातर सस्‍ते हेलमेट को तवज्‍जो देते हैं। यही सस्‍ते हेलमेट आपकी जान बचने के चांस घटा देते हैं। एक्‍सीडेंट में हेलमेट की भूमिका को लेकर अब सरकार भी जागरुक हो चुकी है। 

 

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क्‍या है सरकार का प्‍लान 

हाल ही में ET मैगजीन को दिए एक इंटरव्‍यू में सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने ने सड़क दुर्घटनाओं में मरने और घायल होने वाले भारतीयों की बढ़ती संख्‍या पर चिंता जताते हुए कहा था कि केन्‍द्र सरकार भी लोगों को हेलमेट की उपयोगिता को लेकर जागरुक हो चुकी है। हम जल्‍द ही नकली हेलमेट पर लगाम लगाने के लिए हल्‍के लेकिन क्‍वालिटी वाले हेलमेट लॉन्‍च करेंगे और उन्‍हें प्रमोट करेंगे।  

 

आगे पढ़ें- अच्‍छा हेलमेट 42 फीसदी बढ़ा देता है बचने के चांस 

अच्‍छे हेलमेट से 42 फीसदी बढ़ जाते हैं बचने के चांस 

यूनाईटेड नेशन्‍स मोटरसाइकिल हेलमेट स्‍टडी के मुताबिक, अगर कोई इन्‍सान एक सही हेलमेट पहनता है तो एक्‍सीडेंट में उसके सर्वाइवल के चांस 42 फीसदी बढ़ जाते हैं, साथ ही चोट से बचने के चांस 69 फीसदी बढ़ जाते हैं। लेकिन देश में ज्‍यादातर लोग सस्‍ता हेलमेट ही पसंद करते हैं क्‍योंकि आज भी राइडर्स की एक बड़ी संख्‍या केवल चालान से बचने के लिए हेलमेट खरीदती है। ऐसे लोग हेलमेट पर ज्‍यादा पैसा खर्च करना पैसे की बर्बादी मानते हैं। भारत में जहां एक साधारण हेलमेट की कीमत 150 रुपए है, वहीं ब्रांडेड व अच्‍छा हेलमेट 1000 रुपए में आता है। 

 

आगे पढ़ें- आईएसआई मार्क भी हो सकता है नकली

नकली ISI मार्क वाले हेलमेट भी हैं मौजूद 


कई हेलमेट ऐसे भी हैं, जिन पर नकली ISI  मार्क होता है। लोगों को लगता है कि ISI मार्क है तो हेलमेट अच्‍छा ही होगा। ऐसे हेलमेट की कीमत बहुत कम होती है और उसका वजन भी कम होता है, इसलिए लोग इसे एक सस्‍ता और अच्‍छा सौदा मानकर खरीद लेते हैं और एक्‍सीडेंट के वक्‍त उन्‍हें खामियाजा भुगतना पड़ता है। टॉप हेलमेट मैन्‍युफैक्‍चरर्स का मानना है कि भारत में 75-80 फीसदी लोग नकली हेलमेट को खरीद लेते हैं क्‍योंकि वह हल्‍का होता है। उनका तो यहां तक कहना है कि नकली हेलमेट नकली दवा की तरह होता है। 

 

आगे पढ़ें- बार-बार सस्‍ता हेलमेट ही चुनते हैं भारतीय 

पिछले अनुभव से भी नहीं लेते सबक 

सस्‍ता और हल्‍का हेलमेट एक्‍सीडेंट के वक्‍त आपकी सुरक्षा करने में अक्षम होता है। ऐसे हेलमेट छोटे से एक्‍सीडेंट में भी टुकड़ों में बंट जाते हैं, ऐसे में अगर बड़ा एक्‍सीडेंट होता है तो आप अंदाजा लगात सकते हैं कि क्‍या हो सकता है। देश में कई राइडर ऐसे हैं, जो एक्‍सीडेंट में सस्‍ते हेलमेट के कई टुकड़ों में बंट जाने के बावजूद अगली बार फिर से सस्‍ता हेलमेट ही चुनते हैं। उन्‍हें इस बात से कोई मतलब नहीं कि हेलमेट की क्‍वालिटी कैसी है, क्‍या वो एक्‍सीडेंट के वक्‍त उन्‍हें चोट से बचा भी पाएगा या नहीं, उन्‍हें तो बस सस्‍ता हेलमेट ही चाहिए। 

 

आगे पढ़ें- 2020 तक क्‍या होगा 

2020 तक 34 लाख होंगे बाइक एक्‍सीडेंट में मरने वाले 

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ऐसा आकलन है कि 2008 से 2020 तक पूरी दुनिया में मोटरसाइकिल एक्‍सीडेंट में मरने वालों की संख्‍या 34 लाख होगी। साथ ही ऐसा भी अनुमान है कि इनमें से 14 लाख को बचाया जा सकता है अगर वे सुरक्षित हेलमेट का सही तरीके से इस्‍तेमाल करें। 

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