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बारूद के ढेर से भरा है ये शहर, सालाना करता है 5,000 करोड़ का कारोबार

तमिलनाडु का शिवकाशी का शहर पटाखों का सबसे बड़ा हब है।

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नई दिल्ली। तमिलनाडु के शिवकाशी का शहर दिवाली के समय अक्सर खबरों बना रहता है क्योंकि ये पटाखों का सबसे बड़ा हब है। हालांकि, दिल्ली में पटाखों पर लगे नए नियमों और बैन का असर शिवकाशी में पटाखा कारोबारियों पर पड़ा है। शिवकाशी में पटाखे वर्ल्ड वार टू के टाइम से बन रहे हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि पटाखा बनाने की प्रेरणा माचिस बनाने से मिली थी। इसकी शुरुआत शिवकाशी की जगह कोलकाता से हुई थी। आइए जानते हैं कैसे कोलकाता से शिवकाशी पहुंचे पटाखे..

 

माचिस बनाने से शुरू हुआ पटाखों का कारोबार

 

भारत में 20 वीं शताब्दी तक पटाखों का इस्तेमाल गन पाउडर और आयरन बोरिंग तक सीमित था। 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में दास गुप्ता ने कोलकाता में माचिस की फैक्ट्री की शुरूआत की थी। उस दौरान दो कारोबारी शानमुगा नाडर और इया नाडर कारोबार के सिलसिले में कोलकाता गए। वह जिस लॉज में ठहरे थे, उसके पास दास गुप्ता की माचिस फैक्ट्री थी। वह उनकी फैक्ट्री देखकर हैरान रह गए।

 

कोलकाता से शिवकाशी पहुंचा पटाखो का कारोबार

 

उनकी फैक्ट्री से प्रेरणा लेकर उन्होंने तमिलनाडु के शिवकाशी में पहली माचिस की फैक्ट्री लगाई। माचिस बनाने के कारोबार में सफलता मिलने का बाद वह पटाखे बनाने लगे। अभी तक भारत में पटाखे जर्मनी और इंग्लैंड से इंपोर्ट होते थे।

 

सेकंड वर्ल्ड वार के समय भारत में बढ़ने लगा पटाखों का कारोबार

 

सेकंड वर्ल्ड वार अंत के समय स्टैण्डर्ड फायरवर्क, कालिसवारी फायरवर्क और नैशनल फायरवर्क देश में बड़े पटाखा कारोबारी बन गए थे। शिवकाशी बड़ी पटाखा इंडस्ट्री के तौर पर डेवलप होने लगा। देश में दिवाली के समय अधिकतम पटाखे बिकने लगे। पटाखे बनाने के लिए लगने वाला रॉ मैटेरियल भी बनने लगा।

 

आगे पढ़ें - पटाखों के लिए शिवकाशी क्यूं बना पसंदीदा जगह

पटाखों के लिए शिवकाशी क्यूं बना पसंदीदा जगह

 

शिवकाशी में सबसे कम बारिश होने और ड्राई क्लाइमेट के कारण शिवकाशी पटाखा बनाने के लिए बेस्ट डेस्टिनेशन बन गया। पटाखे बनाने के लिए मदद करने वाले मौसम के कारण शिवकशी और इसके आसपास के एरिया में पटाखो का प्रोडक्शन बढने लगा। जहां साल 1923 में जहां एक या दो फैक्ट्री हुआ करती थी, वहां 1986 में सिर्फ तमिलनाडू में 260 पटाखा फैक्ट्री बन चुकी थी।

 

पटाखा कारोबार का असंगठित क्षेत्र से संगठित होने तक का सफर

 

 

बीते 15 सालों में पटाखा इंडस्ट्री में काफी परिवर्तन आए हैं। पटाखा कारोबार अनऑर्गनाइज़्ड से ऑर्गनाइज्ड होने लगा। तमिलनाडु के अलावा महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, यूपी और केरल में पटाखा फैक्ट्री खुल चुकी है। साल 1977-1978 के बीच पटाखो को लेकर भारत ने विश्व स्तर पर चीन की मोनोपोली खत्म कर दिया। उस समय भारत ने 40 लाख रुपए के पटाखे एक्सपोर्ट किए और क्वालिटी में चीन के पटाखों के मुकाबले भारतीय पटाखों को बेहतर प्रोडक्ट माना गया। आज शिवकाशी पटाखा कारोबार में देश का बड़ा केंद्र बन गया।

 

 

देश में करोड़ों रुपए का है पटाखों का कारोबार

 

देश में 90 फीसदी पटाखा कारोबार शिवकाशी में होता है। आज यहा 800 से अधिक फैक्ट्री है। पटाखों का कारोबार भारत में पूरे साल चलता है। लेकिन दिवाली के समय में पटाखों के कारोबार का वॉल्युम मैक्सिमम होता है। दिवाली के 15-20 दिनों में 90 फीसदी पटाखों की बिक्री हो जाती है। भारत में पटाखों का कारोबार करीब 6,000 करोड़ रुपए का है। इस कारोबार से पांच लाख लोग जुड़े हुए हैं। शानमुगा नाडर की पटाखा फैक्ट्री स्टैंडर्ड फायरवर्क के नाम से मशहुर है।

 

आगे पढ़ें - पटाखों के अलावा किसके लिए फेमस है शिवाकाशी

शिवकाशी प्रिंटिंग इंडस्ट्री का है बड़ा केंद्र

 

शिवकाशी इंडिया का प्रिंटिंग हब भी है। यहां देश की 60 फीसदी ऑफसेट प्रिंटिंग होती है। प्रिंटिंग मशीन की संख्या के मामले में शिवकाशी वर्ल्ड में दूसरे नंबर पर आता है। प्रंटिंग मशीन की संख्या में पहले नंबर पर जर्मनी का गुथेनबर्ग शहर है।

 

- यहां बैंक की चेक बुक, फ्लाइट टिकट, लॉटरी टिकट प्रिंट होती हैं।

 

- इसके अलावा यहां नोटबुक, मैगेजिन, ग्रीटिंग कार्ड्स, कैलेंडर, ट्रेड लेबल्स बनते हैं। यहां से ये एक्सपोर्ट भी होते हैं।

 

- शिवकाशी में प्रिंटिंग कारोबार से 50,000 वर्कर जुड़े हुए हैं। यहां प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी के लिए स्कूल भी है।

 

- यहां प्रिंटिंग इंडस्ट्री करीब 1,500 करोड़ रुपए की है। ये मार्केट सालाना 10 फीसदी की दर से बढ़ रहा है।

 

- यहां फिल्मों के पोस्टर भी बनते हैं।

 

चीन में सबसे पहले बने पटाखे

 

करीब 200 BC साल पहले चाइनीज लोग नेचुरल पटाखा देखकर हैरान रह गए जब अचानक खोखले हरे बांस के जलने पर तेज आवाज निकली। हवा के दबाव के कारण इतनी तेज आवाज निकली जो पहले नहीं सुनी थी। इसने लोगों और जानवरों को बुरी तरह डरा दिया। उन्हें लगा कि इससे बुरी स्पिरिट ‘निआन’ को डराया जा सकता है क्योंकि चाइनीज का मानना था कि वह उनकी फसल और इंसानों को खा जाता है। इसके बाद वह शादी, जन्म, नए साल और राजतिलक के समय हरे बांस जलाते थे, ताकि बुरी बलाओं को दूर रख सके।

 

चीन ने विश्व को दिया पटाखों का कारोबार..

 

चीन में फायरवर्क की शुरुआत सातंवी शताब्दी में हैन राजवंश के समय हुई। तब गन पॉउडर का अविष्कार नहीं हुआ था। चाइनीज ने पोटेशिया नाइट्रेट, शहद, अरसेनिक सल्फाइड को आग पर जलाया, तो ब्राइट और गर्म फ्लेम निकली। इसे ‘हुओ याओ’ यानी ‘फायर डंग’ नाम दिया गया। जल्द ही चाइनीज ने बांस को फायर डंग से भर कर आग लगाई तो तेज आवाज के साथ बांस दो हिस्सों में फट गया। इसने सही मायनो में पटाखों के कॉन्सेप्ट को जन्म दिया। चाइनीज ने पटाखों को एक आर्ट की तरह दूसरे देशों में एक्सपोर्ट करना शुरू कर दिया। साल 1240 में अरब ने गनपॉवर का इस्तेमाल चीन से सीखा।

 

 

 

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