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इस साल कश्मीरी सेब 15-20% सस्ता, प्रोडक्शन ज्यादा होने से सप्लाई बढ़ी

हालांकि सेब की कीमत कम रहने से कश्‍मीर के बागवानों को नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

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नई दिल्‍ली. बाजार में कश्‍मीर के सबसे उम्‍दा 'रेड डिलीशियस' सेब की बिक्री शुरू हो चुकी है। इस साल ग्राहकों को यह सेब 15-20 फीसदी सस्‍ता मिलेगा। इसकी वजह कश्‍मीर में इन सेबों का इस साल अच्‍छा प्रोडक्‍शन है, जिसकी वजह से बाजार में इनकी सप्‍लाई अच्‍छी है। पिछले साल रेड डिलीशियस की कीमत 850-900 रुपए पेटी थी लेकिन इस साल कीमत 700-750 रुपए पेटी है। इसका फायदा ग्राहकों को भी होगा। हालांकि सेब की कीमत कम रहने से कश्‍मीर के बागवानों को नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। 

 

200 रुपए तक कम हैं इस साल दाम 
जम्‍मू फ्रूट एसोसिएशन के प्रेसिडेंट व जम्‍मू चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्‍ट्री के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट राजेश गुप्‍ता ने moneybhaskar.com को बताया कि इस साल रेड डिलीशियस की पैदावार में पिछले साल के मुकाबले 30 फीसदी का इजाफा है। यह सेब खाने वालों के लिए तो अच्‍छी खबर है लेकिन ग्रोअर्स को इसकी वजह से नुकसान झेलना पड़ रहा है। कश्‍मीर के कुछ इलाकों में ओला पड़ने से माल खराब हुआ लेकिन बाकी इलाकों में पैदावार अच्‍छी रही, जिसकी वजह से बाजार में सेब की तादाद बहुत ज्‍यादा है। कीमत को लेकर उन्‍होंने बताया कि पिछले साल सेब की कीमत 850-900 रुपए पेटी थी लेकिन इस साल कीमत 700-750 रुपए पेटी है। 

 

रेड डिलीशियस ही है मेन प्रोडक्‍शन​ 
बाजार में रेड डिलीशियस अक्‍टूबर-नवंबर से आना शुरू होता है। इससे पहले मार्केट में कश्‍मीर से जो सेब आता है उसे वेरायटी कहते हैं। इसमें शिरीन, हजरत बली, थोक लाल, अमरी शिरीन आदि शामिल हैं। लेकिन कश्‍मीर का सबसे अच्‍छा सेब रेड डिलीशियस ही माना जाता है। जम्‍मू में सेब खरीदने के लिए पूरे भारत से खरीदार पहुंचते हैं। कश्‍मीर में रेड डिलीशियस का प्रोडक्‍शन ही बड़े पैमाने पर होता है। इसके अलावा अमेरिकन, महाराजी आदि किस्‍में भी हैं। पूरे कश्‍मीर में 20 लाख से ज्‍यादा लोग सेब के प्रोडक्‍शन से जुड़े हैं। सेब की पूरी प्रोडक्‍शन बेल्‍ट कश्‍मीर में है लेकिन इसकी बिक्री जम्‍मू में की जाती है। कश्‍मीर से सेब जम्‍मू मंडी में आता है और यहां इसकी बिक्री होती है लेकिन साथ ही कश्‍मीर में भी कुछ मंडियों जैसे श्रीनगर मंडी में सेब की बिक्री की जाती है।

 

जम्‍मू से सीधे हो रही अन्‍य राज्‍यों में सप्‍लाई 
दिल्‍ली के अकबर खान ने बताया कि अभी तक जम्‍मू से सेब पहले दिल्‍ली आता था और फिर यहां से बाकी के राज्‍यों में जाता था लेकिन इस बार जम्‍मू से बंगलुरू, मुंबई जैसी जगहों के लिए डायरेक्‍ट खरीदारी हो रही है। इसकी वजह है कि जम्‍मू से सीधे दिल्‍ली के अलावा अन्‍य राज्‍यों में सेब भेजने पर माल दूसरे या तीसरे दिन ही पहुंच जाता है। लेकिन माल पहले दिल्‍ली भेजने और फिर यहां से दूसरे राज्‍यों में भेजने पर सेब लगभग 1 हफ्ते में पहुंचता है। इतने टाइम में सेब की शाइनिंग थोड़ी कम हो जाती है। लेकिन सीधे माल भेजने पर माल थोड़ा अच्‍छा रहता है। वहीं बारिश वक्‍त से न होने की वजह से रेड डिलीशियस सेब का कलर जैसा आता है वैसा नहीं आया। साथ ही सेब में श्रिंकेज की भी दिक्‍कत हो गई। इस वजह से भी इस साल रेट कम हैं। 

 

हिमाचली सेब का प्रोडक्‍शन​ रहा कम 
एक ओर जहां इस साल कश्‍मीरी सेब की पैदावार ज्‍यादा है, वहीं दूसरी ओर हिमाचली सेब का प्रोडक्‍शन पिछले साल से 20 फीसदी कम रहा, जबकि बाकी के सालों से तुलना करें तो 50 फीसदी डाउन था। हिमाचल का सेब अक्‍टूबर में मार्केट में आ जाता है। एप्‍पल ग्रोअर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट रवीन्‍दर चौहान ने बताया कि सेब की पैदावार के लिए बहुत ज्‍यादा ठंड की जरूरत होती है। लेकिन इस बार पानी और बर्फ न पड़ने की वजह से हिमाचल में सेब का प्रोडक्‍शन कम रहा। पिछले साल नोटबंदी की वजह से हिमाचल की 4000 करोड़ रुपए की इंडस्‍ट्री को लगभग 1000 करोड़ रुपए का नुकसान झेलना पड़ा। नोटबंदी के वक्‍त सेब का सीजन तो लगभग खत्‍म हो चुका था लेकिन पेमेंट आनी बाकी थी। चूंकि इस इंडस्‍ट्री में सारा काम कैश में होता है इसलिए वह पेमेंट अटक गई। इस साल 2000 करोड़ का नुकसान दर्ज किया गया। 2200- 2300 रुपए का 22 किलो सेब का बॉक्‍स 1300-1400 रुपए में बिका है। 

 

मार्केट में कब आता है हिमाचली सेब 
हिमाचली सेब के टूटने का सिलसिला जुलाई अंत में शुरू होता है और 15 अगस्‍त से 15 अक्‍टूबर तक इसकी पैकिंग और मार्केटिंग चलती है। इसके टोटल प्रोडक्‍शन में से 25-30 फीसदी स्‍टोर किया जाता है। यह सेब दिसंबर अंत और जनवरी में मार्केट में आता है। 

 

नोटबंदी अभी भी बिगाड़ रही खेल
गुप्‍ता ने बताया कि पिछले साल तो नोटबंदी से सेब की बिक्री प्रभावित हुई ही थी लेकिन इस साल भी इसका असर बाकी है। सेब का बिजनेस पूरी तरह से कैश पर निर्भर है। इसकी वजह है कि किसान या बागवान से लेकर खरीदार तक ज्‍यादातर पढ़े-लिखे नहीं हैं और न ही उनके बैंक अकाउंट हैं। इसलिए हर कोई कैश में ही पेमेंट करता है। नोटबंदी के दौरान और उसके बाद सरकार ने कैश में लेन-देन की एक लिमिट तय कर दी थी और डिजिटल पेमेंट को काफी प्रमोट किया गया था लेकिन उसके बावजूद अभी भी ज्‍यादातर पेमेंट कैश में ही हो रहा है, जिसके चलते लोग तय कैश लिमिट में ही खरीदारी कर रहे हैं। 

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