एग्रीकल्‍चर सेक्‍टर में ग्रोथ के लि‍ए सरकार को उठाने होंगे यह 10 कदम

वि‍जय सरदाना

Jan 26,2017 02:06:00 PM IST
नई दि‍ल्‍ली. भारत ने बीते कुछ वर्षों में अपनी फूड सि‍क्‍योरि‍टी को गवां दि‍या है। प्रोटीन और खाद्य तेल की जरूरत के लि‍ए हम इंटरनेशनल मार्केट के भरोसे हैं। प्रोटीन जरूरतों के मामले में 30 फीसदी और तेल के मामले में हमारी 70 फीसदी जरूरत वि‍देश से पूरी होती है।
भारत के पास बस कार्बोहाइड्रेट है। हमारा फूड इंपोर्ट बि‍ल बढ़ रहा है और एक्‍सपोर्ट नीचे गि‍र रहा है। फूड इन्‍फ्लेशन कंट्रोल से बाहर हो गया है और फूड प्रोडक्‍शन की कॉस्‍ट बढ़ जाने के कारण कि‍सानों को अपनी पैदावार की उचित कीमत नहीं मि‍ल पा रही है। इस स्‍थि‍ति‍ से बाहर आने के लि‍ए हमें कुछ कदम उठाने होंगे।
1. जनसंख्‍या और आमदनी बढ़ने के चलते भारत को हर साल करीब 2 करोड़ टन अति‍रि‍क्‍त भोजन की जरूरत पड़ेगी। इस डि‍मांड को पूरा करने का क्‍या प्‍लान है? आज की तारीख तक भारत के पास कोई एग्रीकल्‍चर प्‍लान नहीं है। इसकी वजह से महंगाई बढ़ रही है, एक्‍सपोर्ट कम हो रहा है और इंपोर्ट बढ़ रहा है। इसलि‍ए यह जरूरी हो गया है कि‍ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फूड सि‍क्‍योरि‍टी प्‍लान को जल्‍द से जल्‍द जारी करें।
2. जब तक सही जानकारी नहीं मि‍लेगी पैदावर नहीं सुधरेगी। कि‍सानों को फसलों के बारे में समय से सही जानकारी नहीं मि‍ल पा रही है। इसके लि‍ए एग्रीकल्‍चर एक्‍सटेंशन सर्वि‍सेज और डाटा कम्‍पाइलेशन सर्वि‍सेज को नए सि‍रे से शुरू करना होगा।
3. सरकार को प्राथमि‍कता के आधार पर मृदा (Soil) और पानी को बचाना होगा। इन संसाधनों के बि‍ना अन्‍न का उत्‍पादन बढ़ाना मुमकि‍न नहीं है। हमे अपने नचुरल रि‍सोर्स की सुरक्षा करनी होगी।
4. महंगाई को काबू में रखने और फूड सि‍क्‍योटरी को मैनेज करने के लि‍ए फसल कटने के बाद उसका सही मैनजेमेंट जरूरी है। नि‍वेश बढ़ाकर और टैक्‍स में छूट देकर अन्‍न की बर्बादी को 10 फीसदी से नीचे लाना होगा। वेयरहाउस में इनवेस्‍ट करने से अन्‍न की बर्बादी को काफी हद तक रोका जा सकता है। भारत हर साल करीब 80 हजार करोड़ रुपए का अन्‍न बर्बाद करता है। यह सि‍स्‍टम में पैदा होने वाली ब्‍लैक मनी से कहीं ज्‍यादा है। हमें नोटबंदी की तरह ही कोई बड़ा कदम इस दि‍शा में उठाना होगा और खाने की बर्बादी को रोकना होगा।
5. एग्रीकल्‍चर और कमोडि‍टी मोर्केट में कारोबार के वाजि‍ब तौर तरीकों को प्रमोट कि‍या जाए। एग्रीकल्‍चर कमोडि‍टी मार्केट में 100 फीसदी ई पेमेंट का इंतजाम कि‍या जाए। कोऑपरेटि‍व्‍स को एपीएमसी, ईनैम और फ्यूचर मार्केट का हि‍स्‍सा बनने के लि‍ए प्रमोट कि‍या जाए। जब मार्केट से स्‍टेकहोल्‍डर्स सीधे जुड़ जाएंगे तो वायदा कारोबार में जोड़तोड़ कम हो जाएगा। एपीएमसी में सरकारी एकाधि‍कार है और इसके ढांचे में बदलाव करना जरूरी है। इन एपीएमसी की मैनेजमेंट कमेटी में सभी कोऑपरेटि‍व और एफपीओ की भागीदारी होनी चाहि‍ए।
6. ग्रामीण बैंकिं‍ग इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर को मजबूत करें, क्‍योंकि‍ इसके बि‍ना ई पेमेंट और वाजि‍ब तौर तरीकों से कारोबार होना मुमकि‍न नहीं है। करीब 6 लाख गांव अभी भी बैंकिं‍ग सि‍स्‍टम के दायरे से बाहर हैं।
7. मि‍नि‍मट सपोर्ट प्राइज और कस्‍टम ड्यूटी में तालमेल होना चाहि‍ए। अगर एमएसपी रि‍वाइज हो गया है और कस्‍टम ड्यूटी में बदलाव नहीं हुआ तो कि‍सान की फसल का मार्केट कमजोर हो जाता है। ऐसे में इंपोर्ट पर निर्भरता बढ़ जाती है जैसे कि‍ खाद्य तेल ओर दालों वगैरा के मामले में होता है।
8. पोल्‍ट्री, डेयरी और मछली पालन सेक्‍टर की कोई दि‍शा ही नहीं है। जो योजनाएं प्रस्‍तावि‍त की जाती हैं उनमें लॉजि‍क की कमी होती है। इन सभी योजनाओं का हर लेवल पर रि‍व्‍यू होना चाहि‍ए। पशुओं के चारे को लेकर कोई योजना नहीं है, जबकि‍ कि‍सानों की इनकम और नेशनल फूड सि‍क्‍योरि‍टी में इनका हि‍स्‍सेदारी रहेगी।
9. वैल्‍यू एडीश्‍न को प्रमोट करने के लि‍ए एफएसएसएआई का रि‍व्‍यू कि‍या जाए। मौजूदा कानून फूड सेफ्टी को प्रमोट नहीं कर रहे इसलि‍ए एफएसएसएआई को ट्रांसपेरेंट और जि‍म्‍मेदार बनाया जाए। इससे एक्‍सपोर्ट और वैल्‍यू एडीशन को बल मि‍लने के साथ फूड सेफ्टी में कंज्‍यूमर का भरोसा बढ़ेगा। क्‍यों एफएसएसएआई खराब प्रोडक्‍ट बनाने वालों के नाम अपनी वेबसाइट पर नहीं डालती? जबकि‍ सभी दूसरे देश ऐसा करते हैं। उपभोक्‍ताओं को खराब प्रोडक्‍ट की जानकारी न देने के पीछे एफएसएसएआई का क्‍या मकसद है? कया उन्‍हें चुप रहने के पैसे मि‍लते हैं ? या उन्‍हें अपनी ही जांच पड़ताल पर यकीन नहीं है ?
10. एग्रीकल्‍चर रि‍सर्च के लि‍ए होने वाली फंडिं‍ग को दोबारा देखा जाए। आज एग्रीकल्‍चर रि‍सर्च सि‍स्‍टम की कोई तयशुदा जि‍म्‍मेदारी नहीं है। उनकी जि‍म्‍मेदारी तय होनी चाहि‍ए और अगर मुमकि‍न हो तो प्राइवेट सेक्‍टर के लि‍ए पब्‍लि‍क फंडिं‍ग का इंतजाम किया जाए और उनका मकसद बिल्‍कुल साफ हो। रिसर्च इंस्‍टीट्यूट अब पुराने पड़ चुके हैं और जल्‍द से जल्‍द उनके बारे में कुछ सोचना चाहिए। इन संस्‍थानों के बोर्ड में उन लोगों को होना चाहिए जिनका हित खेती से जुड़ा हो और वही लोग इन्‍हें डायरेक्‍शन दें। इन संस्‍थानों से जो कुछ मिल रहा है उसे देखते हुए ऐसा लगता है कि इनमें नए आइडिया पैदा होने बंद हो गए हैं और आज की ग्‍लोबलाइज्ड इकोनॉमी को देखते हुए ये संस्‍थान बेमतलब लगते हैं।
(वि‍जय सरदाना, इंटरनेशनल एग्री फूड बि‍जनेस और बायो इकोनॉमि‍क्‍स के एक्‍सपर्ट हैं।)
(तोयज कुमार सिंह से बातचीत पर आधारित)

X
COMMENT

Money Bhaskar में आपका स्वागत है |

दिनभर की बड़ी खबरें जानने के लिए Allow करे..

Disclaimer:- Money Bhaskar has taken full care in researching and producing content for the portal. However, views expressed here are that of individual analysts. Money Bhaskar does not take responsibility for any gain or loss made on recommendations of analysts. Please consult your financial advisers before investing.