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    एग्री-ट्रेडिंग सुधारने से किसानों को होगा फायदा

    एग्री-ट्रेडिंग सुधारने से किसानों को होगा फायदा
    केंद्र सरकार ने ‘एग्रीकल्‍चर ट्रेडिंग’ को कुशल व पारदर्शी बनाने की पहल की है। 'नेशनल एग्रीकल्‍चर मार्केट' बनाने की इस पहल का मकसद किसानों की आय बढ़ाकर उन्‍हें मजबूती देना है। लेकिन यह काम इतना आसान नहीं है। खासकर, एग्रीकल्‍चर ट्रेडिंग से जुड़े राजनीतिक हितों को देखते हुए इसकी सफलता की कोई गारंटी नहीं है। सरकार की यह कोशिश तब तक आधी-अधूरी रहेगी, जब तक पॉलिटिकल फंडिंग और एग्रीकल्‍चर मार्केटिंग के बीच के घालमेल को दूर करने की को‍शिश नहीं की जाती है। एग्रीकल्‍चर और रूरल इकोनॉमी मामलों के एक्‍सपर्ट विजय सरदाना का यह लेख एग्रीकल्‍चर मार्केटिंग से जुड़ी इन्‍हीं परतों को खंगालता है।
     
    मार्केट वह वास्‍तविक या सांकेतिक जगह है, जहां मांग और आपूर्ति से जुड़ी ताकतें काम करती हैं और वस्‍तुओं, सेवाओं या फिर कॉन्‍ट्रैक्‍ट्स या इंस्‍ट्रूमेंट्स के व्‍यापार के लिए बायर्स और सेलर्स प्रत्‍यक्ष या बिचौलिए के जरिए मोलभाव करते हैं। यह सबकुछ पैसे के लिए या फिर बार्टर (वस्‍तुओं के आदान-प्रदान) के तहत होता है।
     
    मार्केट में इन कार्यों से जुड़े मेकेनिज्‍म या साधन होते हैं:
    1. व्‍यापार होने वाली वस्‍तुओं की कीमतें तय करना
    2. कीमतों से संबंधित जानकारियां देना
    3. डील और ट्रांजैक्‍शन में सहयोग देना और
    4. डिस्‍ट्रीब्‍यूशन सुनिश्चित करना
     
    किसी खास वस्‍तु के लिए मार्केट उन वर्तमान और संभावित कस्‍टमर से बना होता है जिन्‍हें इसकी जरूरत होती है और जिनमें उस वस्‍तु की खरीद के लिए पैसे चुकाने की योग्‍यता और इच्‍छा होती है।
     
    एग्रीकल्‍चर मार्केट में कृषि उत्‍पादों की वैल्‍यू चेन से जुड़े सभी स्‍टेक होल्‍डर्स को फायदा पहुंचाने के लिए उपरोक्‍त खासियतों का होना जरूरी है। इसे देखते हुए भारत सरकार ने अब ‘नेशनल एग्रीकल्‍चर मार्केट’ के निर्माण का प्रस्‍ताव रखा है। यह एक उम्‍दा आइडिया है, लेकिन ट्रेडर्स से राजनीतिक दलों को होने वाली पॉलिटिकल फंडिंग और स्‍थानीय नेताओं द्वारा एग्रीकल्‍चर मार्केट पर अपनी पकड़ बनाए रखने की मंशा को देखते हुए सरकार की यह पहल आधी-अधूरी ही लगती है।
     
    एग्रीकल्‍चर कमोडिटी के खरीददार के रूप में नेशनल एग्रीकल्‍चर मार्केट स्‍कीम के संदर्भ में सबसे पहले आने वाले सवाल ये हैं:
    1. क्‍या किसान अपने उत्‍पादों की अच्‍छी कीमतें मिलने की स्थिति में राज्‍य के बाहर के कस्‍टमर को अपने कृषि उत्‍पाद बेच सकते हैं?
    2. नेशनल एग्रीकल्‍चर मार्केट के लाइसेंसधारक की पहुंच देश के किसी भी बाजार तक होनी चाहिए, ऐसे में उन्‍हें अपने राज्‍यों तक ही क्‍यों प्रतिबंधित रखा जाता है?
    3. जब देश के सभी लोग जन धन बैंकिंग व्‍यवस्‍था के हिस्‍से हैं, तो एग्रीकल्‍चर मार्केट में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और कालाधन के पैदा होने को रोकने के लिए नकदी लेन-देन (कैश ट्रांजेक्‍शन) को क्‍यों नहीं रोका जाता है?
    4. इलेक्‍ट्रॉनिक प्‍लेटफार्म पर लेन-देन होने की स्थिति में नेशनल एग्रीकल्‍चर मार्केट में ट्रेडिंग की योग्‍यता के लिए किस तरह की इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर चाहिए?
    5. वस्‍तुओं के राज्‍य से बाहर जाने की स्थिति में क्‍या राज्‍य सरकारें उनपर कोई एक्‍सपोर्ट टैक्‍स लगाएंगी?
    6. क्‍या राज्‍यों में एक समान टैक्‍स होगा?
    7. प्रस्‍तावित नए नेशनल एग्रीकल्‍चर मार्केट्स के तहत एपीएमसी की क्‍या भूमिका होगी?
    8. ग्‍लोबल मार्केट में प्रतिस्‍पर्द्धी बने रहने के लिए केंद्र सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ नीति के तहत निर्यात की योजना बना रहीं कंपनियों के लिए स्‍थानीय एपीएमसी से क्‍या किसी छूट का प्रावधान होगा?
     
    अगर हम देश में एग्रीकल्‍चर मार्केटिंग के सुधार के प्रति वास्‍तव में गंभीर हैं तो नेशनल एग्रीकल्‍चर मार्केट के निर्माण की प्रक्रिया में उपरोक्‍त मामलों पर निश्चित रूप से विचार करना होगा।
     
    आखिर सरकार के लिए उपभोक्‍ताओं से जुड़े मामलों पर विचार करना क्‍यों कठिन होगा?
     
    अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि इन कारणों से केंद्र सरकार के लिए एक कुशल नेशनल एग्रीकल्‍चर मार्केट बनाना आसान नहीं होगा:
    1. राजनीतिक दलों के स्‍थानीय नेताओं और राजनीतिक एजेंटों के लिए वर्तमान एपीएमसी पार्किंग प्‍लेस बन गए हैं।
    2. राज्‍य सरकारों के लिए एपीएमसी द्वारा होने वाले कर संग्रह राजस्‍व के बड़े स्रोत हैं।
    3. स्‍थानीय राजनीतिक व्‍यवस्‍था और राज्‍य सरकारें खास तरह के वाणिज्यिक क्रियाकलापों को प्रोत्‍साहित या हतोत्‍साहित करने के लिए एपीएमसी को राजनीतिक हथियार की तरह उपयोग कर रही हैं। प्रस्‍तावित नेशनल एग्रीकल्‍चर मार्केट के क्रियान्‍वयन के साथ ही उनकी यह स्‍वतंत्रता समाप्‍त हो जाएगी।
    4. राजनीतिक दलों की अधिकांश पॉलिटिकल फंडिग ट्रेडिंग कम्‍युनि‍टी से ही होती है। साफ है एग्रीकल्‍चर ट्रेडिंग को पारदर्शी बनाने से राजनीतिक दलों की यह फंडिंग सीमित हो जाएगी, जो उन्‍हें मंजूर नहीं होगा।
    5. अधिकांश ब्‍लैक मनी का उपयोग और पुनर्उत्‍पादन एग्रीकल्‍चर ट्रेडिंग से जुड़ी प्रक्रियाओं व व्‍यवस्‍थाओं में ही होते हैं। यहां पर यह सवाल उठना लाजिमी है कि अब जबकि जन धन बैंकिंग व्‍यवस्‍था सफल हो गई है, ऐसे में क्‍या सरकार एग्रीकल्‍चर कमोडिटी के कैश ट्रांजेक्‍शन को खत्‍म करेगी? यहां यह भी उल्‍लेखनीय है कि मोबाइल आधारित ट्रांजेक्‍शन इस व्‍यवस्‍था को और अधिक आसान बनाने का काम करेगा।
     
    एग्रीकल्‍चर ट्रेडिंग व्‍यवस्‍था में मनी पॉवर और राजनीतिक दबदबे को देखते हुए कुशल और पारदर्शी नेशनल एग्रीकल्‍चर मार्केट का निर्माण करना सरकार के लिए ग्रासरूट स्‍तर पर सबसे बड़ी राजनीतिक जीत और आर्थिक सुधार होगा।
     
    एग्रीकल्‍चर मार्केट के लिए क्‍या है आगे की राह:
     
    भारत सरकार इस प्रक्रिया में डब्‍ल्‍यूटीओ के कई वर्तमान सिद्धांतों पर विचार करते हुए स्‍थानीय एग्रीकल्‍चर मार्केट को अधिक कुशल और पारदर्शी बनाने के प्रयास के तहत उन्‍हें अपना सकती है। मैं यह नहीं कर रहा हूं कि डब्‍ल्‍यूटीओ के तहत इस वक्‍त वैश्विक स्‍तर पर साफ-सुथरी ट्रेडिंग सिस्‍टम है, लेकिन कई सारे सिद्धांत अपनी प्रकृति से काफी हद तक लॉजिकल और साफ-सुथरे हैं। इससे साथ सबसे बड़ी समस्‍या यह है कि सदस्‍य देश अपने स्‍थानीय राजनीतिक और आर्थिक कारणों से इन सिद्धांतों का सही अर्थों में पालन नहीं कर रहे हैं, जिससे वर्ल्‍ड ट्रेडिंग सिस्‍टम में विकृति आई है।
     
    यहां सवाल यह भी उठता है कि क्‍या भारत सरकार कुशल और पारदर्शी नेशनल एग्रीकल्‍चर मार्केट सुनिश्चित करने के लिए  सभी राज्‍य सरकारों को एक मंच पर लाएगी? अगर ऐसा संभव होता है, जिसपर कि मुझे संदेह है, तो वह ग्रामीण आबादी के फायदे के लिए सबसे बड़ा सुधार होगा। यह ग्रामीण भारत में बुनियादी संरचना सुविधाओं के निर्माण, कौशल विकास के क्षेत्रों में निवेश के मामले में भी सबसे बड़ा प्रेरक तत्‍व साबित होगा और इससे भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था को मजबूती मिलेगी। इससे जीडीपी में 3-5 फीसदी का उछाल आएगा और सभी राज्‍य सरकारों के कर संग्रहों में इजाफा होगा। राज्‍य स्‍तर पर योजनाकारों और निवेशकों के लिए यह बेहतर इनसाइट उपलब्‍ध कराएगा।
     
    हमें यह अवश्‍य दिमाग में रखना चाहिए कि यह एक मात्र ऐसा सुधार है जिसका कृषि उत्‍पाद के हर एक उपभोक्‍ता की जिंदगी को प्रभावित करेगा। इसका मतलब है कि इससे देश के 1.27 अरब लोग प्रभावित होंगे।
     
    यह स्‍वतंत्रता के बाद से किसी भी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी। इसके बारे में आप जितना अधिक सोचेंगे, यह हर किसी को उतना अधिक अवसर उपलब्‍ध कराएगा।
     
    इस मामले में सिर्फ एक सवाल अनुत्‍तरित है, और वह है- क्‍या यह संभव हो पाएगा और होगा तो कब? इसके लिए क्रेडिट कौन लेगा? जब तक इस राजनीतिक मसले का समाधान नहीं निकल जाता है, एग्रीकल्‍चर मार्केट से जुड़ा यह सुधार आगे नहीं बढ़ेगा।
     
    विजय सरदाना फूड, एग्रीकल्‍चर, रूरल, बायो-इकोनॉमी और कंज्‍यूमर अफेयर्स मामलों के विशेषज्ञ हैं।
     
     
     

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