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PP फॉर्मूला दि‍ला सकता है कि‍सानों को एमएसपी, नीति आयोग जल्‍द करेगा पेश

नई दि‍ल्‍ली। कि‍सानों को हर हाल में न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य दि‍लाने के लि‍ए नीति आयोग मार्च के आखि‍र तक 'फुल प्रूफ' तंत्र पेश करने जा रहा है। इसके लि‍ए राज्‍यों के साथ जो मैराथन बैठक हुई उसमें मोटे तौर पर तीन तरीके सामने आए हैं। इसमें एक्‍सपर्ट्स ने तीसरे फॉर्मूले को सबसे व्‍यवहारि‍क बताया है, जि‍समें प्राइवेट प्‍लेयर्स की भूमि‍का सबसे अहम है।

 

वि‍त्‍त मंत्री अरुण जेटली ने बजट भाषण में कहा था कि‍ सरकार की पूरी कोशि‍श है कि‍ कि‍सानों को अपनी उपज का न्‍यूनत समर्थन मूल्‍य जरूर मि‍ले और उसके लि‍ए तंत्र तय करने की जि‍म्‍मेदारी नीति‍ आयोग की होगी। एक अप्रैल से नया वित्‍तीय वर्ष शुरू हो जाएगा कि‍ और रबी की फसलों की खरीद बड़े पैमाने पर शुरू हो जाएगी। इसी वजह से आयोग पर दबाव है कि‍ वह जल्‍द से जल्‍द कोई ठोस तंत्र केंद्र और राज्‍य सरकारों के सामने रखे। 


ये हैं तीन फॉर्मूले 


1 मार्केट एश्‍योरेंस स्‍कीम - इसमें राज्‍यों की ओर से फसलों की खरीद की जाएगी। इन फसलों को बेचने के बाद कि‍सानों को एमएसपी पर हुए नुकसान का कुछ हद तक भुगतान कि‍या जाएगा। 
क्‍या है दि‍क्‍कतें - सबसे पहली दि‍क्‍कत तो ये है कि‍ राज्‍यों के पास ना तो खरीदारी करने के लि‍ए वाजि‍ब तंत्र है और ना ही खरीद को रखने के लि‍ए पर्याप्‍त वेयर हाउस हैं। 

 

एग्री बि‍जनेस एक्‍सपर्ट वि‍जय सरदाना के मुताबि‍क, इस सि‍स्‍टम में भ्रष्‍टाचार की गुंजाइश भी बहुत होगी और करप्‍शन न करने के बावजूद दाम ऊपर नीचे होने की वजह से अधि‍कारी हमेशा शक के घेरे में रहेंगे। इसके अलावा सरकार उपज को कैसे बेच पाएगी। सरकार के पास दालों का स्‍टॉक पड़ा है मगर वह उसे ही नहीं खपा पा रही है तो सारी खरीद करने के बाद क्‍या हालात होंगे। 

वहीं भारतीय कि‍सान यूनि‍यन के महासचि‍व धर्मेंद्र मलि‍क  कहते हैं कि‍ सरकारी खरीद तंत्र तो पहले से अक्षम है। अगर राज्‍य व एफसीआई दोनों मि‍लकर सही ढंग से खरीदारी कर पाते तो एमएसपी की दि‍क्‍कत पहले ही खत्‍म हो जाती। राज्‍यों के पास अच्‍छा मुकम्‍मल मशीनरी नहीं है। इतने बड़े पैमाने पर खरीद करना और उसको संभालना आसान काम नहीं है। 


2  भावांतर - इस फॉर्मूले तहत अगर बाजार में फसल का रेट एमएसपी से कम चल रहा है तो इन दोनों के अंतर का भुगतान सरकार सीधे कि‍सान के खाते में करेगी। हालांकि यह राशि एमएसपी के 25 फीसदी से ज्‍यादा नहीं होगी। यह मध्‍यप्रदेश की भावांतर योजना से मि‍लती जुलती योजना है। 


क्‍या है दिक्‍कतें - भावांतर योजना की बदौलत कुछ हद तक तो कि‍सानों को एमएसपी मि‍ल जाता है मगर पूरे देश के लि‍ए यह योजना उतनी कारगर नहीं है। सरदाना कहते हैं कि‍ जैसे ही यह तय हो जाएगा कि‍ एमएसपी और बाजार भाव के अंतर का भुगतान सरकार करेगी,प्राइवेट प्‍लेयर्स बाजार भाव को बढ़ने ही नहीं देंगे। मार्केट रेट हमेशा एमएसपी से नीचे रहेंगे। व्‍यापारि‍यों के कि‍सानों के बीच इस तरह की डील होने लगेंगी जि‍समें व्‍यापारी कागजों में एमसएसपी से कम का भुगतान दि‍खाएंगे और कि‍सान से कहेंगे कि‍ बाकी का बकाया वह सरकार से लें। इसके बाद होने वाले मुनाफे को दोनों बांट लेंगे। मध्‍यप्रदेश में ऐसा हो भी रहा है। 


इधर मलि‍क का कहना है कि‍ इस योजना में काफी झोल हैं। इसमें भी लि‍मि‍ट है। हर कि‍सान अपनी पूरी उपज नहीं बेच सकता। सरकार औसत प्रोडक्‍शन के आधार पर यह तय कर देती है कि‍ एक कि‍सान को कि‍तनी उपज पर भाव का अंतर देना है। फि‍र इस फॉर्मूले में तो भावांतर देने की सीमा भी महज 25 फीसदी बताई जा रही है। इससे कि‍सानों का भला नहीं होने वाला। इसके अलावा आप ये भी देखें कि‍ केवल 27 फसलों की एमएसपी तय होती है, बाकी तो रह ही जाती हैं। 


3 प्राइवेट प्रोक्‍योरमेंट - इसमें प्राइवेट सेक्‍टर की बड़ी भूमिका होगी। इसके तहत कारोबारी एमएसपी पर फसलों की खरीद करेंगे और इसके बदले सरकार उन्‍हें कानूनों में कुछ ढील देगी, टैक्‍स लाभ देगी और कमीशन भी दि‍या जा सकता है। 


एग्री एक्‍सपर्ट ने इस फॉर्मूले में अच्‍छी संभावनाएं जताई हैं। उनका कहना है कि‍ सबसे अहम फैक्‍ट तो यही है कि‍ प्राइवेट प्‍लेयर्स के बि‍ना इतने बड़े पैमाने पर खरीद करना मुमकि‍न नहीं है। वैसे भी बाजार में इनकी भूमि‍का काफी मजबूत है। अगर सरकार ऐसा कुछ कर पाती है तो हम उम्‍मीद कर सकते हैं कि‍ कि‍सानों को एमएसपी मि‍ल पाएगी। 


हालांकि‍ सरदाना कहते हैं कि‍ इसे सफल बनाने के लि‍ए सरकार को सबसे पहले तो एपीएमसी एक्‍स को खत्‍म कर देना चाहि‍ए क्‍योंकि‍ वैसे भी उसका कोई वजूद नहीं रह गया है। अभी भी 10 फीसदी व्‍यापारी ही सरकार को टैक्‍स देते हैं, ऐसे में बेहतर होगा कि‍ सरकार टैक्‍स चोरी करने वाले और ईमानदारी व्‍यापारी को एक प्‍लेटफॉर्म पर ला दे। इससे मार्केट एफीशि‍एंट हो जाएगी। 


भाकि‍यू के धर्मेंद्र मलि‍क ने कहा कि‍ यह फॉर्मूला कुछ हद तक वाजिब और प्रैक्टि‍कल लग रहा है। इसमें कि‍सानों को तो फायदा होगा मगर देश को नुकसान हो सकता है। प्राइवेट प्‍लेयर्स हमारे सरकारी सिस्‍टम को ढहा सकते हैं। इसके अलावा अगर केंद्र या राज्‍य इस फॉर्मूले को लागू करते हैं तो सरकार को इतनी नि‍गरानी रखनी होगी कि‍ व्‍यापारी सारी उपज की खरीद करें। 

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