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इन मजदूरों के फटे कपड़े बिक जाते हैं 5 से 10 हजार में, हमेशा रहती है इनकी मांग

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी इलाके के इन मजदूरों के वारे-न्यारे

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सौरव कुमार वर्मा

उत्तर प्रदेश की राजधानी से महज 20 किमी. दूर स्थित बाराबंकी जिला अपनी उन्नत खेती के लिए मशहूर है। यह इलाका खेती के लिहाज से काफी समृद्ध माना जाता है। ऐसा कहते हैं कि यहां के खेत कभी खाली नहीं रहते हैं। इस इलाके में गेहूं, चावल से लेकर मेंथा ऑयल और अफीम की खेती होती है। बाराबंकी में इस वर्ष अफीम काश्तकारों की संख्या बढ़ाई गई है। ऐसा इसलिए क्योंकि बाराबंकी पिछले कुछ वर्षों में अफीम की खेती में पिछड़ता जा रहा था। बाराबंकी में अफीम की खेती करने वाले राकेश पांडे ने मनी भास्कर से बातचीत की और इस खेती के बारे में बताया।  

 

5 से 10 हजार में बिक जाते हैं मजदूरों के कपड़ें

राकेश पांडे के मुताबिक अफीम की खेती मजदूरों पर निर्भर रहना होता है। ऐसे में मजदूर इसकी ब्लैक मार्केटिंग का अहम जरिया होते हैं। दरअसल पोस्ते (अफीम के पौधे में आने वाला फल) के पौधे से चीरा लगाकर दूध निकला जाता है। इसे ही इकट्‌ठा करके अफीम तैयार की जाती है। मजदूर शाम को पोस्ते में कट लगाते हैं और अगली सुबह पोस्ते से रिसे हुए दूध को निकाला जाता है। यह एक पेस्ट जैसा होता है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान किसानों के कपड़ों में इस पेस्ट का कुछ हिस्सा चिपक जाता है। इन पेस्ट लगे कपड़ों की ब्लैक मार्केट में 5 से 10 हजार रुपए में बिक्री हो जाती है। 

 

बाकी फसलों की तरह अफीम की लागत में हुआ है इजाफा

अफीम की खेती विशेष तरीके से उचित तामपान में की जाती है। साथ ही इसकी विशेष देखरेख की जरूरत होती है। इस खेती में बाकी फसलों के मुकाबले ज्यादा लागत आती है। साथ ही इसकी देखरेख पर भी काफी खर्च आता है। अगर खेती किसी वजह से खराब हो गई है, तो उसकी जानकारी प्रशासन को देनी होती है। इसके बाद प्रशासन अफीम की पूरी फसल को नष्ट कर देता है। राकेश के मुताबिक अफीम की खेती में प्रति हेक्टेयर की दर से अफीम के उत्पादन में कमी आई है। ऐसा पर्यावरण में बदलाव जैसी कई वजहों से हुआ है । साथ ही लागत के हिसाब से कीमत में बढ़ोतरी नहीं हुई है। राकेश का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में मजदूरी समेत अफीम उत्पादन की लागत में इजाफा हुआ है।

 

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लाइसेंस मिलने पर ही की जा सकती है अफीम की खेती 

अफीम की खेती बाराबंकी के अलावा उसके पड़ोस के जिलों फैज़ाबाद, लखनऊ, रायबरेली, गाज़ीपुर, बरेली, बदायूं, शाहजहांपुर में भी होती है। इस खेती की हमेशा डिमांड रहती है। लेकिन सरकार के नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की ओर से सीमित लाइसेंस जारी किए जाते हैं। हर कोई अफीम की खेती नहीं कर सकता है। साथ ही इसकी खरीददारी भी सरकार की ओर से की जाती है। सरकार ने अफीम के प्रति एक किग्रा की कीमत 3 से चार हजार रुपए निर्धारित किया है, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अफीम 12 से 15 हजार रुपए प्रति किग्रा. की दर से बिकती है। वहीं ब्लैक मार्केट में एक किग्रा. अफीम के लाखों रुपए तक मिल सकते हैं। हर एक काश्तकार को औसतन प्रति हेक्टेअर 54 किलो अफीम देनी होती है। इस तय सीमा से 10 ग्राम कम अफीम स्वीकार नहीं की जाती है और संबंधित किसान का लाइसेंस कट जाता है। हालांकि इसे कम करने करी मांग की जा रही है।

 

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अफीम की बड़े मात्रा में होती है सप्लाई

भारत सरकार के नॉरकोटिक्स विभाग की ओर से नए लाइसेंस के जारी न होने से अफीम उत्पादन करने वाले किसानों को मायूसी हाथ लगती है। अफीम ऐसी खेती है, जिसके हर एक फूल से लेकर, दाने, छिलके समेत सभी प्रोडक्ट की बिक्री हो जाती है और इससे काफी कमाई होती है। सरकार के अलावा ब्लैक मार्केट में पोस्ते के किसी भी प्रोडक्ट की बिक्री करने पर सजा का प्रावधान है। इसके बावजूद काफी बड़ी मात्रा में अफीम की तस्करी की जाती है, जो नेपाल और बांग्लादेश से होते हुए विदेश भेजी जाती है।

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