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चीनी सेस पर बंटे राज्य, गन्‍ना कि‍सानों के संकट का कोई हल नहीं

नई दि‍ल्‍ली। देश के गन्‍ना कि‍सानों के 20000 करोड़ के बकाए का संकट अब और गहराता जा रहा है। बकाया दि‍लाने में मदद करने और चीनी मि‍लों को आर्थि‍क संकट से बाहर निकालने के लि‍ए सामने आया '3% सेस फॉर्मूला' भी राज्‍यों के वि‍रोध के   चलते लागू नहीं हो पाया। गन्‍ना कि‍सान संकट में हैं और फि‍लहाल इसका कोई हल नजर नहीं आ रहा। 


क्‍या है संकट
गन्‍ना बकाए का संकट रि‍कॉर्ड उत्‍पादन से पैदा हुआ है। चीनी मिलों के सबसे बड़े संगठन इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन यानी ISMA की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक, चालू गन्ना पेराई सीजन (अक्टूबर-सितंबर) में देश में चीनी का उत्पादन 3 करोड़ 10 लाख टन के पार चला गया है। फिलहाल देशभर में 130 मिलों में पेराई चल रही है। उद्योग संगठन के मुताबिक, इस साल देश में चीनी का उत्पादन रिकॉर्ड 3 करोड़ 20 लाख टन तक पहुंच सकता है।  


बंपर उत्‍पादन की वजह से घरेलू बाजार में चीनी की कीमतें 30 रुपए तक आ गई हैं, जबकि प्रोडक्‍शन कॉस्‍ट ही करीब 37 रुपए है। इसके चलते चीनी मि‍लें गन्‍ना कि‍सानों को पैसे नहीं दे पा रही हैं। गन्‍ना कि‍सानों का करीब 20,000 करोड़ रुपए बकाया चीनी मि‍लों पर हो गया है।  


क्‍या थी प्‍लानिंग
खाद्य एवं आपूर्ति मंत्रालय ने चीनी संकट के समाधान के लि‍ए चीनी पर अधि‍कतम 3% सेस लगाने का सुझाव दि‍या था। यह सेस मि‍ला द्वारा सप्‍लाई पर लगाया जाना प्रस्‍तावि‍त है। इससे बाजार में चीनी के दाम बढ़ जाते। सेस के माध्‍यम से जमा हुई राशि को एक अलग फंड में रखा जाता, जि‍सका इस्‍तेमाल गन्‍ना कि‍सानों के कल्‍याण के लि‍ए कि‍ए जाने की योजना है। यह प्रस्‍ताव जीएसटी काउंसि‍ल की बैठक में रखा गया। 


क्‍यों हुआ वि‍रोध 
जीएसटी काउंसि‍ल की बैठक में खासतौर पर ऐसे राज्‍यों ने सेस का विरोध कि‍या, जहां बहुत बड़े पैमाने पर पैदा नहीं होता। राज्‍यों के वि‍रोध के मोटे तौर पर 3 बिंदु हैं - 
1  अगर गन्‍ना कि‍सानों के लि‍ए इस तरह का सेस लगाते हैं तो अन्‍य कि‍सानों के लि‍ए भी लगाएं। 
2 सेस लगाने से कुल 6700 करोड़ रुपए जुटने का अनुमान है। इतनी राशि‍ केंद्र अपने पाले से आसानी से दे सकता है। 
3 इसके लि‍ए जीएसटी के मूल सिद्धांत से छेड़छाड़ करना सही नहीं है, जो ये कहता है कि‍ जीएसटी के बाद कि‍सी तरह का टैक्‍स या सेस नहीं लगाया जाएगा। 


कि‍स राज्‍य ने क्‍या कहा 
पश्‍चि‍म बंगाल - पश्‍चिम बंगाल के  वि‍त्‍त मंत्री ने कहा कि पहली बात तो ये है कि जीएसटी के उस सिद्धांत के खि‍लाफ है, जि‍समें यह तय कि‍या गया थी अब वस्‍तुओं पर कि‍सी तरह का टैक्‍स अलग से नहीं लगाया जाएगा। जो कुछ होगा वह जीएसटी ही होगा। इसके अलावा अगर गन्‍ने कि‍सानों के लि‍ए सरकार ऐसा कर रही है तो केरल के रबड़ किसानों, आंध्र के कपास कि‍सानों, बंगाल के फल व सब्‍जी कि‍सानों के लि‍ए भी सरकार को कुछ ऐसा ही करना चाहि‍ए। चीनी पर उपकर लगाने का फायदा सिर्फ महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश को होगा।  


केरल - केरल के वि‍त्‍तमंत्री थॉमस आइसाक ने कहा कि‍ इसमें कोई दो राय नहीं कि‍ गन्‍ना कि‍सानों के हि‍तों की रक्षा की जानी चाहि‍ए। मगर 3% सेस से केवल 6700 करोड़ रुपए मि‍लेंगे। इतना बोझ तो केंद्र खुद उठा सकता है। 


आंध्र प्रदेश - आंध्र प्रदेश के वि‍त्‍तमंत्री यानामला रामकृष्‍नुदू  ने पत्र लि‍खकर जीएसटी काउंसि‍ल से सेस पर अपना वि‍रोध दर्ज कराया। उन्‍होंने लि‍खा कि‍ बात केवल 6700 करोड़ रुपए की है। यह केंद्र के कुल रेवेन्‍य का 0.5 फीसदी ही है, तो केंद्र खुद अपनी जेब से कि‍सानों को क्‍यों नहीं देता। इस तरह से जीएसटी की पूरी प्रोसेस को ही क्‍यों बिगाड़ा जा रहा है। 


मैनेजमेंट बाई  क्रि‍एटिंग क्राइसेस
इंटरनेशनल एग्री बि‍जनसे एक्‍सपर्ट वि‍जय सरदाना के मुताबि‍क, सरकार जानबूझ कर इस समस्‍या का कोई स्‍थाई समाधान नहीं करती। सरकार की पॉलि‍सी ये है कि‍ पहले समस्‍या को बड़ा रूप लेने दो उसके बाद एक्‍शन लो ताकि‍ जनता के पास ये मैसेज जाए कि सरकार उनकी समस्‍या को दूर करने के लि‍ए काम कर रही है। सरकार इस तरह के क्राइसि‍स से राजनीति‍क फायदा उठाती है। हमारे सामने ब्राजील का उदाहरण है कि कैसे उसने एथनॉल का प्रोडक्‍शन बढ़ाकर अपने कि‍सानों को लाभ पहुंचाया। 


सरदाना के मुताबि‍क, जि‍स तरह से सरकार कि‍सानों की समस्‍याओं को हैंडल कर रही है वह 'मैनेजमेंट बाइ क्रि‍एटिंग क्राइसेस' है। पहले क्राइसि‍स पैदा होने दो  फि‍र उसे हैंडल करों और उसके बाद राजनीति‍क फायदा हासि‍ल करो। 

 

समाधान सामने है 


विजय सरदाना के मुताबिक, अगर सरकार चाहे तो इस समस्‍या सहित किसानों की अन्‍य कई समस्‍याओं का समाधान किया जा सकता है। इसके लिए पॉलिसी लेवल तुरंत कुछ फैसले लेने होंगे और उन्‍हें लागू करना होगा। 
 
1. पेट्रोल में 20 परसेंट की इथनॉल ब्लेडिंग को अनिवार्य कर दिया जाए। इथनॉल मिक्‍सिंग की बदौलत हम कम से कम 1 लाख करोड़ रुपए बचा सकते हैं। इसका एक हिस्‍से का इस्‍तेमाल किसानों के वेलफेयर में किया जा सकता है। 
  2. देश की सभी पेट्रोलियम कंपनियां सार्वजनिक हैं। अगर प्राइवेट मिलों में किसी तरह का इशु है तो ये कंपनियां इथनॉल प्रोडक्‍शन के लिए उनमें स्‍टेक ले सकती हैं। 

3. इथनॉल की फैक्‍ट्री एक साल में खड़ी हो जाती है। सारी कैलकुलेशन सामने है। सरकार इसके जरिए इथनॉल का ऐसा रेट तय करे, जिससे किसानों को लाभ मिले और निवेशक को वाजिब रिटर्न मिले। 

सरदाना कहते हैं, 'यह समाधान उपलब्‍ध है और आसानी से लागू भी हो सकता है मगर इससे राजनीतिक लाभ नहीं मिलेगा। इसीलिए सरकार इसे लागू नहीं करती।'   

 

 


राज्‍य अपने ऊपर क्‍यों बोझ लें 
भारतीय कि‍सान यूनि‍यन के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता धर्मेंद्र मलि‍क ने कहा कि‍ इस समस्‍या का समाधान केंद्र को करना चाहि‍ए था। जाहि‍र सी बात है जि‍न राज्‍यों में गन्‍ना पैदा नहीं होता वह राज्‍य क्‍यों अपने ऊपर बोझ लेंगे। 
गन्‍ना पैदा करने के मामले में यूपी नंबर वन पोजीशन पर है। कानून के मुताबि‍क, 14 दि‍नों में भुगतान हो जाना चाहि‍ए, मगर कुछ मील तो ऐसी हैं जि‍न्‍होंने एक साल पुराना बकाया भी नहीं चुकाया। प्रदेश के खेतों में अभी भी गन्‍ना खड़ा है। सरकार अगर समय रहते इस समस्‍या का हल नि‍काल लेती तो ऐसी नौबत नहीं आती। 


 

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