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Darjeeling Tea Industry: बंद के एक साल बाद रिकवरी मोड में आई, 15000 रु. किलो तक है कीमत

पिछले साल केवल बंद की वजह से दार्जिलिंग में इंडस्ट्री को 350 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था।

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नई दिल्ली. गोरखालैंड को लेकर पिछले सीजन 104 दिन के बंद की मार अभी भी दुनिया भर में फेमस दार्जिलिंग चाय के बागानों में दिख रही है। चाय मैन्युफैक्चरर्स के अनुसार बंद की वजह से जो मार्केट श्रीलंका ने हथिया लिया था, वह धीरे-धीरे रिकवर   हो रहा है। हालांकि अभी ग्रोथ नॉर्मल लेवल पर नहीं आई है। पिछले साल केवल बंद की वजह से दार्जिलिंग में इंडस्ट्री को 350 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था।

 

जून से नवंबर तक ठप रहा था काम 

सुबोध ब्रदर्स प्राइवेट लिमिटेड में पार्टनर सुगातो सेन ने money.bhaskar.com को बताया कि पिछले साल जून से नवंबर तक प्रोडक्‍शन पूरी तरह बंद रहा था। बागान में भी काम ठप पड़ा था। इसलिए रिकवरी में और कारोबार फिर से नॉर्मल मोड में आने में थोड़ा टाइम लग रहा है। लेकिन इस साल बिजनेस के अच्‍छा जाने की पूरी उम्‍मीद है।


हर साल कितना प्रोडक्‍शन 

हर साल दार्जिलिंग में लगभग 1 करोड़ किलोग्राम चाय का उत्‍पादन होता है। यहां चाय के 87 बागान हैं, जो 17,500 हेक्‍टेयर से ज्‍यादा इलाके में फैले हुए हैं। 

 

प्रोडक्‍शन का 80%हो जाता है एक्‍सपोर्ट 

यहां हर साल होने वाले टोटल प्रोडक्‍शन का 80 फीसदी एक्‍सपोर्ट हो जाता है। जयश्री टी एंड इंडस्‍ट्रीज में सेल्‍स मैनेजर लालकृष्‍ण के मुताबिक, दार्जिलिंग चाय का एक्‍सपोर्ट अमेरिका, यूके, जापान, जैसे देशों में होता है। दार्जिलिंग चाय की देश में भी डिमांड है लेकिन इसके ज्‍यादातर ग्राहक बाहर के हैं। दार्जिलिंग की चाय अपने डिफरेंट फ्लेवर और स्‍पेशल अरोमा के लिए जानी जाती है। इस चाय की पत्तियां भी नॉर्मल चाय से अलग होती हैं। 

 

15,000 रु. किलो तक में बिकती है चाय

दार्जिलिंग की चाय अपने अलग-अलग फ्लेवर और सुगंध के लिए जानी जाती है। इसके चलते यह महंगी भी है। इस चाय का होलसेल में रिकॉर्ड प्राइस 2600 रुपए प्रति किलो है। रिटेल में इसका अधिकतम प्राइस इससे भी ज्‍यादा है। यहां तक कि यह 15000 रुपए प्रति किलो में भी बिकती है।    

 

लिमिटेड है मार्केट

सेन ने कहा कि अगर पिछले 10 सालों को देखें तो दार्जिलिंग चाय के बिजनेस में धीरे-धीरे गिरावट आती जा रही है। इसकी एक वजह इसका लिमिटेड मार्केट है। दार्जिलिंग चाय बहुत महंगी है, इसलिए इसके बायर्स कम हैं। इसे आम चाय की तरह हर कोई नहीं खरीदता।

 

आम चाय से कैसे अलग 

दार्जिलिंग की चाय भारत में होने वाली अन्‍य चाय से अरोमा और फ्लेवर के अलावा पत्तियों के मामले में भी अलग होती है। दार्जिलिंग की चाय कैमिलिया सिनेनसिस की चाइनीज वैरायटी वाली छोटी पत्तियों से बनती है। वहीं अन्‍य चाय बड़ी पत्तियों से बनती हैं। दार्जिलिंग की चाय को एक तरह की ब्‍लैक टी माना जाता है।  

 

आगे पढ़ें- इस वक्‍त सेकंड फ्लश की चल रही तुड़ाई 

इस वक्‍त सेकेंड फ्लश की हो रही तुड़ाई

इस वक्‍त दार्जिलिंग चाय का सेकेंड फ्लश चल रहा है। फ्लश यानी चाय के टूटने का राउंड। दार्जिलिंग चाय का फर्स्‍ट फ्लश ज्‍यादा प्रीमियम माना जाता है। फर्स्‍ट फ्लश बहुत छोटा होता है। यह मार्च से शुरू होता है और अप्रैल मध्‍य तक खत्‍म हो जाता है। वहीं सेकेंड फ्लश मई से लेकर जुलाई तक चलता है। इसके अलावा फर्स्‍ट फ्लश को बहुत ज्‍यादा समय तक नहीं रखा जा सकता है। यह खराब तो नहीं होती है लेकिन 6-7 महीने बाद इसका टेस्‍ट धीरे-धीरे बदलने लगता है और अरोमा खत्‍म होता जाता है। वहीं सेकेंड फ्लश का टेस्‍ट ज्‍यादा समय तक बना रहता है।

 

आगे पढ़ें- चीन और ताइवान भी हैं कॉम्पिटीटर 

चीन और ताइवान से भी मिल रही है टक्कर

इस वक्‍त दार्जिलिंग चाय की प्रमुख कॉम्पिटीटर श्रीलंका की चाय है। इसके अलावा चीन, ताइवान और जापान की चाय भी इसे टक्‍कर दे रही है। 

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