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पराली को बनाएं कमाई का जरिया, सरकार भी करती है मदद

सरकार की तरफ से किसानों को इस बात को लेकर लगातार जागरूक किया जा रहा है कि वे पराली अपने खेतों में न चलाए।

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नई दिल्‍ली. बीते अप्रैल माह में नासा ने भारत की कुछ तस्‍वीरें जारी की, जिसमें देश के कई राज्‍यों में आग धधकती दिखाई दे रही है। आपको जानकार आश्‍चर्य होगा कि यह आग किसी जंगल की नहीं बल्कि खेतों की है। खेतों में जलाई जा रही पराली की स्थिति कितनी विकराल है, नासा की तस्‍वीरों में साफ पता चलता है। दरअसल, गेहूं कटने के बाद बचे ठूठों और धान की बाली से दाना निकालने के बाद बचे पुआल जिसे पराली कहते हैं, को अब किसान खेत में ही जला देते हैं। इससे वायू प्रदूषण के साथ ब्लैक कार्बन भी बढ़ता है जो ग्लोबल वार्मिग भी बढ़ाता है। 

 

 

सरकार की तरफ से किसानों को इस बात को लेकर लगातार जागरूक किया जा रहा है कि वे पराली अपने खेतों में न चलाए। बल्कि उसे अपनी आमदनी का जरिया बनाए। यह मुमकिन है पराली प्रबंधन के जरिए उसे फ्यूल या खाद बनाकर। पराली प्रबंधन में सरकार भी आर्थिक मदद करती है। 

 

4 राज्यों में सबसे ज्यादा जलाते हैं पराली
न्‍यूज एजेंसी आईएएनएस के अनुसार, पंजाब, उत्तरप्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के दो दर्जन से अधिक जिलों में पराली जलाई जाती है। पंजाब के मोगा, पटियाला, लुधियाना, संगरूर व बरनाला में सबसे अधिक पराली जलती है। बीते 24 अप्रैल को ही हरियाणा, पंजाब में खेतों में पराली जलाने के मामले में हाईकोर्ट कड़ा रुख अपनाकर प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड को नोटिस जारी कर जवाब मांग रहा था। हालांकि 2015 में ही एनजीटी ने पराली जलाना प्रतिबंधित किया था। 

 

पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष कहान सिंह पन्नू का कहना है कि पंजाब में 60 लाख एकड़ में धान की फसल उगाने और 1 एकड़ में तीन टन पराली निकलती है। उनका कहना है कि स्थिति भयावह ही होगी जब 180 लाख टन पराली जलेगी। वहीं, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल 2016 की एक रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली से उत्तर दिशा में 100 मील दूर पंजाब में धान की कटाई के बाद करीब 320 लाख टन भूसी और ठूंठ जलाए गए, जिससे दिल्ली और आसपास करीब 20 लाख लोग प्रभावित हुए और प्रदूषण में खासा इजाफा हुआ। 
 

 

आगे पढ़ें... कैसे कर सकते हैं पराली से कमाई? 

 

पराली से कैसे कर सकते हैं इनकम 
पुआल फायदेमंद भी है। एक टन पराली में 5.50 किलो नाइट्रोजन, 2.3 किलो फॉस्फोरस, 1.30 किलो सल्फर और 25 किलो पोटैशियम होता है। इससे गैस प्‍लांट भी बन सकता है जिससे खाना बनाना और गाड़ी चलाना संभव है। गैस के अलावा खाद भी बन सकती है, जिसकी बाजार में कीमत 5,000 रुपए प्रति टन है। इस तरह किसान पराली प्रबंधन कर उसे खाद व गैस बनाकर अपनी आमदनी का जरिया भी बना सकते हैं। 


इन तरीकों से होता है पराली का निपटान 

1. मलचिंग: धान के बचे हिस्से को मशीन से बाहर निकाल कर खेतों में छोड़ दिया जाता है। वह गलकर खाद का काम करते हैं।
2. पराली चार: मिट्टी और ईट के बने छोटे से घर में पराली भरकर जलाई जाती है। इस दौरान जमा हुई कालिख को मिट्टी में मिलाने से उर्वरा शक्ति बढ़ती है।
3. पराली से बने पेलेट: थर्मल पावर प्लांट में पराली से बने पेलेट कोयले के साथ जलाए जाते हैं। एनटीपीसी ने पेलेट की खरीदारी के लिए टेंडर भी निकाल दिया है।

 

 

आगे पढ़ें... पराली प्रबंधन में सरकार कैसे करती है मदद 

 

 

पराली निपटान में सरकार कैसे करती है मदद 
पराली प्रबंधन की मशीनें खरीदने के लि‍ए सरकारी की ओर से 80 फीसदी तक की आर्थि‍क मदद दी जाएगी। यही नहीं कृषि अवशेष न जलाने वालों को इनाम भी दि‍या जाएगा। इस साल मार्च में कैबिनेट ने पंजाब, हरियाणा , उत्‍तर प्रदेश और राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्‍ली में फसल अवशेषों के निपटान के लिए कृषि मशीनरी प्रोत्‍साहन को अपनी स्‍वीकृति दे दी है। इसके लि‍ए 1151.80 करोड़ रुपए मंजूर कि‍ए। 

 

कैसे मि‍लेंगे पैसे 

संबंधित राज्‍य सरकारें जिला स्तरीय कार्यकारी समितियों (डीएलईसी) के माध्यम से विभिन्न लाभार्थियों और स्थान- कृषि प्रणाली पर निर्भर विशेष कृषि उपकरण की पहचान करेगी और कस्टम हायरिंग और व्यक्तिगत मालिक स्वामित्व के आधार पर मशीनों की खरीद के लिए कृषि मशीनरी बैंक स्थापित करने के लिए लाभार्थियों की पहचान और चयन करेगी ताकि पारदर्शी रूप से समय पर लाभ प्राप्त किए जा सकें। राज्‍य नोडल विभाग/ डीएलइसी लाभार्थी की ऋण आवश्‍यकता के लिए बैंकों के साथ गठबंधन करेंगे। चयनित लाभार्थियों के नाम एवं विवरण जिला स्‍तर पर दस्‍तावेजों में शामिल किए जायेगें जिसमें उनके आधार/यूआईडी नम्‍बर तथा प्रत्‍यक्ष लाभ अंतरण के माध्‍यम से दी गई वित्‍तीय सहायता दिखाई जाएगी। 

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