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बजट 2018 - इस बजट से एग्रीकल्चर को है बड़े बूस्टर की दरकार, आंकड़े नहीं दे रहे मोदी का साथ

कम एमएसपी, मानसून की मार, लोन का बोझ और बाजार तंत्र ने कि‍सान की इनकम दोगुनी करने के रास्ते को बहुत संकरा कर दि‍या है।

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नई दिल्‍ली। देश की जीडीपी में तकरीबन 17 फीसदी की हि‍स्‍सेदारी रखने और 50%  वर्कफोर्स को रोजगार देने वाले एग्रीकल्‍चर सेक्‍टर को इस Union Budget 2018 से एक बड़े बूस्‍ट की दरकार है। इकोनॉमि‍क सर्वे 2016-17 के मुताबि‍क, एग्रीकल्‍चर एंड एलाइड सेक्‍टर में 4.1 फीसदी की ग्रोथ का अनुमान है, मगर इस सेक्‍टर की रीढ़ यानी कि‍सान के हालात सुधरते नहीं दि‍ख रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दोगुनी आय की घोषणा कि‍सानों को अब सपना नजर आने लगी है। कम एमएसपी, मानसून की मार, लोन का बोझ और बाजार तंत्र ने कि‍सान की इनकम दोगुनी करने के रास्‍ते को बहुत संकरा कर दि‍या है। महज 6000 रुपए की औसत मासि‍क इनकम पाने वाले कि‍सान को इस बजट से बड़े बूस्‍ट की बहुत दरकार है, नहीं तो यह स्‍थि‍ति‍ ऐसी ही रहेगी।

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एग्री एक्‍सपोर्ट में 21% की गि‍रावट आई

वि‍श्‍व स्‍तर पर भारतीय एग्रीकल्‍चर अच्‍छा परफॉर्म नहीं कर पा रहा है। वर्ष 2016-17 में एग्रीकल्‍चर एक्‍सपोर्ट गि‍रकर 33.87 अरब डॉलर आ गया जो 2013-14 में 43.23 अरब डॉलर था। वहीं एग्रीकल्‍चर प्रोडक्‍ट्स के आयात का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। वर्ष 2013-14 में यह 15.03 अरब डॉलर था जो 2016-17 में बढ़कर 25.09 अरब डॉलर हो गया। एक्‍सपोर्ट बढ़ने से घेरलू बाजार में एग्री प्रोडक्‍ट के दाम कंट्रोल रहते हैं और बहुत नीचे नहीं जाते। इसका फायदा कि‍सानों को होता है।

 

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जीवीए में आई गि‍रावट

साल 2017-18 की सेकंड क्वार्टर में मैन्‍युफैक्‍चरिंग, माइनिंग, इंडस्‍ट्री, रि‍एल एस्‍टेट सहि‍त अन्‍य सभी सेक्‍टरों के जीवीए यानी ग्रॉस वैल्‍यू एडेड में बढ़ोतरी हुई मगर एग्रीकल्‍चर सेक्‍टर में गि‍रावट दर्ज की गई है। पहली ति‍माही के मुकाबले इसमें 0.6 फीसदी की गि‍रावट दि‍ख रही है। जहां पहले क्‍वार्टर में 2.3% की ग्रोथ दर्ज की गई थी वहीं दूसरे क्‍वार्टर में यह गि‍रकर 1.7% आ गई।

 

महज 6426 रुपए है कि‍सान की मासि‍क आय

एनएसएसओ के 70वें राउंड के मुताबि‍क, भारत में कि‍सान परि‍वार की औसत मासि‍क आय 6426 रुपए है। जबकि आज के दौर में सरकारी विभाग के चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी भी 15-20 हजार रुपए महीना कमाता है। वर्ष 2012-13 के आंकड़ों के मुताबि‍क, पंजाब के कि‍सानों की औसत मासि‍क आय 18059 है जो देश में सबसे ज्यादा है और बि‍हार के कि‍सान की मासि‍क आय 3558 रुपए है।

 

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आय दोगुनी करने के लि‍ए चाहि‍ए 6,399 अरब का नि‍वेश

वर्ष 2022-23 तक कि‍सानों की आय को दोगुना करने के लि‍ए हमें पब्‍लि‍क और प्राइवेट दोनों सेक्‍टरों की ओर से 6399 करोड़ रुपए के अति‍रि‍क्‍त नि‍वेश की जरूरत होगी। अभी असम, केरल, उत्‍तर प्रदेश, मध्‍य प्रदेश, बि‍हार, पश्‍चि‍म बंगाल, तमि‍लनाडु, राजस्‍थान, पंजाब और उड़ीसा में पब्‍लि‍क इनवेस्‍टमेंट देश के औसत से कम है। कि‍सानों की आय को दोगुना करने के लि‍ए सरकार ने जो कमेटी बनाई है उसकी रि‍पोर्ट के मुताबि‍क, हर साल 10.41 फीसदी आय बढ़ाने के लि‍ए प्राइवेट इनवेस्‍टमेंट में 7.86 फीसदी की बढ़ोतरी जरूरी है।

खेती, सिंचाई, सड़कें और ट्रांसपोर्ट और ग्रामीण इलाकों में ऊर्जा के क्षेत्र में भारी नि‍वेश की जरूरत है। कमेटी का कहना है कि‍ 2022-23 तक कि‍सानों की आय दोगुनी करने के लि‍ए हमें 2004-05 के रेट पर करीब 617 अरब और 2011-12 के रेट पर 1318.4 अरब रुपयों के प्राइवेट इनवेस्‍टमेंट की जरूरत है।

 

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12,686 अरब रुपए का लोन

महाराष्‍ट्र, उत्‍तर प्रदेश और पंजाब करीब 77 हजार करोड़ रुपए का लोन माफ कर चुके हैं। मई 2017 तक के आंकड़ों के मुताबि‍क, कुल कृषि‍ लोन तकरीबन 12686 अरब रुपए है। रि‍जर्व बैंक पहले ही इस बारे में चेतावनी दे चुका है। बैंक का कहना है कि‍ लोन माफ करने से राज्‍यों की वि‍त्‍तीय स्‍थि‍ति‍ डगमगा सकती है और इससे महंगाई बढ़ सकती है। एक अनुमान के मुताबि‍क, अगर सभी राज्‍य कि‍सानों का आधा कर्ज भी माफ कर देते हैं तो यह जीडीपी का 4 फीसदी तक बैठेगा। लोन माफी वैसे भी फौरी राहत ही दे पाता है, इससे कि‍सान का भला नहीं हो पाता।

 

 

नहीं मि‍लती उपज की सही कीमत

एग्री मार्केट एक्‍सपर्ट वि‍जय सरदाना का कहना है कि‍ यह कि‍सान और कंज्‍यूमर दोनों के लि‍ए यह स्‍थि‍ति‍ ठीक नहीं है। क्रॉप आउटपुट का रि‍यलाइजेशन पहले के मुकाबले कम हो गया है। इनफ्लेशन बढ़ रहा है और उपभोक्‍ता ऊंची कीमतों पर चीजें खरीद रहा है मगर कि‍सानों को उनकी उपज की अच्‍छी कीमत नहीं मि‍ल रही, यानी दोनों ही घाटे में हैं। वहीं इसका फायदा उठा रहे हैं मि‍डलमैन, जि‍न पर सरकार का कोई कंट्रोल नजर नहीं आ रहा है।

 

सरदाना कहते हैं,‍ सीधी सी बात है अगर मार्केट में कि‍सी कृषि‍ उत्‍पाद या उस कृषि‍ उत्‍पाद से बनी कोई चीज ऊंचे दामों पर मि‍ल रही है मगर कि‍सान को सही कीमत नहीं मि‍ल रही तो सारा फायदा बीच में मौजूद लोग ले जा रहे हैं। ऐसी कंडीशन में कि‍सानों के हि‍तों की रक्षा करना सरकार का काम है, जि‍से सरकार नहीं कर रही है।

 

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गांवों को चाहि‍ए फैक्‍ट्री

भारतीय कि‍सान यूनि‍यन के महासचि‍व धर्मेंद्र मलि‍क के अनुसार, अगर सरकार ऐसी व्‍यवस्‍था करे जि‍ससे फूड प्रोसेसिंग से जुड़ी फैक्‍ट्रि‍यां गांवों में आ जाएं तो कि‍सान अपनी उपज फेंकने को मजबूर नहीं होगा। यूपी में कि‍सान कोल्‍ड स्‍टोर से आलू उठाने को तैयार नहीं है क्‍योंकि‍ बाजार में रेट इतना नीचे आ गया है कि‍ माल की ढुलाई और कोल्‍ड स्‍टोर का कि‍राया भी नहीं नि‍कल पाएगा। जबकि‍ बाजार में आलू के चि‍प्स की कीमत आज भी वही है। वही फैक्‍ट्री जो नोएडा या दूसरे शहरों में लगी है अगर आगरा, कन्‍नौज में लगी होती तो सबको लाभ होता। 
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