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खास खबर : आखि‍र क्‍या है कि‍सानों के मन की बात जो मोदी तक नहीं पहुंच रही

मुंबई के आजाद मैदान में इस वक्‍त महाराष्‍ट्र के 30, 000 कि‍सान डेरा जमाकर बैठे हैं।

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नई दि‍ल्‍ली। महराष्‍ट्र में किसान एक बार फिर अपनी मांगों को लेकर सड़क पर हैं। पिछले दो से तीन साल में महाराष्‍ट्र, उत्‍तर प्रदेश, राजस्‍थान और गुजरात सहित देश के कई राज्‍यों में किसान आंदोलन का रास्‍ता अख्तियार  कर चुके हैं। इन सभी किसान आंदोलन की एक अहम मांग रही है कि हमको उपज का सही दाम मिले। मोदी सरकार भी किसानों की उनकी फसल की लागत पर 50 फीसदी मुनाफा देने का वादा करके सत्‍ता में आई थी।

 

लेकिन क्‍या वजह है कि किसानों को इन वादों पर भरोसा नहीं रहा और वह बार बार सड़क पर उतरने के लिए मजबूर हैं। यूपी, राजस्‍थान, मध्‍य प्रदेश, महराष्‍ट्र पंजाब जैसे राज्‍यों में प्रदेश सरकारें किसानों की कर्ज माफी का ऐलान शर्तों के साथ कर चुकी है लेकिन इससे किसानों को कोई खास फायदा नहीं दिख रहा है। आज हम उन कारणों की पड़ताल कर रहे हैं कि मोदी राज में किसान क्‍यों बार बार सड़कों पर उतरने को मजबूर हो रहा है। आज के दिन महाराष्ट्र में 30 हजार से ज्यादा किसान सड़क पर है। अगर थोड़ा पीछे नजर डालें तो फरवरी में राष्ट्रीय किसान महासंघ के आह्वान पर देशभर 65 कि‍सान संगठनों ने दि‍ल्‍ली घेराव का ऐलान कि‍या था। इसमें हरियाणा, पंजाब, राजस्थान के किसान बसों और ट्रैक्‍टर ट्रॉलि‍यों से दि‍ल्‍ली का घेराव करने नि‍कले थे।  

 

क्‍यों सड़क पर उतर रहे हैं किसान 

 

किसानों के बार-बार सड़क पर उतरने के कारणों पर गौर करें तो पता चलता है सालों से फसलों का उत्‍पादन तो बढ़ रहा है। किसानों की लागत भी बढ़ रही है लेकिन किसानों की आय उतनी नहीं बढ़ रही है जितनी उनको जरूरत है। कुछ फसलों पर सरकार न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य तय करती है लेकिन ज्‍यादातर किसानों को इसका भी फायदा नहीं मिलता है। सरकारी सिस्‍टम में खामियों की वजह सिर्फ 6 फीसदी किसान न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य पर अपनी फसल बेच पाते हैं। 2016 में हुई नोटबंदी का नुकसान भी किसानों को उठाना पड़ा है।

 

सरकार से लेकर इकोनॉमिस्‍ट तक मानते हैं कि रूरल इकोनॉमी दबाव मे है। यानी किसानों की आय नहीं बढ़ रही है। क्रिसिल के चीफ इकोनॉमिस्‍ट डीके जोशी का कहना है कि रूरल इकोनॉमी बहुत हद तक किसानों पर निर्भर है। पिछले कुछ सालों से किसानों की आय नहीं बढ़ रही है। ऐसे में उनके लिए परिवार चलाना मुश्किल हो गया है। जीडीपी का जो ताजा आकंड़ा आया है उसमें एग्रीकल्‍चर सेक्‍टर की ग्रोथ 4.1 फीसदी है लेकिन इकोनॉमिस्‍ट पई पनिंदकर का कहना है कि यह ग्रोथ बनी रहेगी या नहीं यह बाहरी कारको जैसे मानसून पर निर्भर है। इसके अलावा फसलों के ज्‍यादा उत्‍पादन से भी बाजार में कीमतें गिर जाती हैं। यहां भी किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है। 

 

 

 

ये है किसान की हालत 


देश की जीडीपी में तकरीबन 17 फीसदी की हि‍स्‍सेदारी एग्रीकल्‍चर सेक्‍टर की है। देश की 50% वर्कफोर्स कि‍सी न कि‍सी रूप में एग्रीकल्‍चर एंड अलाइड सेक्‍टर से रोजगार मि‍लता है। मगर एनएसएसओ के 70वें राउंड के मुताबि‍क, भारत में कि‍सान परि‍वार की औसत मासि‍क आय 6426 रुपए है। देश के 4.69 करोड़ कि‍सान कर्जदार हैं। वर्ष 2016 में 11458 कि‍सानों ने आत्‍महत्‍या की और सरकार 2022 तक इनकी आय दोगुना करने का वादा कर चुकी है।

 

 

वादे और उनकी हकीकत

 

एग्री बि‍जनेस एक्‍सपर्ट वि‍जय सरदाना कहते हैं कि कि‍सानों के साथ क्‍या हो रहा है ये आप एक छोटे से उदाहरण से समझें। हम जि‍स फल या सब्‍जी के लि‍ए दि‍ल्‍ली में 50 रुपए देते हैं। उसका व्‍यापारी कि‍सान को 5 से 10 रुपए ही देता है। हर ब्‍यूरोक्रेट और हर नेता को ये पता है कि‍ ये 40 रुपए कहां जाते हैं। एपीएमसी की वजह से मंडि‍यों में सरकारी मोनोपोली बन गई है। 


भारतीय कि‍सान यूनि‍यन के महासचि‍व धर्मेंद्र मलि‍क कहते हैं कि जब कि‍सान को उसके हि‍स्‍से की रोटी नहीं मि‍लेगी तो वह सड़कों पर आने को मजबूर होगा ही। सरकार वादे तो बहुत करती है मगर उन्‍हें पूरा नहीं कर रही। अपनी उपज सड़कों पर फेंकने के बाद कि‍सान आत्‍महत्‍या पर मजबूर हो रहा है मगर सरकार उसकी सुध नहीं ले रही है। 

 


क्‍या हैं कि‍सानों की प्रमुख मांगें 
1 स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाए इनमें खाली पड़ी जमीन को भूमिहीनों में बांटना, एमएसपी लागत से 50% ज़्यादा रखना, सस्‍ता कर्ज व कर्ज वसूली के लि‍ए समय देनी सि‍फारि‍शें शामि‍ल हैं। 


2 किसानों का पूर्ण कर्ज माफ किया जाए और लम्बी समयावधि व ब्याज रहित कर्ज का प्रावधान कि‍या जाए। किसानों को क्रेडिट कार्ड, फसली ऋण व मशीनरी हेतु पांच वर्ष के लिए शून्य ब्याज दर पर कर्ज दिया जाए- यह मांग भाकि‍यू ने रखी है। 


3 किसानों को उचित समर्थन मूल्य दिलाया जाए और सभी फसलों को एमएसपी के दायरे में लाया जाए। 


4 कृषि मूल्य आयोग को समाप्त कर कृषि विश्वविद्यालयों की लागत से किसान की फसल उत्पादन की लागत मानी जाए और उसी आधार पर लाभकारी एमएसपी तय की जाए।

 
5 फसल खरीद की गारंटी सुनिश्चित की जाए। न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर फसल खरीद गारंटी योजना शुरू की जाए। 


अपनी बात सुनाने के लि‍ए कि‍सानों ने क्‍या-कि‍या कि‍या 


1 पेशाब पि‍या, 27 अप्रैल 2017 - कर्जमाफी की मांग कर रहे तमि‍लनाडु के कि‍सानों ने बीते साल दि‍ल्‍ली में जंतर मंतर पर अपना मूत्र पीकर वि‍रोध जताया। इन्‍होंने खोपड़ि‍यों के साथ भी प्रदर्शन कि‍या था। 


2 सड़कों पर फेंका टमाटर,  मार्च 2017 - वाजि‍ब दाम न मि‍ल पाने की वजह से छत्‍तीसगढ़ कि‍सानों पर टनों टमाटर सड़कों पर फेंक दि‍या। ठीक इसी तरह से उन्‍होंने 2016 में भी वि‍रोध जताया था। 


3 मि‍र्च की होली जलाई, 28 अप्रैल 2017 - मि‍र्च की सही कीमत न मि‍लने से नाराज तेलंगाना के कि‍सानों ने अपनी फसल को आग लगा दी थी। 


4 सड़कों पर बहा दूध, 1 जून 2017 -  महाराष्ट्र के किसानों ने बड़ा आंदोलन शुरू कि‍या जो बाद में हिंसक भी हो गया था। कि‍सानों ने सड़कों पर टनों दूध बहा दि‍या था। 


5 आलू फेंके, 6 जनवरी, 2018 - उत्तर प्रदेश विधानसभा के सामने आलू फेंककर किसानों ने अपना विरोध दर्ज कराया। किसान को 150 से 200 रुपये प्रति क्‍विंटल आलू बेचना पड़ रहा था।


6 दि‍ल्‍ली घेराव, 23 फरवरी, 2018 - राष्ट्रीय किसान महासंघ ने 23 फरवरी को दि‍ल्‍ली घेराव की घोषणा की थी। हालांकि‍ उससे पहले ही देशभर में कि‍सान नेताओं को हि‍रासत में ले लि‍या गया था। 


 

 

 

पलड़ा झुका सकते हैं कि‍सान 
वर्ष 2018 में जिन 8 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, उनमें मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक शामिल हैं। इन सभी राज्‍यों में कि‍सान चुनाव का भवि‍ष्‍य तय करने की स्‍थि‍ति में हैं। 
बीते साल गुजरात के विधानसभा चुनाव में भी ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा की पकड़ कुछ कमजोर हुई थी। गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा को 14 सीटों पर हार झेलनी पड़ी। वहीं, राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस का प्रदर्शन पहले के मुकाबले अच्‍छा रहा। 
वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं, ये भी एक वजह है कि कि‍सान सरकार पर दबाव बना रहे हैं। भारतीय कि‍सान यूनियन के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता राकेश टि‍कैत ने 13 मार्च को दि‍ल्‍ली में कि‍सान महापंचायत का एलान करते हुए कहा था कि 2019 के चुनाव का भवि‍ष्‍य कि‍सान तय करेगा। 
त्रिपुरा में वामपंथी पार्टियों की हार को बीजेपी देश से उनके लगभग सफाये के रूप में देख रही है। ऐसे में सीपीएम की अगुवाई वाले किसान संगठन अखिल भारतीय किसान सभा के नेतृत्‍व में 30 हजार किसानों का पैदल मार्च मायने रखता है। वहीं, देश में लगातार हार झेल रही कांग्रेस और मोदी सरकार के खिलाफ बार-बार बगावती तेवर दिखा रही शिवसेना ने इन किसानों का समर्थन कर दूरगामी राजनीतिक संदेश दिए हैं। 

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