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इस मछली के दीवाने हैं जापान और अमेरि‍का, 5 माह में तैयार हो जाती है

इस किस्म की मछलियों की अमेरिका, यूरोप और जापान में निर्यात की भारी संभावना है।

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नई दि‍ल्‍ली। निर्यात की संभावनाओं  को देखते हुए मत्स्य पालन में लगे किसानों ने रेहू , कतला , मृगल और कॉर्प समूह की मछलियों के साथ तिलापिया किस्म की मछलियों के पालन पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया है। देश के विभिन्न हिस्सों विशेष कर पश्चिम बंगाल, आन्ध्र प्रदेश ,तमिलनाडु और झारखंड में व्यावसायिक पैमाने पर तिलापिया का पालन शरू किया गया है। इस किस्म की मछली के पालन के पीछे किसानों की बढ़ती रुचि का बड़ा कारण यह है कि इनके पालन का खर्च कम है और इसकी प्रजनन क्षमता अधिक है। इस किस्म की मछलियों की अमेरिका, यूरोप और जापान में निर्यात की भारी संभावना है। 


संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार तेजी से बढने वाली मछली की इस किस्म का पालन विश्व के 85 देशों में किया जा रहा है तथा विभिन्न देशों इसके पालन में तेजी आयी है। तिलापिया की कुल 70 किस्में विश्व में पायी जाती है जिनमें से नौ प्रजातियों का व्यावसायिक पालन किया जाता है। इनमें मोजाम्बिक तिलापिया, नीली तिलापिया, नाईल तिलापिया, जंजीबार तिलापिया और लाल बेली तिलापिया प्रमुख है।  आगे पढ़ें 


1000 अंडे देती है मछली 
उथले जल में रहना पसंद करने वाली यह मछली सर्वभक्षी है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें तीव्र प्रजनन क्षमता है और पांच छह माह में ही लैंगिक रूप से परिपक्व हो जाती है । मादा की प्रजनन क्षमता उसके शरीर के भार के अनुरुप होती है । एक सौ ग्राम वजन वाली तिलापिया करीब एक सौ अंडे देती है जबकि 100 ग्राम से 600 ग्राम वजन की मादा 1000 से 1500 अंडे देती है । नाईल प्रजाति की मछली दस साल तक जीवित रह सकती है और इसका वजन पांच किलो तक हो सकता है । 


केवल नर हो जाता है तैयार 
तिलापिया के नर का विकास और वजन तेजी से बढने के कारण वैज्ञानिकों ने आनुवांशिक हेरफेर, मानवीय लैंगीकरण और प्रत्यक्ष हार्मोनल लिंग उत्क्रमण विधि से मोनोसेक्स (केवल नर) तैयार करने की तकनीक विकसित कर ली है ।  देश में 1970 से नाईल तिलापिया का पालन शुरू किया गया था। वर्ष 2005 में यमुना नदी में मामूली संख्या में छोड़ा गया था लेकिन दो साल में ही इसका अनुपात नदी में कुल मछली प्रजातियों का लगभग 3.5 प्रतिशत हो गया था। गंगा नदी में तिलापिया का अनुपात कुल मछली प्रजातियों का करीब सात प्रतिशत है । आगे पढ़ें 

 


धान के खेतों में हो सकता है पालन 
विशेषज्ञों के अनुसार छिछले पानी में रहने के कारण किसान इसका पालन धान के खेतों में भी कर सकते हैं। तालाब में यदि मोनोसेक्स का पालन किया जाता है और नियमित रुप से आहार के साथ ही पूरक आहार दिया जाता है तो एक हेक्टेयर के तालाब में एक साल में इसका उत्पादन 8000 किलोग्राम तक हो सकता है। तिलापिया का पालन अन्य देसी मछलियों के साथ भी किया जा सकता है। पि‍जंरा में भी इसका पालन किया जाता है।  

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