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खास खबर: ग्‍लोबल वार्मिंग की एक झलक भर है तूफान, आगे आने वाले हैं और बड़े खतरे

नई दि‍ल्‍ली। 120 किलोमीटर की रफ्तार से तेज हवाएं चलना और उनका कहर ऐसा कि सैकड़ों लोग एक झटके में मौत के मुंह में चले जाएं। ये कुछ ऐसा है जि‍सके बारे में आज से 15-20 साल पहले कोई आम शख्‍स अनुमान भी नहीं लगा सकता   था, लेकि‍न वैज्ञानि‍कों ने इसकी चेतावनी जरूर उस समय दे दी थी। इसे ग्लोबल वार्मिंग का नाम दिया गया। 

 

 

ग्‍लोबल वार्मिंग वो दो शब्‍द हैं, जि‍नका असर पूरी दुनि‍या पर अब ज्यादा इफेक्टिव रुप से दि‍ख रहा है। जनवरी में जारी हुए साल 2017-18 के इकोनॉमिक सर्वे में साफ तौर पर कहा गया था कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से भारत में मध्‍यावधि में फार्म इनकम 20 से 25 फीसदी तक कम रह सकती है। पशुधन से होने वाली आय में भी 15 से 18 फीसदी की कमी हो सकती है। ये भविष्‍यवाणी भारत के एग्रीकल्‍चर सेक्‍टर को लेकर की गई है। मगर ग्‍लोबल वार्मिंग का असर इससे बहुत व्‍यापक पैमाने पर नजर आ रहा है और आने वाले वक्‍त में बहुत कुछ अप्रत्‍याशि‍त नजर आने लगेगा, इसका अंदेशा भी वैज्ञानि‍कों को है। यानी सीधा सा मतलब है कि ये तूफान केवल जान हानि तक सीमित नहीं है। इस तरह की घटनाओं का हमारी इकोनॉमी पर लॉन्ग टर्म में इफेक्ट पड़ने वाला है।

 


अकेले गेहूं का उत्पादन 25% तक गिरने का अंदेशा

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में सबसे ज्यादा गेहूं उत्पादन करने वाला देश केवल ग्लोबल वार्मिंग की वजह से 2050 तक 25 फीसदी उत्पादन की कमी झेल सकता है। इसका सीधा मतलब है कि भारत में बढ़ती आबादी के बीच खाद्यान्न का संकट भी खड़ा हो सकता है। वहीं अमेरिका, यूरोप जैसे ठंडे इलाकों में गेहूं का उत्पादन 25 फीसदी तक बढ़ने का अनुमान है। यानी कि इको सिस्टम में बड़े पैमाने पर बदलाव की आशंका है। 

 

पूरी दुनिया में फसल चक्र हो रहा है प्रभावित

इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्‍टीट्यूट के कृषि वैज्ञानिक डॉ जे.पी.डबास ने moneybhaskar.com को बताया कि देश में 1970 से 2010 के बीच तापमान में बढ़ोतरी हुई है। खरीफ सीजन में तापमान 0.45 डिग्री सेल्सियस और रबी सीजन में 0.63 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। बारिश के वार्षिक औसत में भी गिरावट दर्ज की गई है। औसत बारिश में 86 मिमी. की कमी आई है।' वातावरण के गर्म होने से फसलों पर सीधा असर पड़ता है। गर्मी का सीजन बढ़ेगा और सर्दी घटेगी तो फसलों के बढ़ने व पकने पर असर पड़ता है। जैसे आप गेहूं को ही ले लीजि‍ए। गेहूं बहुत ही संवेदनशील फसल है। अगर ज्‍यादा गर्मी पड़ने लगी तो दाने का वि‍कास ठीक से नहीं होगा। तापमान, सूखा और लंबी बारि‍श या तूफान व फसलों का उत्‍पादन सब एक दूसरे से जुड़े हैं। हालांकि वैज्ञानि‍क इस दि‍शा में काम कर रहे हैं कि तापमान में बदलाव के बावजूद फसलों के प्रोडक्‍शन पर असर न पड़े।'

 

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका, यूरोप में मौसम गर्म हो रहा है, जिसकी वजह से वहां ऐसी फसलों की पैदावार बढ़ेगी, जिनका उत्‍पादन बेहद कम है। यानी ठंडे मौसम वाले प्रदेश गर्म हो रहे हैं और गर्म प्रदेश कहीं ज्यादा गर्म हो रहे हैं। यहीं नहीं एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार बीते साल अमेरि‍का और रूस ने बर्फबारी का प्रचंड रूप झेला। वर्ष 2017 में कुल 10 तूफान आए थे, जि‍नमें से 6 बहुत बड़े थे।

 

तूफानों की तीव्रता में 3.5 गुना बढ़ोतरी

ऐसा नहीं है कि भारत केे जो 13 राज्य तूफान झेल रहे हैं, वह यहीं तक सीमित रहने वाला है। नेचर क्लाइमेट चेंज जरनल में प्रकाशि‍त हुई एक रि‍पोर्ट में वर्ष 2015 में वैज्ञानि‍कों ने बताया था कि आने वाले तूफान कहीं ज्यादा खतरनाक होंगे।। वैज्ञानि‍कों ने कहा था कि जलवायु परि‍वर्तन की वजह से वि‍नाशकारी तूफान पैदा होंगे। रि‍पोर्ट में यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता प्रोफेसर जिम एल्सनर के मुताबि‍क, इन दि‍नों जो तूफान आ रहे हैं वह पहले के मुकाबले बहुत खतरनाक हैं। शोधकर्ताओं ने पता लगाया कि पिछले 30 सालों में तूफानों की तीव्रता औसतन 1.3 मीटर प्रति सेकंड या 4.8 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बढ़ी है। 

 

 बढ़ता तापमान बिगाड़ रहा है धरती की सेहत 

तूफान की उत्पत्ति तब होती है, जब समुद्री जल का तापमान 79 डिग्री फारेनहाइट (26.1 डिग्री सेल्सियस) से बढ़ जाता है। जैसे-जैसे गर्म जल वाष्प में बदलता है, यह भयंकर तूफान के रूप में समाने आता है। उच्च तापमान से ऊर्जा का स्तर बढ़ता है, जो आखिर में हवाओं की रफ्तार को प्रभावित करता है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के डीजी डॉक्टर के.जी.रमेश के अनुसार' मौसम को लेकर जि‍तनी भी एक्‍स्‍ट्रीम कंडीनशन बन रही हैं उनके पीछे ग्‍लोबल वार्मिंग का हाथ  है। जब तापमान बढ़ता है तो वातावरण में मॉइश्‍चर (नमी) बढ़ जाता है। हवा में नमी का होल्‍ड ज्‍यादा हो जाता है और कहीं ना कहीं वो नि‍कलेगा। इसी की वजह से भारी बारि‍श या भयंकर तूफान जैसी घटनाएं घटती हैं।' इसकी वजह से धरती की सेहत भी बिगड़ रही है, जिसका खामियाजा हम सभी को उठाना पड़ेगा।


पूरे इको सि‍स्‍टम पर प्रभाव

मौसम का मि‍जाज बदलने का असर पूरे ईको सि‍स्‍टम पर पड़ता है। पक्षियों और समुद्री जीवों का बड़े पैमाने पर माइग्रेशन और कुछ प्रजाति‍यों की संख्‍या में खतरनाक गि‍रावट इसकी नि‍शानी है। इसके अलावा फसलों की बेल्‍ट का शिफ्ट होना भी इसका प्रमाण  है। यूनि‍वर्सिटी ऑफ एरिजोना में इकोलॉजी और इवोल्‍यूशनरी बायलॉजी के प्रोफेसर जॉन वीन्‍स ने एक्‍यूवैदर पर एक रि‍पोर्ट प्रकाशित की है। इसमें प्रोफेसर कहते हैं कि जलवायु में बदलाव के चलते कुछ प्रजाति‍यां ऐसे इलाकों की ओर चली जाती हैं जो उनके अनुकूल हों। जीवों की कुछ प्रजाति‍यां ऐसी भी हैं जो माइग्रेट नहीं करतीं और आखि‍र में उनका अस्‍तित्‍व मि‍ट जाता है। 

 

फूड चेन पर हो रहा है असर

जमीन और सागर का तापमान बढ़ने के चलते म‍छलियां ठंडे पानी के लि‍ए उत्‍तर की ओर माइग्रेट हो रही हैं। वहीं कोरल रीफ खत्‍म हो रहे हैं, जि‍नकी वजह से पूरी फूड चेन प्रभावि‍त हो रही है। NOAA के कोरल रीफ कंजर्वेशन प्रोग्राम के डायरेक्‍टर जेनि‍फर कॉस के मुताबि‍क, कोरल रीफ पूरी धरती के केवल 1 फीसदी हिस्‍से को कवर करती है,मगर समुद्र में रहने वाले 25 फीसदी जीवों का ठि‍काना यही है। तापमान बढ़ने की वजह से इनका अंत हो रहा है। ऐसे में जो फूड चेन का नेचुरल सिस्टम बना हुआ है, वह नष्ट हो रहा है। इसका असर हम सब पर आने वाले दिनों में कहीं ज्यादा पड़ने वाला है।

 

पेड़-पौधे नहीं कर पा रहे हैं एडजस्ट

पेड़-पौधे तेजी से होते बदलाव के हि‍साब से ढल नहीं पा रहे। कुक कहते हैं कि जलवायु बदलाव की वजह से ठंड का सीजन अब पहले के मुकाबले ज्‍यादा गर्म रहता है और पतझड़ का वक्‍त पहले के मुकाबले ज्‍यादा जल्‍दी आ रहा है। कुक ने बताया कि जलवायु परि‍वर्तन का असर पेड़-पौधों पर कैसे पड़ रहा है, इसका सबसे अच्‍छा उदाहरण ये है कि फ्रांस में अंगूर अब पहले के मुकाबले करीब 10 दि‍न पहले पक रहे हैं। 

 

 

 

 

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