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खास खबर: क्‍या बॉयोफ्यूल पॉलिसी बढ़ाएगी किसानों की इनकम, कितना कारगर होगा मोदी का फैसला

नई दि‍ल्‍ली। पूरे चार साल किसानों की इनकम डबल न कर पाने को लेकर आलोचना झेल रही मोदी सरकार ने एक बड़ा दांव चला है। अगर यह दांव हिट हो गया तो न केवल किसानों की इनकम बढ़ेगी, बल्कि इकोनॉमी को को भी नेक्सट लेवल   का बूस्ट मिल जाएगा। हम बात कर रहे हैं नेशनल बॉयो फ्यूल पॉलिसी की, जिसकी केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार को मंजूरी दे दी है।


इसकी घोषणा ऐसे समय पर हुई है जब हमारे पास गन्‍ने सहि‍त अन्‍य फसलों का रि‍कॉर्ड उत्‍पादन हुआ है और शुगर इंडस्‍ट्री व एक्‍सपर्ट्स एथनॉल का प्रोडक्‍शन बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। हमारे देश में अभी पेट्रोल में 10% एथनॉल मि‍लाने की इजाजत है, जि‍से बढ़ाकर 20 फीसदी कि‍या जाना है। क्रूड इंपोर्ट पर 5.65 लाख करोड़ खर्च करने और हर दि‍न करीब 244 करोड़ रुपए का अनाज बर्बाद करने वाले देश के लि‍ए यह रास्‍ता काफी फायदेमंद साबि‍त हो सकता है, मगर इसके रास्‍ते में चुनौति‍या भी हैं। 


क्या है पॉलिसी? 
1 बायोफ्यूल की अलग-अलग कैटेगरी तय कर दी गई हैं जैसे बेसि‍क बायोफ्यूल, एडवांस बायोफ्यूल, बायो सीएनजी वगैरह। इससे अलग अलग कैटेगरी के हि‍साब से उचित वित्‍तीय और आर्थिक प्रोत्‍साहन बढ़ाया जा सके।
2 नीति में गन्‍ने का रस, चीनी वाली वस्‍तुओं जैसे चुकन्‍दर, स्‍वीट सौरगम, स्‍टार्च वाली वस्‍तुएं जैसे – भुट्टा, कसावा, खराब गेहूं, टूटा चावल, सड़े हुए आलू के इस्‍तेमाल की अनुमति देकर इथनॉल उत्‍पादन के लिए कच्‍चे माल का दायरा बढ़ाया गया है। 
3 गैर-खाद्य तिलहनों और इस्‍तेमाल किए जा चुके खाना पकाने के तेल व जल्‍दी खराब हो जाने वाली फसलों से जैव डीजल उत्‍पादन के लिए सप्‍लाई चेन बनाने को प्रोत्‍साहन दि‍या जाएगा। 


4000 करोड़ की वि‍देशी मुद्रा बचेगी 
केंद्रीय मंत्री रवि‍ शंकर प्रसाद ने कहा, '2017-18 में करीब 150 करोड़ लीटर एथनॉल की आपूर्ति होने की उम्‍मीद है। इससे  4000 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत होगी। एक करोड़ लीटर ई-10 वर्तमान दरों पर 28 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत करेगा।'  ई 10 का मतलब होता है वो ईंधन जि‍समें 10 फीसदी इथनॉल मि‍ला हो। 


क्या है मोदी का दांव?
एक अनुमान के अनुसार  100 केएलपीडी जैव रिफाइनरी के लिए करीब 800 करोड़ रुपये के पूंजी निवेश की आवश्‍यकता होती है। वर्तमान में तेल कंपनियां करीब 10,000 करोड़ रुपये के निवेश से 12  2जी (सेकेंड जनरेशन) रिफाइनरियां स्‍थापित कर रही हैं। सरकार ग्रामीण इलाकों में रि‍फाइनरी लगाने के लि‍ए प्रोत्‍साहि‍त करती है तो वहां आधाभूत ढांचा वि‍कसि‍त होगा। इससे हजारों लोगों को रोजगार भी मि‍लेगा।  100केएलपीडी की एक 2जी बायो रि‍फाइनरी में करीब 1200 लोगों को रोजगार मि‍लता है। 


कैसे बढ़ेगी किसानों की इनकम?
नई तकनीकों को अपना कर कृषि‍ संबंधी अवशिष्‍टों/ कचरे को इथनॉल में बदला जा सकता है और यदि इसके लिए बाजार विकसित किया जाए तो कचरे का मूल्‍य मिल सकता है जिसे अन्‍यथा किसान जला देते हैं। 
सरकार की ओर से जारी आधि‍कारि‍क बयान में कहा गया है कि‍ अतिरिक्‍त उत्‍पादन के चलते किसानों को फसल का वाजि‍ब दाम नहीं मि‍ल पाता, जिसे देखते हुए यह फैसला लि‍या गया है कि‍ इथनॉल के प्रोडक्‍शन में अनाज का इस्‍तेमाल कि‍या जाएगा। 
इंटरनेशनल एग्री बि‍जनेस एक्‍सपर्ट विजय सरदाना के मुताबि‍क, इथनॉल के प्रोडक्‍शन और मिक्‍सिंग को प्रोत्‍साहन देने से देश के गन्‍ना कि‍सानों के बकाए का संकट खत्‍म हो जाएगा। 


क्या कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर दे पाएगा सहारा?
1 सरदाना के मुताबि‍क,जब इसमें एफसीआई जैसी सरकारी एजेंसी इनवॉल्‍व होगी तो इस तरह के घपले की संभावना बढ़ेगी जि‍समें अच्‍छे अनाज को भी खराब बता कर कंपनि‍यों को बेच दि‍या जाएगा। ऐसे में 17 रुपए प्रतिकि‍लो वाला गेहूं केवल 1 से 2 रुपए के भाव में बेच दि‍या जाएगा। इसकी ऑडि‍टिंग कैसे होगी। 
2 एथनॉल को बढ़ावा तभी मि‍लेगा जब सरकार ऑयल कंपनि‍यों की जवाबदेही तय करेगी। अभी भारत में पेट्रोल में केवल 2.1 फीसदी की इथनॉल ब्‍लेंडिंग हो रही है, जबकि 10 फीसदी तक की मंजूरी है। 


एजेंडा कि‍सानों का नहीं सरकार का है

कृषि वि‍शेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं कि अनाज से बायो फ्यूल बनाने का पूरी दुनि‍या में वि‍रोध हो रहा है। जि‍स देश में 30 करोड़ लोग आज भी भूखे पेट हों वहां अनाज से ईंधन बनाना एक अपराध जैसा है। जब अनाज से शराब बनती है तो आप वि‍रोध करते हैं मगर बायो फ्यूल बनाने को आप प्रोत्‍साहन दे रहे हैं। ये एजेंडा कि‍सानों का नहीं इंडस्‍ट्री का है। 


फेल होने का है डर
सरदाना कहते हैं कि इसमें बहुत बड़ा कैश इनवॉल्‍व है, क्‍योंकि इंडस्‍ट्री से 40 रुपए में नि‍कलने वाला एल्‍कोहल बाजार में 400 रुपए की बोतल में बि‍कता है। इंडस्‍ट्री से शराब माफि‍या को दूर रखने के लि‍ए बेहद कड़ा नि‍गरानी तंत्र बनाना होगा। 


हमें ये भी देखना होगा कि 2019 के चुनाव सामने हैं। इस पॉलि‍सी को एक चुनावी दांव के नजरि‍ए से अलग नहीं कि‍या जा सकता। जब तक इस सि‍स्‍टम और टारगेट सामने नहीं आता तब तक इस पॉलि‍सी को कि‍सानों से कि‍ए हुए एक और वादे के अलावा कुछ नहीं माना जा सकता। 


अभी कहां है किसान?
इस कृषि‍ वर्ष में दालों, चना, आलू, प्‍याज और टमाटर कि‍सानों  को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है। चने और दालों के बंपर प्रोडक्‍शन के चलते कि‍सान एमएसपी से 40 फीसदी तक कम दामों पर दाल और चना बेचने पर मजबूर हुए। आलू और टमाटर बोने वालों ने लागत से भी कम दाम मि‍लने की वजह से सड़कों पर अपनी उपज फेंकी। देश में कई कि‍सान आंदोलन हुए जि‍नमें आखि‍री बड़े आंदोलन में करीब 25,000 कि‍सानों  ने नासि‍क से मुंबई तक पैदल मार्च कि‍या था। एनएसओ के मुताबि‍क, देश में एक कि‍सान की मासि‍क आय करीब 6426 रुपए आंकी गई है।  संयुक्‍त राष्‍ट्र की फूड एंड एग्रीकल्‍चर ऑर्गनाइजेशन के मुताबि‍क, भारत में करीब 40 फीसदी अनाज बर्बाद हो जाता है। 

 

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